Jan 30, 2018

फीलिंग्स का असली मतलब


आपकी सोच ही आपकी डेस्टिनी है
दोस्तों, वैसे तो हमेशा से हम सुनते हैं कि हर आदमी अपना लक लेकर पैदा होता है. लेकिन सदियों से इस बात पर रिसर्च होती रही है कि हमारे सोचने का पैटर्न कैसा होना चाहिए?

· क्या हम अपने विचारों में बदलाव लाकर अपनी डेस्टिनी बदल सकते हैं? क्या हम एक ख़ुशी भरा जीवन बिता सकते हैं ?

·     क्या हम अपने स्वभाव में पाजिटिविटी लाकर दूसरों के जीवन को भी महका सकते हैं?

·     क्या हम दूसरों के दर्द और पीड़ा को समझ कर उनके जीवन में भी मुस्कान बिखेर सकते हैं?

·      क्या सिर्फ़ अपने बारें में ही सोचते रहने से हमें सच्ची ख़ुशी मिल पाती है?

·    क्या हमेशा एक ही ढर्रे पर चलते रहना बदलाव का संकेत कभी दे सकता है?

·    क्या हमें हमेशा ये ही लगता है कि दुसरे सिर्फ़ हमे धोखा देने के लिए ही पैदा हुए हैं?

·  क्या हम इतनी एजुकेशन लेने के बाद भी जातिवाद, भाई-भतीजावाद और स्वार्थवाद की गुलामी से खुद को मुक्त कर सके हैं?

·    क्या हम दूसरों के बारें में सोचने का वक़्त निकाल पाते हैं या सिर्फ उनसे उम्मीद ही करते रह जाते हैं?

·   क्या खुल के हम अपने विचार रख पाते हैं या सिर्फ़ दूसरों की जिंदगी में झाकतें रहना ही हमारी जिंदगी का मकसद है?

·    क्या खुद कुछ पाने से पहले हम दूसरों के लिए कुछ कर पाना पसंद करते हैं?

·    क्या हमें सिर्फ़ अपना रोना दिखाई देता है या हम भी कभी किसी की ख़ुशी के लिए रोये हैं?

·     क्या इस दुनिया को खुबसूरत बनाने में हमारा कोई योगदान है या हम सिर्फ़ टाइमपास करने के लिए ही पैदा हुए?

ऐसे तमाम सवाल हैं जिन पर अगर सही तरीकों से सोचा जाये और उन पर अमल किया जाये तो हो सकता है कि जिसको हम डेस्टिनी समझ कर दुखी हो जाते हैं, उसको हम बदल सकें?  
   
हम हमेशा एक कहावत सुनते हैं, जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं. ये कहावत पूरी तरह से सही हैं, क्योकि हमारा माइंड एक मोमेंट पर एक ही विचार कर सकता हैं पॉजिटिव या नेगेटिव.

और हम जब चाहे नेगेटिव थिंकिंग को पॉजिटिव थिंकिंग में बदल सकते हैं. कई बार तो किसी विषय या व्यक्ति के बारे में नेगेटिव थिंकिंग किसी एक घटना के बाद बदल जाती है. 

हमें एकदम यह पता चलता है कि किसी के बारे में हमारी राय गलत थी.
उदाहरण के लिए  – एक व्यक्ति को एक कार्यक्रम में चीफ गेस्ट बनाया गया. जब वो कार्यक्रम में पहुंचे तो सभी ने उनको नमस्कार करते हुए हाथ मिलाया. पर उनमें से एक आदमी ने उनकी तरफ देखा तक नहीं.  चीफ गेस्ट साहब को ख़ूब गुस्सा आया और उन्होंने अपने दिमाग में उस आदमी के बारे मे नेगेटिव सोच बना ली कि ये आदमी कितना घमंडी है? उन्हें बाद में किसी से बताया कि वो आदमी न तो देख सकता था और न ही कुछ सुन सकता था. इसके बाद चीफ गेस्ट साहब को ये अहसास हुआ कि उनकी सोच उस आदमी के बारे मे कितनी ग़लत थी. 

सवाल उठता है कि क्या उनका ग़लत सोचना उनकी डेस्टिनी थी या उनकी नेगेटिव थिंकिंग?

इसलिए सोच बदलिए. क्या पता डेस्टिनी हमें पॉजिटिव बनाना चाहती हो?

·       एक पल में ही हम अपनी सोच को बदल सकते हैं. करके देखिये.

·   हम लगातार खुद को नाराज करने वाली या नापसंद बाते करके नेगेटिव फीलिंग्स को जिन्दा रखते हैं. पर अच्छी बात ये है कि  हम “रूल ऑफ़ फीलिंग्स” को अप्लाई करके हमारे विचारों को बदल सकते हैं.

·  “रूल ऑफ़ फीलिंग्स” कहता है की “एक स्ट्रोंग फीलिंग हमेशा एक वीक फीलिंग पर हावी रहेगी और जिस किसी फीलिंग पर ज्यादा जोर देंगे, वो उतनी ही मजबूत होती जाएगी.

·   उत्साह और शक्ति से आदमी सदा सफल होता है पर इसका उल्टा निरुत्साही और दुर्बल मन के आदमी हर काम में फेल होते हैं. ये डेस्टिनी नहीं, सोच का परिणाम है.

·      हमें खुद को नेगेटिव थिंकिंग से दूर रखना चाहिए. मतलब कभी भी नेगेटिव की चर्चा न करें. हर बात में पॉजिटिव ढूंढने का प्रयास करें.

·     हम हर वक़्त पॉजिटिव भी नहीं रह सकतें क्योंकि वातावरण का प्रभाव भी पड़ता रहता है. नेगेटिव थॉट्स भी आते रहते हैं. उन्हें अनदेखा  करने के लिए बाहर जायें, अपना पसंदीदा गाना सुनें, जो आपको अच्छा लगे वो करते रहें. अपने क्लोज फ्रेंड्स से शेयरिंग करें जो आपके मूड को बेहतर करने में मदद करतें हो.

·     नेगेटिव एनर्जी वाले लोगों और नेगेटिव आलोचकों से दुरी बना के रखें. ऐसे लोग जीवन भर बुराई के अलावा शायद ही कुछ और सोच सकतें हैं.

·    कैसे भी हालात हो  “मैं सब कुछ कर सकता हूँ”,  “भगवान ने मुझे टैलेंट दिया है”, और “मेरा खुद पर और ख़ुदा पर पूरा भरोसा है”. खुद को इसी तरह से ऑटो – सुझाव देते रहें. आप हैरान रह जायेंगे कि लाइफ़ अब पॉजिटिव होने लगी है.