Jan 26, 2018

“ पब्लिक “ है, ये सब जानती है




उस ऱोज पड़ोस में

फिर से हुआ था झगड़ा,

झपट पड़ी दो नारियां एक दूजे पर,

एकत्रित हो गयी पब्लिक,

स्वयंवर में खुद को आजमाने हेतु आये

राजकुमारों के मानिंद आ धमके

तथाकथित कुछ मध्यस्थ,

सुलह की कोशिशें होने लगी तीव्र,

झगड़े का कारण ज्ञात हुआ

तो

लोट-पोट हो गया मैं भी

सारी पब्लिक के साथ,

अनीता ने अपने से मात्र 2 साल बड़ी सुमन को

“ आंटी जी “ जो कह दिया था.


सारांश : कभी-कभी सामने दिखाई दे रही तस्वीरें अपने अंदर क्या सेंस ऑफ़ हयूमर छुपाएं हों, ये पता नहीं चल पाता. बात कुछ और होती है और पब्लिक कुछ और ही अंदाज़ा लगा लेती है. सच सिर्फ उसी को पता होता है, जिससे वो बात जुड़ीं होती है और समाधान भी उन्ही के पास होता है.

किसी ने सच ही कहा है: “ पब्लिक “ है, ये सब जानती है. पर सच नहीं जानती है.

सच जानने के लिए भीड़ से अलग उस बात को समझना होगा, जो ज़रूरी है. कॉमन ओपिनियन हर बार सच कैसे हो सकती है ? 

सब जानना और सच जानना अलग-अलग हो सकतें हैं पर दोनों होंगे कमाल के, ये तय है. गुदगुदाएँगे दोनों ही. कभी अकेले में, कभी साथ-साथ.

चलिए ये सब तो होता रहता है. आइए हम सब अपना योगदान देते रहें, हंसी और ख़ुशी के साथ.



  ( ये 2004 की एक छोटी सी स्वरचित कविता है. दिए गए नाम काल्पनिक हैं )