Jul 12, 2020

जीवन को वास्तव में क्या चाहिए ?






एक उम्र होने के बाद
आदमी पकाने लगता है साइकोलॉजिकल खिचड़ी.

अब जब करोना से जुड़े हुए, झूझते हुए
बीत रहे पल, दिन और महीने
तो असर कुछ भी हो,
बेअसर बहुत कुछ हो रहा है.

बोल्ट की तरह भागते दिमागों ने
ख़ुद को अनसुना सा होने दिया है.
किसी भी बदलाव के लिए बाहर देखने की
ज़रूरत कम ही पड़ती है.
अपने भीतर की आदतें अगर बदलाव को
स्वीकारने लगी हैं तो समझो कि सोच की मारामारी से
और इस महामारी,
दोनों से ही बाहर निकल जाने का 
समय लौट रहा है.

अब जीवन को वास्तव में क्या चाहिए?
आपके जीवन को, दूसरे के नहीं
बस ये एक तरीका ही कोई कारगर आदत आपको
गिफ्ट कर सकता है,
बशर्ते आप इसे अडॉप्ट करने में अपनी पिछली
तू-तू मैं-मैं का इस्तेमाल कम से कम कर सकें तो.

मैंने देखा है
कि स्लो-मोशन लाइफ कोई बुरा आप्शन नहीं है
बल्कि ये तो हमें जागरूक करता है कि
एनालाइज कर लो कि कम से कम में भी,
क्या स्कोप हो सकते हैं.
हाँ, मगर अपनी साइकोलॉजिकल खिचड़ी
में दही मिलाने से पहले बस 
इतना एहसास काफ़ी है
कि कोई भी ये जान ले कि
रोज-रोज खिचड़ी पका कर खाना आसान नहीं है.
जितनी जल्दी सच को समझ लेने की ज़िम्मेदारी,
आदमी उठाना सीख लेगा,
उतना पहले ही उसे एक 
अच्छी सुबह देखने का मौका
मिलता रहेगा.

सारे अनुभव आदमी के भीतर ही पनपते हैं.
हमें उन अनुभवों को सुंदर कपड़े पहनाने की कोशिश करते रहना चाहिए.

अगर हम क्लैरिटी को 
पहली परेफरेंस देना शुरू करें
तो चाहे कितना भी डर हो मन को,
चीज़ें जल्दी ठीक होना शुरू होंगी
और जीवन ख़ुद को आबाद रखने का जोख़िम
ख़ुद ब ख़ुद उठा लेगा.

अब आप अवसरों की दुकान पर खड़े हैं,
दुकान खुली रखें या बंद,
ये आपकी चॉइस है.

गहराई से सोचें
और गहरे उतरते जाएं,
वक़्त का समुंदर,
एक दिन ख़ुद आपके पैर धोने आएगा.

इमेज सोर्स: गूगल