Feb 10, 2018

ट्रिपल फ़िल्टर टेस्ट



महान विचारक सुकरात को कौन नहीं जानता. प्राचीन यूनान में सुकरात को बहुत सम्मान से देखा जाता था और लोग जब भी किसी दुविधा में होते तो समस्या को हल कराने सुकरात के पास चले जाते थे. सुकरात को व्यवहारिक ज्ञान का प्रेरणा स्त्रोत कहा जा सकता है. 
आइये एक छोटी सी कहानी से समझे सुकरात को.

एक दिन सुकरात का एक जानकार व्यक्ति उनसे मिला और उनसे कहा, ” क्या आप जानते हैं मैंने आपके एक दोस्त के बारे में क्या सुना ?” 

“एक मिनट रुको,” सुकरात ने कहा, ” तुम्हारे कुछ बताने से पहले मैं चाहता हूँ कि तुम एक छोटा सा टेस्ट पास करो. इसे ट्रिपल फ़िल्टर टेस्ट कहते हैं.”

“ट्रिपल फ़िल्टर?”

”हां, सही सुना तुमने.”, सुकरात ने बोलना जारी रखा. इससे पहले कि तुम मेरे दोस्त के बारे कुछ बताओ, अच्छा होगा कि हम कुछ समय लें और जो तुम कहने जा रहे हो उसे फ़िल्टर कर लें. इसीलिए मैं इसे ट्रिपल फ़िल्टर टेस्ट कहता हूँ. 

पहला फ़िल्टर है ‘सच’.

क्या तुम पूरी तरह आश्वस्त हो कि जो तुम कहने जा रहे हो वो सच है?
“नहीं”, व्यक्ति बोला, ”दरअसल मैंने ये किसी दूसरे व्यक्ति से सुना है और ….....”
”ठीक है”, सुकरात ने कहा. तो तुम विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि ये सच है या झूठ.
चलो कोई बात नहीं. 

अब दूसरा फ़िल्टर ट्राई करते हैं, ‘अच्छाई’ का फ़िल्टर.

ये बताओ कि जो बात तुम मेरे दोस्त के बारे में कहने जा रहे हो, क्या वो कुछ अच्छा है?”
”नहीं, बल्कि ये तो इसके बिलकुल उलट…..”
“तो”, सुकरात ने कहा , ”तुम मुझे कुछ बुरा बताने वाले हो , लेकिन तुम आश्वस्त नहीं हो कि वो सच है. कोई बात नहीं. 

तुम अभी भी ये टेस्ट पास कर सकते हो क्योंकि अभी तीसरा और अंतिम फ़िल्टर बचा हुआ है ‘उपयोगिता’ का फ़िल्टर.

मेरे दोस्त के बारे में जो तुम बताने वाले हो, क्या वो मेरे लिए उपयोगी है?”
“हम्म्म…. नहीं, कुछ ख़ास नहीं…”

“अच्छा,” सुकरात ने अपनी बात पूरी की. यदि जो तुम बताने वाले हो वो ना सच है, ना ही अच्छा और ना ही कुछ उपयोगी तो उसे सुनने का क्या लाभ?” और ये कहते हुए वो अपने काम में व्यस्त हो गए.