Feb 23, 2018

नालायक औलाद



देर रात अचानक ही पिता जी की तबियत बिगड़ गयी. आहट पाते ही उनकी नालायक औलाद यानि बेटा दीपक उनके सामने था.

माँ ड्राईवर बुलाने की बात कह रही थी, पर उसने सोचा अब इतनी रात को इतना जल्दी ड्राईवर कहाँ आ पायेगा?

यह कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे पिता जी को कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा.

पिता जी दर्द से कराहने के साथ ही उसे डांट भी रहे थे.
"धीरे चला नालायक, एक काम जो इससे ठीक से हो जाए।"

नालायक बोला "आप ज्यादा बातें ना करें पिता जी, बस तेज़ साँसें लेते रहिये, हम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं."

अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंप, वो बाहर चहलकदमी करने लगा.

बचपन से आज तक अपने लिये वो नालायक ही सुनते आया था.
उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था की उसका नाम ही शायद नालायक ही हैं.

तभी तो स्कूल के समय से ही घर के लगभग सब लोग कहते थे कि नालायक फिर से फेल हो गया.

नालायक को अपने यहाँ कोई चपरासी भी ना रखे.

कोई बेवकूफ ही इस नालायक को अपनी बेटी देगा.

शादी होने के बाद भी वक्त बेवक्त सब कहते रहते हैं की इस
बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी.

बस एक मां ही हैं, जिसने उसके असल नाम को अब तक जीवित रखा है, पर आज अगर उसके पिता जी को कुछ हो गया तो शायद वे भी..

इस ख़याल के आते ही उसकी आँखे छलक गयी और वो उनके लिये हॉस्पिटल में बने एक मंदिर में प्रार्थना में डूब गया. प्रार्थना में शक्ति थी या समस्या मामूली, डाक्टरों ने सुबह सुबह ही पिता जी को घर जाने की अनुमति दे दी.

घर लौटकर उनके कमरे में छोड़ते हुये पिता जी एक बार फिर चीखें, "छोड़ नालायक! तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही नहीं."

उदास वो उस कमरे से निकला, तो माँ से अब रहा नहीं गया. "इतना सब तो करता है, बावजूद इसके आपके लिये वो नालायक ही है?

गगन और सोमेश दोनो अभी तक सोये हुए हैं उन्हें तो अंदाजा तक नही हैं कि रात को क्या हुआ होगा? बहुओं ने भी शायद उन्हें बताना उचित नही समझा होगा.

और ये आपका नालायक दीपक बिना आवाज दिये ही आ गया और किसी को भी परेशान नही किया. भगवान न करे कल को कुछ अनहोनी हो जाती तो? और आप हैं कि? उसे शर्मिंदा करने और डांटने का एक भी मौका नही छोड़ते.

कहते-कहते माँ रोने लगी थी.
इस बार पिता जी ने आश्चर्य भरी नजरों से उनकी ओर देखा और फिर नज़रें नीची कर ली.

माँ रोते रोते बोल रही थी. अरे, क्या कमी है हमारे बेटे में?

हाँ मानती हूँ, पढाई और दुनियादारी में थोड़ा कमजोर था. तो क्या? क्या सभी होशियार ही होते हैं?

वो अपना परिवार, हम दोनों को, घर-मकान, नौकरी, रिश्तेदार और रिश्तेदारी सब कुछ तो बखूबी सम्भाल रहा है.

जबकि बाकी दोनों, जिन्हें आप लायक समझते हैं, वो बेटे सिर्फ अपने बीबी और बच्चों के अलावा ज्यादा से ज्यादा अपने ससुराल का ध्यान रखते हैं. कभी पूछा आपसे कि आपकी तबियत कैसी हैं?
और आप हैं कि ....

पिता जी बोले सरोज तुम भी मेरी भावना नही समझ पाई?
मेरे शब्द ही पकड़े बस?

क्या तुझे भी यहीं लगता हैं कि इतना सब के होने बाद भी इसे बेटा कह के नहीं बुला पाने का, गले से नहीं लगा पाने का दुःख तो मुझे नही हैं?
क्या मेरा दिल पत्थर का हैं?

सरोज, सच कहूँ तो दुःख तो मुझे भी होता ही है. पर उससे भी अधिक डर लगता है कि कहीं ये भी उनकी ही तरह “लायक” ना बन जाये.

इसलिए मैं इसे इसकी पूर्णताः का अहसास इसे अपने जीते जी तो कभी नही होने दूगाँ.
मां चौंक गई. ये क्या कह रहे हैं आप?
हाँ सरोज ........यहीं सच हैं.

अब तुम चाहो तो इसे मेरा स्वार्थ ही कह लो. "कहते हुये उन्होंने रोते हुए नज़रें नीची किये हुए अपने हाथ मां की तरफ जोड़ दिये जिसे मां ने झट से अपनी हथेलियों में भर लिया.
और कहा “अरे ...अरे ये आप क्या कर रहे हैं.” मुझे क्यों पाप का भागी बना रहे हैं. मेरी ही गलती हैं. मैं आपको इतने वर्षों में भी पूरी तरह नही समझ पाई.

और, दूसरी ओर दरवाज़े पर वो नालायक दीपक खड़ा-खड़ा यह सारी बातचीत सुन रहा था. वो भी आंसुओं में भीग गया था.

उसके मन में आया की दौड़ कर अपने पिता जी के गले से लग जाये पर ऐसा करते ही उसके पिता जी झेंप जाते. यह सोच कर वो अपने कमरे की ओर दौड़ गया.

कमरे तक पहुँचा भी नही था कि पिता जी की आवाज कानों में पङी..... अरे नालायक .....वो दवाईयाँ कहां रख दी? गाड़ी में ही छोड़ दी क्या? कितना भी समझा दो इससे एक काम भी ठीक से नही होता.
नालायक झटपट आँसू पौछते हुये गाड़ी से दवाईयाँ निकाल कर पिता जी के कमरे की तरफ दौड़ गया.

जिंदगी ख़ुशी के मारे अब ख़ुद ही रो पड़ी थी.
(दिए गए नाम काल्पनिक हैं. भाव महत्वपूर्ण हैं.)

चलते- चलते: हंसना मना है. अन्यथा न लें.
2016 : उड़ता पंजाब

2018 : उड़ता पंजाब नेशनल बैंक