Mar 31, 2020

डोमिनेट करने की आदत ही, आदमी को सनकी बना देती है.





जब रुकने पर, जीत की अनाउंसमेंट
होने लगे तो समझ लीजिए
कि आप की कही हुई, सारी बातें
छोटी रह गईं.
आप छोटे रह गए.
थे, तभी ऐसा हुआ.

कोई और है, जो आपसे,
हमेशा के लिए बड़ा है.

अभी तो, बचाव के लाले पड़े हैं.
उपाय, कैसा रिजल्ट देंगे,
ये समय के गर्भ में है.

हो सकता है कि बचने के बाद,
अपने स्वभाव के चलते,
आप, फ़िर उछलने का
नाटक करने लगें,
कोई नयी बात नहीं.

सदियों से आदमी, ऐसा ही करता रहा है
और अस्तित्व उसे, नकार देता है.
लानत, भला किसे अच्छी लगती है.

चीज़ें ऐसे ही बदलती हैं.

नेचर ने सबके लिए जो स्पेस दिया था,
वो आपने, लपकने का रिस्क लिया.

तसल्ली से घर बैठ कर देखिये, सोचिए.
जिन्हें आपने पासपोर्ट दिया,
इज्ज़त दी, शोहरत दी,
बुलंदियों पर पहुंचाया.
वो आपके लिए, क्या लेकर लौटे हैं?
बाहर से आकर, 
उन्होंने, आपको ही घर बिठा दिया है.

जिनका आप, बेसब्री से इंतजार करते थे,
जिनकी कथाएं सुना-सुना कर,
आस-पास वालों के सामने, 
दंभ भरी मुस्कान गिराते थे,
आज उनको देखकर,
सभी घरों में दुबकते मालूम पड़ते हैं.
आप ख़ुद भी,
सबसे पहले.

और
जिन्होंने, आपके लिए घर बनाए,
खेत जौते,
धूप-छांव में, 
सुख-दुःख में आपके करीब, पड़े रहे,
ग़रीब बने रहे,
वो छोटे राशन कार्ड,
दो रोटी के लिए, 
सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर
अपनी बेबस आंखों से, 
चले जा रहे हैं,
सहानुभूति का अंगोछा, 
माथे पर धरे हुए.

तो ये समय है,
चीज़ों को सही तरीके से देखने का,
ना कि अपने नज़रिये के चश्में से, 
देखते रहने का.
अब, इस नज़रिए की कीमत, 
जीरो से भी नीचे है.

फ़िर असली प्रॉपर्टी क्या है?


एक ना दिखने वाली चीज़ ने,
इतना भयभीत कर दिया है कि
आदमी का सारा घमंड, सारा अहंकार,
और ख़ुद को बड़ा समझते रहने का सफ़र,
कॉमेडी साबित हो रहा है.
और ये, किसी और से कह भी, नहीं सकते.

जब कोई अनजान चीज़,
सभी के लिए ही ख़तरा बन जाए,
तो छोटापन सामने आना तय है.

ये छोटापन लाने का ज़िम्मेदार भी, 
आदमी ख़ुद ही है.
लिमिटलेस चाहत, बेड़ा-गर्ग ही करती है.

ऐसा ही तो हुआ है.
डोमिनेट करने की आदत ने ही , 
आदमी को सनकी बनाया है.

दूसरे तमाम जीवों को छोटा 
और नकारा समझने की भूल ने,
इस आंधी को पैदा किया है.
हां मगर, इसका डर,
आपको सच से मिलने का, 
नया रास्ता भी देगा.
यकीं रखिए.


बेहतर तो ये ही है कि
हम, अपने साथ-साथ,
दूसरों के बारें में भी सोचना सीखें.
दूसरों पर एक्सपेरिमेंट करते रहने और
सुपर-पॉवर बनने की आदमी की चाहत,
आज नहीं तो कल,
इसी जाति को, पाताल भेजने में,
कोई भी देर, नहीं लगाने वाली.

ये फ़िल्म, किसी और की है,
इसका डायरेक्टर, कोई और है.
जब आप, ये समझ लेंगे तो
अपना मिला रोल, 
आराम से करेंगे
और नखरों के बाज़ारों से, दूर होते जायेंगे.

अपने लिमिटेड टाइम ऑफर का, 
सही इस्तेमाल करना ही,
फ़िल्म की डायरेक्शन के साथ, 
जस्टिस करना है,
क्योंकि,
जब फ़िल्म रिलीज़ होगी
तो आपके किरदार के रिजल्ट, वैसे ही आयेंगे,
जैसा रोल, आपने निभाया होगा.

तो,
ये टीम-वर्क का समय है.
किसी के साथ, नो विश्वासघात.

थोड़ा ये ख़याल रखें तो
आप, सांसो के आने - जाने को पचा सकेंगे.




       (चिंतन संबंधी लेखन के तहत)    इमेज सोर्स: गूगल