Jan 18, 2018

सेल्फी फोटो क्लिक


कहानी 1: दो पक्के दोस्त रमेश और सुरेश : नदी किनारे घुमने गए. सुरेश ने कहा – यार रमेश, थोड़ा नदी के बीच में चलते हैं फिर सेल्फी लेंगे और सोशल मीडिया पर शेयर करेंगे. दुनिया भी देखेगी हमारी दोस्ती की तस्वीरें. रमेश बोला – ओके भाई. दोनों आगे गए. सेल्फी ले ही रहे थे की पानी का तेज बहाव आया. दोनों बह गए और फिर कभी नहीं दिखाई दिए दुनिया को.
कहानी 2: दो पक्की सहेलियां उषा और प्रिया. कॉलेज में घुमने का प्रोग्राम बना. पूरी क्लास टूर पर निकल पड़ी. हिल स्टेशन पर खुबसूरत लोकेशन थी. एक ऊँची चट्टान के कोने पर जा पहुंची दोनों. सेल्फी स्टिक से सेल्फी लेने की ख्वाहिश थी. सेल्फी ले ही रहीं थी की अचानक पैर फ़िसले और फिर वो दोनों किसी को जिन्दा नहीं मिलीं. 

दोनों कहानियों में पात्रों के नाम काल्पनिक हैं लेकिन घटनाएं ऐसी ही होतीं हैं. सेल्फी का क्रेज बुरा नहीं परन्तु लाइफ़ ही ख़त्म करदे तो फिर किस काम का. अधिकतर बार देखा गया है की ख़ुद को ख़ुश या खुबसूरत या फिर साहसी दिखाने के चक्कर में यूथ अपनी जान से हाथ गवां बैठता है. सोचिये उनके परिवार वालों का क्या हाल होता होगा. इसलिए टेक्नोलॉजी को एन्जॉय कीजिये लेकिन उसके लिए पागलपन की हद तक मत जाइये. दुनिया को कुछ दिखाने के खेल में अपने और अपने परिवार के सपने मत तोड़िए. किसी हादसे में हुई मौत के कई पहलू हो सकते है. लेकिन सेल्फी डेथ - ये सिर्फ़ शौक में हल्की लापरवाही का नतीजा हैं। सेल्फी लेते वक़्त आपको समझदारी दिखानी ही होगी.

आइये जाने क्या है सेल्फी :
सेल्फी स्मार्टफोन की ख़ोज है जिसमें कैमरे का रोल बड़ा हो जाता है. अगर आपके पास स्मार्टफोन है तभी आप सेल्फी ले सकते हैं. दुनियाभर में रोज लगभग 96 मिलियन सेल्फी क्लिक होती हैं। 

सेल्फी यानी खुद की फोटो खींचना। 2013 में 'सेल्फी', ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द इयर बना जो इसके क्रेज को बखूबी दर्शाता है. स्मार्टफोन के इस आधुनिक काल में सेल्फी सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. 

अलग – अलग सर्वे बताते हैं कि आज के युवा जो पूरे दिन में एवरेज 8 से 12 घंटे अपने स्मार्टफोन पर बिताते हैं, वे पूरे दिन में 2-3 नहीं बल्कि 12-17 सेल्फी फोटो क्लिक करते हैं. कमाल है ना. 

आपको जानकर हैरानी होगी की ज्यादा सेल्फी लेना अब शौक नहीं, ये एक गंभीर बीमारी है जिसको  “सेल्फीसाइटिस” के नाम से पहचाना जाने लगा है. मनोचिकित्सकों के मुताबिक ये एक ऐसी कंडीशन होती है, जिसमें आदमी सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर अगर पोस्ट नहीं करे तो उसे बहुत बेचैनी होने लगती है। शुरू में सब कह देंगे की हमें ऐसी कोई बीमारी नहीं परन्तु इस आदत के शिकार लोग सार्वजनिक रूप से तो बहुत सोशल और अपडेटेड दिखते हैं, खूब फ़ोटो शेयर करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनके अंदर का आत्मविश्वास ख़त्म होने लगता है. चूँकि वो चाहते हैं की सोशल मीडिया का उनका सर्किल उनको लाइक और सपोर्ट करे पर कई बार जब ऐसा नहीं हो पता तो वो डिप्रेशन में चले जातें हैं और दवाइयों से भी उनका इलाज़ करना मुश्किल हो जाता है. 

