Feb 11, 2018

ख़ुशी के पल




ये कहानी एक खूबसूरत और महंगे कपड़ों से सजी एक ऐसी महिला के बारे में है, जो अपने मनोचिकित्सक के पास यह शिकायत ले कर गई कि उसे लगता था कि उसका पूरा जीवन बेकार है और उसके जीवन का अब कोई मतलब नहीं रह गया है.

वह काउंसलर के पास ख़ुशी के पल पाने के लिए आई थी। काउंसलर ने अपने ऑफिस में फर्श साफ करने वाली एक बूढी महिला को बुलाया और उनसे कहा कि “आप इन अमीर महिला को बताएं कि आपने सच्ची ख़ुशी कैसे प्राप्त की”?

बूढी औरत ने अपनी झाड़ू साइड में रख दी और पास रखी कुर्सी पर बैठ गई. उन्होंने अपनी कहानी बताते हुए कहा....

मेरे पति की मृत्यु मलेरिया से हो गयी थी. और उसके तीन महीने के बाद मेरा बेटा भी एक कार एक्सीडेंट में चल बसा. मेरे पास कोई नहीं था और मेरे पास कुछ नहीं बचा था.

मैं रात को सो नहीं सकती थी. ठीक से खा नहीं पाती थी, मेरे चेहरे पर कभी मुस्कान नहीं आती थी. यहां तक कि मैं अपना जीवन समाप्त करने के बारे में सोचने लगी थी.

फिर एक दिन काम से घर लौटते वक्त एक बिल्ली मेरा पीछा करने लगी. पता नहीं कैसे पर मुझे उस बिल्ली पर दया आ गयी. बाहर बहुत ठंड थी तो मैंने उस बिल्ली को घर के अंदर आने दिया.

मैं एक प्लेट में थोड़ा दूध लेकर आई और वह चाट-चाट कर पूरी प्लेट साफ कर गई. और फिर म्याऊँ म्याऊं करके मेरे पैर को सहलाने लगी. उसे ऐसा करता देख सालों बाद पहली बार मैं मुस्कुराई.

उसके बाद मैंने अपनी सोच बदल ली. यदि एक छोटी सी बिल्ली की मदद करने से मेरे चेहरे पर स्माइल आ सकती है तो शायद दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए कुछ करने से मुझे और ख़ुशी मिले.

इसलिए अगले दिन मैंने कुछ नाश्ता बनाया और उसे लेकर अपने पड़ोसी के पास गई, जो बिस्तर पर बीमार पड़ा था. मुझे ऐसा करते देख उनकी आँखों से आंसू बह निकले. मैंने सर को ऊपर उठाया, ख़ुदा का शुक्रिया किया और ख़ुशी में मेरी भी आँखें नम हो गयी.

अब हर दिन मैं किसी न किसी के लिए कुछ अच्छा करने लगी. दूसरों को खुश देख कर मुझे इतनी ख़ुशी मिलती कि मैं उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती.

आज मैं अपने सिवा किसी अन्य को नहीं जानती जो मुझसे बेहतर भोजन और नींद लेता हो. “दूसरों को ख़ुशी देकर मैंने सच्ची ख़ुशी प्राप्त कर ली“.

यह सब सुन कर वह अमीर महिला रोने लगी. उसके पास वह सब कुछ था जो पैसे से खरीदा जा सकता है, लेकिन उसने वो चीजे खो दी थी, जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती.

दोस्तों, “जीवन की सुंदरता इस पर निर्भर नहीं करती कि आप कितना खुश हैं, बल्कि आपकी वजह से दूसरे कितना खुश हो सकते हैं”, इस बात पर निर्भर करती है.

खुशी एक मंजिल नहीं है, यह तो एक यात्रा है. ख़ुशी निर्भरता नहीं, निर्णय है.

ख़ुशी “आप क्या हैं ये है”, ना कि “आप के पास क्या है इसमें है”.



साभार: इवेलनेसएक्सपर्ट