Jan 31, 2018

ख़ुशी के पल



क्या जीवन में पैसा ही सबकुछ है?

उदाहरण 1 : जमीन-ज़ायदाद भी खूब है. हँसता-खेलता परिवार है. घर पर बर्तन, सफ़ाई और कपड़े धोने के लिए मेड भी उपलब्ध है. फ्यूचर प्लानिंग भी की हुई है. सब कुछ सही है पर जब सुबह आप नौकरी पर निकलते हैं, तो भी चेहरे से ख़ुशी गायब है? पैसा है तो ख़ुशी के पल कहाँ चले गए? क्या ख़ुशी के पीछे सिर्फ़ पैसे का रोल बड़ा हुआ या कुछ और है जिसे आप मिस कर रहे हैं?

उदाहरण 2 : घर में खाने के लाले पड़ें हुए हैं. पिता जी पर क़र्ज़ का बोझ है. बड़ी बहन की शादी के लिए अच्छा लड़का नहीं मिल पा रहा है. माँ की तबियत भी ठीक नहीं रहती. उधार की सी जिंदगी है पर जब सुबह आप नौकरी पर निकलते हैं, तो चेहरे से ख़ुशी झलकती चलती  है? पैसा नहीं है तो ख़ुशी कैसे आ गयी? क्या ख़ुशी के पीछे सिर्फ़ पैसे का रोल बड़ा हुआ या कुछ और है जिसे आप एन्जॉय कर रहे हैं?

हम में से अधिकांश लोग हर सुबह ऐसी नौकरी पर जाने के लिए तैयार होते हैं जिसमे हमें ख़ुशी नहीं मिलती. कभी हमें काम करना बोरिंग लगता है तो कभी लगता है कि जैसे किसी मजबूरी के चलते हम नौकरी में फंसे हुए हैं? वास्तव में हम महीने के अंत में सैलरी के रूप में मिलने वाले पैसे के लिए काम कर रहे हैं. कभी, हमें उन पैसों की जरूरत होती है, कभी कम पैसों में भी हम काम कर सकते हैं.  

सवाल ये है कि हम क्यों ऐसे काम करते रहते हैं, जो हमारी पसंद नहीं है? इसका जवाब है वो पोपुलर धारणा कि "हम तभी खुश रहेंगे जब हमारे पास पैसा होगा".
हम इस धारणा को हर जगह देखते हैं. हम ये सोचते हुए बड़े होते हैं कि हर महीने अच्छा वेतन मिलने से रिटायरमेंट तक बहुत सारी सेविंग्स हो जाएगी जो हमारे बाद में काम आएगी.

लोगों पर की गयी अनेकों स्टडीज में ये पाया गया है कि पैसे का हमारी खुशियों पर क्षणिक प्रभाव होता है. मतलब ये कि पैसा हमें सिर्फ थोड़ी देर के लिए ही ख़ुशी देता है.

उदाहरण के लिए  - बिलकुल वैसे ही जैसे आपने आज खरीददारी की. अब आपकी ख़ुशी तभी तक रहेगी जब तक आप कोई नया विज्ञापन देख कर फिर से खरीददारी का नहीं सोचने लगते. और ये अंतहीन सिलसिला थमता नहीं, उल्टा हमें बैचनी और निराशा के कुँए में ले जाता है. पिछली ख़ुशी गायब, अगली ख़ुशी का इंतजार. बीच के लम्बे समय में उदासी, पैसों की चिंता, समाज में आगे रहने को होड़ और फिर एक दिन जलवा ख़त्म.

ये ही विचार हमें नौकरी से चिपकाये रखता है फिर चाहे हम अंदर से बिखरे ही क्यों ना पड़े हों? लोग स्वयं को दुसरें लोगों के बराबर खुश दिखने-दिखाने के चक़्कर में एक दूसरे के साथ ही कॉम्पीटीशन में लग जाते हैं जिससे न केवल उनका आपसी प्रेम और समझ ख़त्म होने लगती है उल्टा ऑफिस और घर के माहौल पर भी नेगेटिव इफ़ेक्ट पड़ने लग जाता है.


तो इसका समाधान क्या है?

