Feb 13, 2018

शिव और पार्वती



देवी सती ने ही माँ पार्वती के रूप में दूसरा जन्म लिया था. शिव को पति रूप में पाने के लिए वो कठिन तप कर रहीं थी. उनकी परीक्षा के लिए शिव ने पहले सप्त-ऋषियों को भेजा. सप्त-ऋषियों ने माँ पार्वती के सामने शिव की बहुत बुराइयां की. उनके अनगिनत दोष बताये लेकिन माँ पार्वती अपने संकल्प पर अडिग रही. कुछ देर पश्चात् भोलेनाथ स्वयं आये. माँ को वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गए.

उनके जाने के बाद भी माँ का तप जारी रहा. तभी कुछ दूर पर उन्हें एक बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी. पास के तालाब में एक मगरमच्छ ने उस बच्चे की टांग अपने जबड़े में जकड ली थी. माँ ने उस मगरमच्छ से बच्चे को छोड़ देने की प्रार्थना की. मगरमच्छ ने इन्कार कर दिया. उसने कहा कि ये तो मेरा भोजन है. मैं भला इसे कैसे छोड़ दूँ? माँ पार्वती ने पूछा कि उस बच्चे को छोड़ने के बदले उसे क्या चाहिए? मगरमच्छ बोला – आपको भोलेनाथ से वरदान के रूप में जो आपके तप का फल मिला है, वो अगर आप मुझे दे दें तो मैं बच्चे को आज़ाद कर दूंगा. माँ तुरंत तैयार हो गयी. मगरमच्छ ने उन्हें समझाया कि एक छोटे बच्चे के लिए आप अपने कठोर तप का फल क्यों देना चाह रही हैं? लेकिन माँ टस से मस नहीं हुईं. उन्होंने तप का फल दान देने का संकल्प ले लिया था. उन्होंने उस मासूम बच्चे के प्राण बचाना जरुरी समझा.
जैसे ही मगरमच्छ ने बच्चे को आज़ाद किया. दिव्य रोशनियाँ चमकने लगी. मगरमच्छ और वो बच्चा दोनों गायब हो गए. भगवान शिव प्रकट हुए. दोनों रूपों में वे ही थे जो माँ की परीक्षा ले रहे थे. चूँकि माँ ने अपने तप का फल मगरमच्छ के रूप में भोलेनाथ को ही दे दिया था. इसलिए उन्हें दोबारा तप करने की जरूरत नहीं पड़ी.


जब देवी-देवताओं को भी अपनी ईमानदारी और भावनाओं की परीक्षा देनी पड़ती है तो फिर हमें भी जीवन की किसी भी परीक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए. और अगर हम सही रास्ते पर चलेंगे तो हो सकता है कि परीक्षा का सफ़र लम्बा हो परन्तु अंतत लक्ष्य तक हम पहुँच ही जायेंगे.

आप सभी को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं.

जय भोलेनाथ.