सर्वे बताते हैं कि स्थिति इस हद तक हो गयी है कि कई बार एक पुरुष 24 सेकेंड से ज्यादा समय तक भी अपने मोबाइल फोन या स्मार्टफोन से दूर नहीं रह पाता और महिलाएं अपने मोबाइल से 55 सेकेंड से ज्यादा का गैप बर्दाश्त नहीं कर पाती है. अब आप समझ गए होंगे कि इस बैचनी और उतावलेपन से क्या कुछ हो सकता है? सेल्फी लेनी तो अभी बाकी है मेरे दोस्त. दुनियाभर में सेल्फी के चक्कर में सैकड़ों लोग अपनी जान गँवा चुके हैं. हमें कहाँ रुकना है, ये कोई और नहीं सोचेगा? हमें ही सोचना होगा.

इसके फ़ायदे और नुकसान
फ़ायदे
इसके लिये आपको किसी की जरूरत नहीं. खुद ही अपनी फ़ोटो क्लिक कर सकते हैं.
आप किसी भी एंगल से फ़ोटो क्लिक कर सकते हैं.
आप अगर ग्रुप में दोस्तों के साथ फ़ोटो क्लिक कर रहें हैं तो आप भी उसमें शामिल हो सकते हैं जबकि पहले फ़ोटो खीचने वाला फ़ोटो में नहीं दिख पाता था.
सेल्‍फी लेते समय आप फ़ोटो की क्वालिटी को सेट कर सकते हैं जैसे कि आप कैसे दिख रहे हैं या के आपके पीछे का बैकग्राउंड कैसा है?
आप सोशल मीडिया में अपनी फ़ोटो अपलोड करके उनसे अपनी ख़ुशी तुरंत शेयर कर सकते हैं.

नुकसान -
सेल्फी लेने के चक्कर लोगों अपनी जान गवां देते हैं. लोग कई बार इतने जोशीले हो उठते हैं की भूल जाते हैं की वो सेल्फी किस जगह पर खड़े होकर क्लिक कर रहे हैं.
सेल्फी लेने का शौक कई मानसिक और शारीरिक बीमारियों को पैदा कर सकता है.
अच्छी सेल्फी क्लिक हो, फेस एक्सप्रेशन शानदार आये, इसके लिए कई लोग तो कॉस्मेटिक सर्जरी तक करा लेते हैं.
वर्किंग टाइम में सेल्‍फी लेने से काम की क्वालिटी लगभग ख़त्म हो जाती है और अगर आप नौकरी में हैं तो नौकरी जाने के चांसेस काफी रहते हैं भले ही आप कोई भी बहाना बनाएं या इसे नज़रंदाज़ करें.
आपने सेल्फी ली और सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं कर पाए तो बेचैनी होने लगती है और ये तब तक रहती है जब तक आपकी सेल्फी लोगों तक न पहुचे. फिर ये हमेशा की आदत बन जाती है और आप मानसिक रूप से अस्वस्थ होने लगते हैं.
सेल्फी और सोशल मीडिया से सेल्फिशनेस भी बढ़ गयी है. सिर्फ़ दिखाने ही काल्पनिक दुनिया में आप सुपर हीरो बन जाना चाहते हैं और असलियत में अपने से जुड़े लोगों से कटना शुरू कर देते हैं. फ़िर जब दुसरे लोग भी आपमें दिलचस्पी लेना बंद कर देते हैं तो आप सनकी और चिडचिडे हो सकते हैं. दुनिया आपको ख़राब लगने लगती है और आप डिप्रेशन का शिकार बड़ी आसानी से बन जाते हैं.
कुछ जानकारों यह भी मानना है कि स्मार्टफोन की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें आदमी की त्वचा को बेहद नुकसान पहुंचा सकती है.

अब क्या करें ?
रोजाना की वनवे लाइफ में मानसिक स्वास्थ्य के लिए मनोरंजन जरूरी है. सेल्फी का क्रेज़ बुरा नहीं लेकिन इससे पहले की ये क्रेज़ जानलेवा शौक में बदल जाये इससे पीछा छुड़वाना ही बेहतर विकल्प है. सेल्फी की 'अति' पर कंट्रोल रखने की जरूरत है. जिंदगी अनमोल है, एक बार ही मिली है. हमारे अपनों से जुड़ी है. इसे सेल्फी जैसे क्रेज से खत्म करना नाइंसाफी ही होगी.



टिप ऑफ़ द डे : करो टेक्नोलॉजी का यूज़ पर मत करो खुद का मिसयूज.


(कहानी के पात्र काल्पनिक हैं.)