आप जिस प्रकार के काम को पसंद करते हैं उस प्रकार के कार्य करने वाली कम्पनी को ज्वाइन करें या अपना खुद का कोई स्टार्ट-अप शुरू करें. स्टार्ट-अप पारम्परिक कम्पनियों की तुलना में, पूरे वर्ल्ड में नए रोजगार के अवसर सृजन करा रहे हैं. भारत में ही बहुत से लोग अपनी सामान्य नौकरी छोड़ कर अपने पसंदीदा सामाजिक या मीडिया के क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं. याद रखें की अपने पसंदीदा काम की शुरुआत करने में कभी देर नहीं होती.

आप या तो जहाँ हैं, उस जगह काम करना पसंद कर लें या फिर अपना काम कर लें. तीसरा कोई उपाय नहीं है खुश रहने का और ध्यान दें की पैसा यहाँ कही चर्चा का विषय नहीं बन रहा है. आपका नजरिया पैसे से कही ज्यादा ज़िम्मेदार है, आपकी ख़ुशी के लिए.

चाहें तो आज ही आजमा के देख लीजिये. नहीं पसंद आयें तो पूरे पैसे वापस. हा- हा.


इन शोर्ट, यदि पैसा नहीं है तो क्या हम संतुष्ट रहते हैं?

यह इस पर निर्भर करता है आप किन कामों में अपना कितना समय बिता रहे हैं. अगर आपके लिए ख़ुशी का मतलब है किताबें पढ़ना, और अपनों के साथ समय बिताना है और आप काम, उससे जुड़े मसलों, और जॉब में अधिक समय बिताते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आप खुश नहीं रहते. आप अपनी रूचि का कार्य करना शुरू करें और देखेंगे कि पैसा आप कमाने लगें हैं वो भी ख़ुशी के साथ.


तीन चीज़ें जो खरीदी नहीं जा सकतीं?

एक इंसान कामयाब होने और इसका एहसास करने के लिए उधार पर बड़ी-बड़ी और महंगी चीज़ें खरीद लेता है. यह ऐसा है जैसे कोई अच्छा महसूस करने के लिए नशा करता है. दोनों ही चीज़ें सस्ती लग सकती हैं और शायद असर भी करें, मगर सिर्फ कुछ समय के लिए. वहीं दूसरी तरफ, ये हमें लंबे समय के लिए नुकसान पहुँचा सकती हैं.

ध्यान रखिए, दुनिया की सोच हमें गुमराह करती है. जीवन के साधनों का दिखावा करना बेकार है. सच्चाई तो यह है कि ज़्यादा-से-ज़्यादा चीज़ें बटोरने की चाहत में हम इस हद तक भटक सकते हैं कि ज़िंदगी में ज़्यादा अहमियत रखनेवाली चीज़ें हमें नज़र नहीं आ पातीं.

याद रखिए, कुछ चीज़ें पैसों से नहीं खरीदी जा सकतीं. आखिर ये चीज़ें क्या हैं, आइए देखें.


पहली चीज़ है : परिवार की एकता और सदस्यों में प्यार का भाव

नॉएडा में रहनेवाली, 18 साल की नियारा कहती हैं कि मेरे पापा नौकरी और उससे मिलनेवाले पैसों को बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं. हमारे पास ज़रूरत की हर चीज़ है, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा है. फिर भी मेरे पापा कभी घर पर नहीं रहते, वे अकसर काम के सिलसिले में सफर करते रहते हैं. मेरे और मम्मी के लिए उनके पास वक़्त ही नहीं होता. मैं मानती हूँ कि पापा ये सब नौकरी की वजह से करते हैं, लेकिन परिवार के लिए भी उनकी कुछ ज़िम्मेदारियाँ बनती हैं.

ज़रा सोचिए: अगर ऐसा ही चलता रहा, तो आगे चलकर नियारा के पापा को किस बात का अफसोस रहेगा? धन-दौलत और ऐशो-आराम की चीज़ों को ज़्यादा अहमियत देने की वजह से, क्या बेटी और पत्नी  के साथ उनके रिश्ते पर कोई असर पड़ेगा? पैसों से बढ़कर, परिवार के सदस्यों को उनसे और क्या चाहिए?

सच क्या है? - पैसों से परिवार की एकता खरीदना नामुमकिन है. अगर आप परिवार में एकता हासिल करना चाहते हैं तो ज़रूरी है कि आप उनके साथ समय बिताएं, प्यार और परवाह दिखाएं.


दूसरी चीज़ है : सच्ची सुरक्षा

कानपुर की 23 साल की आशा का कहना है कि मेरी मम्मी हमेशा मुझसे कहती हैं कि मुझे ऐसे लड़के से शादी करनी चाहिए जो बहुत पैसे वाला हो. साथ ही, मुझे कुछ हुनर भी सीखना चाहिए ताकि मुसीबत की घड़ी में किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े. मम्मी को हमेशा पैसों की धुन सवार रहती है.

