Feb 11, 2018

वैलेंटाइन्स डे




अमृता प्रीतम जी. प्यार का सागर मानो लहरों के रूप में लगातार बह रहा हो. प्रेम की साक्षात मूरत. The Mother of Love. और उनकी कविताएं जैसे प्यार को कल्पना से बाहर लाकर थाली में परोसे गाजर के हलवे की महक सा एहसास कराती करीब से गुजर रहीं हो. फिर चाहे प्यार माँ का हो, पिता का हो, बहन का, भाई का, दोस्त का और Finally हमसफ़र का. प्यार तो प्यार है. थोड़ा मीठा, थोड़ा खट्टा. पर कड़वा कभी नहीं.

इस वैलेंटाइन डे पर अमृता प्रीतम जी की ये 2 कविताएं.

पहली कविता  

मैं तुझे फिर मिलूँगी

कहाँ कैसे पता नहीं

शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन

तेरे केनवास पर उतरुँगी

या तेरे केनवास पर एक रहस्यमयी लकीर बन

ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी

मैं तुझे फिर मिलूँगी

कहाँ कैसे पता नहीं

या सूरज की लौ बन कर

तेरे रंगो में घुलती रहूँगी

या रंगो की बाँहों में बैठ कर

तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी

पता नहीं कहाँ किस तरह

पर तुझे ज़रुर मिलूँगी

या फिर एक चश्मा बनी

जैसे झरने से पानी उड़ता है

मैं पानी की बूंदें तेरे बदन पर मलूँगी

और एक शीतल अहसास बन कर

तेरे सीने से लगूँगी

मैं और तो कुछ नहीं जानती

पर इतना जानती हूँ

कि वक्त जो भी करेगा

यह जनम मेरे साथ चलेगा

यह जिस्म ख़त्म होता है

तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है

पर यादों के धागे

कायनात के लम्हों की तरह होते हैं

मैं उन लम्हों को चुनूँगी

उन धागों को समेट लूंगी

मैं तुझे फिर मिलूँगी कहाँ कैसे पता नहीं

मैं तुझे फिर मिलूँगी!!



दूसरी कविता

मैंने पल भर के लिए
आसमान को मिलना था
पर घबराई हुई खड़ी थी .
कि बादलों की भीड़ से कैसे गुजरूंगी .

कई बादल स्याह काले थे
खुदा जाने - कब के और किन संस्कारों के
कई बादल गरजते दिखते
जैसे वे नसीब होते हैं राहगीरों के

कई बादल शुकते, चक्कर खाते
खंडहरों के खोल से उठते, खतरे जैसे
कई बादल उठते और गिरते थे
कुछ पूर्वजों कि फटी पत्रियों जैसे

कई बादल घिरते और घूरते दिखते
कि सारा आसमान उनकी मुट्ठी में हो
और जो कोई भी इस राह पर आये
वह जर खरीद गुलाम की तरह आये .

मैं नहीं जानती कि क्या और किसे कहूँ
कि काया के अन्दर एक आसमान होता है
और उसकी मोहब्बत का तकाजा
वह कायनाती आसमान का दीदार मांगता है

पर बादलों की भीड़ का यह जो भी फ़िक्र था
यह फ़िक्र उसका नहीं मेरा था
उसने तो इश्क की कानी खा ली थी
और एक दरवेश की मानिंद उसने
मेरे श्वाशों की धुनी रमा ली थी
मैंने उसके पास बैठ कर धुनी की आग छेड़ी
कहा-ये तेरी और मेरी बातें
पर यह बातें बादलों का हुजूम सुनेगा
तब बता योगी ! मेरा क्या बनेगा ?

वह हंसा
नीली और आसमानी हंसी
कहने लगा
ये धुंए के अम्बार होते हैं
घिरना जानते
गर्जना भी जानते
निगाहों की वर्जना भी जानते
पर इनके तेवर
तारों में नहीं उगते
और नीले आसमान की देही पर
इल्जाम नहीं लगते

मैंने फिर कहा
कि तुम्हे सीने में लपेट कर
मैं बादलों की भीड़ से
कैसे गुजरूंगी ?
और चक्कर खाते बादलों से
कैसे रास्ता मागूंगी?

खुदा जाने
उसने कैसी तलब पी थी
बिजली की लकीर की तरह
उसने मुझे देखा
कहा
तुम किसी से रास्ता न मांगना
और किसी भी दीवार को
हाथ न लगाना
न ही घबराना
न किसी के बहलावे में आना
बादलों की भीड़ में से
तुम पवन की तरह गुजर जाना.