Apr 18, 2021

इसे समझ डाला तो लाइफ झींगा-लाला.

 



जिन्दगी तुम डरना नहीं.

बस इतनी सी बात है.

कितना इजी लेकिन उतना ही दूर भी.

 

डर

कितनी ही बातों का डर.

बैठे बिठाए साइकोलॉजिकल संदेह.

 

सबसे बड़ा डर क्या होना चाहिए,

जिसको समझने के बाद डर

ख़त्म ही हो जाना चाहिए.

जरा सोच कर देखिए.

 

क्या है सबसे बड़ा डर.

क्या ये शादी हो जाने का डर है.

या के लाइफ में फेल हो जाने का डर

या के समाज में स्वीकारे न जाने का डर

या के बुढ़ापे में बच्चों से दूर हो जाने का डर

या मनमाफ़िक लाइफ ना मिलने का डर

कुछ छुट जाने का डर

किसी से बिछड़ जाने का डर

किसी से दूर हो जाने का डर

किसी से धोखा खाने का डर

गरीब रह जाने का डर

सब मिल जाने पर भी किसी बीमारी का डर

अकेला रह जाने का डर

और भी ना जाने छोटे-मोटे अनगिनत डर.

 

आदमी की एवरेज लाइफ बहुत छोटी है.

और उसे कोई ना कोई डर हमेशा लगा ही रहता है.

और एक दिन सचमुच डराने वाला सच

सामने आ जाता है.

वो है मौत.

सचमुच एक ये ही चीज़ है

जो सारे डरों पर भारी है.

 

अगर आप इतना समझ सकें

बस इतना कि आप यहाँ

परमानेंट रेजिडेंट नहीं हैं,

बस एक पैसेंजर हैं

जिसकी विदाई एक ना एक दिन होगी ही.

इतना समझने से क्या आपको नहीं लगता कि

बाकी डर सिर्फ़ दिमागी ख़याल हैं

जो रियल हैं ही नहीं.

 

आपने इतना बड़ा

दिमागी बुख़ार कर रखा है कि

डर के इंजेक्शन आप ख़ुद को लगाते रहते हैं

और जो एक जिंदगी मिली है

उसकी औकात छोटी ही बनी रहती है.

 

तो बस इतनी सी बात है.

जिस दिन से या जिस पल से

आपने ये समझना स्टार्ट कर दिया

कि चाहे कुछ

भी हो जाए,

एक दिन तो आपको निपटना ही है.

सबकुछ छोड़ कर फेयरवेल लेनी ही है

तो हो सकता है कि बाकी के सारे डर स्वाहा हो जाएँ

और आप रिलैक्स होकर जिंदगी का मज़ा ले सकें.

 

क्योंकि मौत ही वो सच है

जिसने लाइफ को इतना इम्पोर्टेन्ट बना दिया है.

 

सोचिए कि अगर आपको अमर बना दिया जाता

तो आप कितने ही डरों के साथ लगातार कबड्डी खेलते रहते

और कितने ज्यादा बोरिंग हो जाते.

 

तो मौत का डर.

एक्चुअली में इसे समझ डाला तो

लाइफ झींगा-लाला.

 

आप कभी भी विदा ले सकते हैं

तो बस उतना ही लें जिससे काम चल जाए.

वर्ना इच्छाओं की कोई सीमा नहीं हैं.

 

और परमानेंट खुशियों के रास्ते

डर में तय नहीं किये जा सकते.

 

मरने से पहले किसी दिन तो पूरा जीकर जाइए.

 

इमेज सोर्स: गूगल