ज़रा सोचिए: भविष्य के बारे में योजनाएँ बनाते वक्‍त, आपको कौन-सी ज़रूरी बातें ध्यान में रखनी चाहिए? कब ये ज़रूरी बातें आपके लिए हद-से-ज़्यादा चिंता करने की वजह बन सकती हैं? सच्ची सुरक्षा के बारे में, आशा की मम्मी को किस तरह का नज़रिया अपनाने की ज़रूरत है?

सच क्या है? - सिर्फ पैसा इकट्ठा करने से हमारा भविष्य सुरक्षित नहीं होता क्योंकि पैसा कभी-भी चुराया जा सकता है. ये बीमारी या मौत को नहीं मिटा सकता. सच्ची सुरक्षा ईश्वर और उसके मकसद को समझने-जानने से ही मिल सकती है.


तीसरी चीज़ है: आत्म-संतोष

हिसार की 25 साल की सोम्या का कहना है कि मेरे माता-पिता ने मेरी परवरिश इस तरह की कि मैं सादा जीवन जी सकूं. कभी-कभी तो हमें थोड़ी चीज़ों में ही गुज़ारा करना पड़ता था. ऐसे माहौल में भी, मैं और मेरा भाई सुरेश हमेशा खुश रहते थे.

ज़रा सोचिए: कम चीज़ों में संतोष पाना क्यों मुश्किल हो सकता है? जब पैसे की बात आती है तो आप परिवार के सामने कैसी मिसाल रखते हैं?

सच क्या है? - ज़िंदगी में पैसा ही सबकुछ नहीं होता. पैसों से हर चीज़ खरीदी नहीं जा सकती. चाहे आदमी के पास बहुत कुछ हो, तो भी उसकी ज़िंदगी उसकी संपत्ति की बदौलत नहीं होती. सही मायनों में जीवन में संतोष तभी मिलेगा, जब हम हर इच्छा को मन की आँखों से नहीं बल्कि ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में देखना शुरू कर देंगे.


तो अब आप पैसा या खुशी, किसे चुनेंगे?

एक इंग्लिश बुक “खुद से प्यार करने का रोग” कहती है कि ऐशो-आराम के पीछे भागनेवाले लोग खुश कम और निराश ज़्यादा रहते हैं. पैसा पाने की चाहत रखनेवाले, मानसिक तौर पर तंदुरुस्त नहीं रहते. उन्हें सेहत से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे सिरदर्द, गले और पीठ का दर्द. पैसों के पीछे भागने से व्यक्‍ति की हालत बदतर हो जाती है. वो व्यक्ति चिडचिडा, नेगेटिव, स्वार्थी, अकड़-भरा और दगाबाज़ बन जाता है और कोई कितना भी उसे समझाए, वो किसी की भी सुनना बंद कर देता है.”



“बदलती सोच” के 2 उदाहरण

उदाहरण 1 : 1970-1990 के शुरूआती सालों में कॉलेज जाने वाले स्टूडेंट्स से पूछा गया कि उनके कॉलेज जाने की वजह क्या है? ज़्यादातर ने कहा कि वे पढ़ा-लिखा इंसान बनना चाहते हैं या ज़िंदगी में कुछ करना चाहते हैं. सिर्फ गिने-चुने स्टूडेंट्स ने कहा कि उनके कॉलेज जाने की वजह है बहुत-सा पैसा कमाना.

उदाहरण 2 : 1990-2010 में देखें तो ज़्यादातर स्टूडेंट्स ने कॉलेज जाने की सबसे बड़ी वजह बतायी कि वे बहुत-सा पैसा कमाना चाहते हैं. अचानक स्टूडेंट्स की सोच में यह बदलाव क्यों आया? जबकि एक तरफ इन्हीं स्टूडेंट्स में निराशा, आत्महत्या और दूसरी मानसिक समस्याओं से जूझनेवालों की गिनती तेज़ी से बढ़ रही है.


जरा सोचिए? सोचना ज़रूरी है. आपका भी कोई इंतजार कर रहा होगा या आप किसी का? इस वक़्त कहाँ है आप?


चलते चलते (हँसना मना है):
NASA ने “Whatsapp” के बाहर भी जीवन की सम्भावना जताई है.


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