Jan 17, 2018

एवरेस्ट पर चढ़ाई


भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर अंबेडकर नगर के शाहजादपुर इलाके में एक मोहल्ले पंडाटोला की रहने वाली अरुणिमा सिन्हा. विमेंस पॉवर की जीती जागती मिसाल अरुणिमा. आज हर कोई उनको जानना चाहता है, उनसे मिलकर उनके हौसले को सलाम करना चाहता है, उन पर गर्व करता है. ऐसा हो भी क्यों ना ? आइये जाने उनकी कहानी. एक ऐसी कहानी जो सिखाती है की मुसीबतों को कैसे मार गिरा के सफलता की नयी इबारत लिखी जाती है. दुर्घटना में अपना एक पैर खो देने के बाद भी वर्ल्ड की सबसे ऊँची पहाड़ी चोटी – एवरेस्ट को फतह करना.

अरुणिमा के बचपन का सपना था कि भारत को वॉलीबॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले. समय के साथ सपना पूरा होने लगा. पढाई भी साथ साथ चलती रही. समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन और लॉ की डिग्री. धीरे-धीरे अरुणिमा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में पहचानी जाने लगी. 

पर एक दिन अचानक 11 अप्रैल, 2011 की एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी ही बदल दी. अरुणिमा ट्रेन में लखनऊ से नई दिल्ली जा रही थीं. बरेली स्टेशन के पास चलती ट्रेन में कुछ लुटेरों ने लूटपाट के दौरान उन्हें गाड़ी से नीचे फेंक दिया. हादसे में अरुणिमा का बायां पैर ट्रेन के पहियों के नीचे आ गया. पैर कटने के साथ ही  सारे सपने मानों बिख़र गए थे. एक बार को लगा की सब ख़त्म हो गया पर पॉजिटिव सोच वाली अरुणिमा ने हार नहीं मानी. जिंदगी और मौत के बीच झूलते हुए उनका इलाज़ चलता रहा. पर बायां पैर अब जिन्दा नहीं था. डॉक्टरों ने नकली पैर लगा दिया था. अरुणिमा घर वापिस आ गयीं. लेकिन अब सब पहले जैसा नहीं था.

अरुणिमा ने कहा “ जब मैं खेलने घर से बाहर निकलती तो लोग मेरा मज़ाक उड़ाते और मुझ पर हँसते थें. बहुत दुःख होता था तब. परिवार के लोग और मेरे दोस्त मुझे देखकर पूरा दिन रोते थें. मुझे अबला और बेचारी जैसे शब्द भी सुनने पड़ते. पर ये मुझे मंजूर न था. मुझे जीना था, कुछ करना था। फ़िर मैंने मन ही मन कुछ अलग करने की ठान ली. अपनी कमज़ोरी को ताक़त बनाने की ठान ली. मेरी आँखों से आंसू निकले, लेकिन उन्हीं आंसुओं ने मुझे हिम्मत दी की मैं कुछ ऐसा करूँ जो इतिहास बने. 

मेरी शादी हुई और फिर तलाक भी. इतना कुछ होने के बाद मैंने अपने लक्ष्य को पाने के लिए पूरा जोर लगा दिया. मेरा लक्ष्य था - " विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह करने का. अब तक किसी भी विकलांग ने ये कारनामा नहीं किया था ”.

उसके बाद क्या हुआ ?  अरुणिमा एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला पर्वतारोही बछेंद्री पॉल से मिलने जा पहुंची. पॉल ने पहले तो अरुणिमा की हालत देखते हुए उन्हें आराम करने की सलाह दी लेकिन उनके बुलंद हौसलों के आगे आखिर वो  भी नतमस्तक हो गयीं. अरुणिमा ने पॉल की निगरानी में नेपाल से लेकर लेह, लद्दाख में पर्वतारोहण के गुर सीखे. नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग और टाटा स्टील ऑफ एडवेंचर फाउंडेशन से प्रशिक्षण लेने के बाद 1 अप्रैल, 2013 को उन्होंने एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू की. 53 दिनों की बेहद दुश्वार पहाड़ी चढ़ाई के बाद आखिरकार 21 मई को वे एवरेस्ट की चोटी फतह करने वाली विश्व की पहली महिला विकलांग पर्वतारोही बन गईं.

भारत सरकार ने 2015 में उनकी शानदार उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणिमा की जीवनी-'बॉर्न एगेन इन द माउंटेन'-का लोकार्पण किया भी किया और देश की महिलाओं से अरुणिमा जैसी विल पॉवर दिखाने का सन्देश भी दिया.

अरुणिमा कहती हैं, ''विकलांगता व्यक्ति की सोच में होती है”. मैं एवरेस्ट की चोटी पर चढ़कर खूब रोई थी लेकिन मेरे आंसू खुशी के थे. दुख को मैंने पीछे छोड़ दिया था और मैं दुनिया की सबसे ऊंची चोटी से जिंदगी को एक नए पॉजिटिव अंदाज में देख रही थी. हर किसी के जीवन में पहाड़ से भी ऊंची कठिनाइयां आती हैं पर जिस दिन वह अपनी कमजोरियों को ताकत बनाना शुरू कर देता है, हर कठिनाई हार मान जाती है.

आपको नमन है अरुणिमा.

टिप ऑफ़ द डे : मन के हारे हार है, मन के जीते जीत.