Feb 2, 2018

किड्स एंड TV




पहले और अब के वातावरण, टेक्नोलॉजी, लाइफ-स्टाइल और एजुकेशन में पल-पल होते बदलावों का असर हमारे बच्चों पर होना ही है. ख़ासकर टेक्नोलॉजी में आई क्रांति ने संयुक्त पारिवारिक संस्कारों से एकल स्मार्टफोन संस्कारों की तरफ तेज़ी से कदम बढ़ा दिए हैं.

अब हर चीज़ ऑनलाइन उपलब्ध हो रही है. आसानी से उपलब्ध हो रही है तो सुविधाएं बढ़ी हैं. आदतों में चेंज आना उसी परिवर्तन का एक हिस्सा माना जा सकता है.

इस चेंज को स्वीकार करने की ज़रूरत है. पर साथ ही साथ इस बात को भी ध्यान में रखना होगा की आप अपनी भावी पीढ़ी को किस रूप में देखना चाहेंगे ? ख़ासकर जब आप बुजुर्ग की केटेगरी में प्रवेश करेंगे.

विषय रोचक है. समय की कमी हो तो बोरिंग भी लग सकता है. लेकिन आप इसे चाह के भी इग्नोर नहीं कर सकते. सोचना आपने है. समझना आपने है. क्योंकि बच्चों को सही आकार उनके माता-पिता से बेहतर और कोई नहीं दे सकता.

फिलहाल जानते हैं की आज से कुछ साल पहले के और आज के किड्स में क्या कॉमन है? और क्या चेंज आ रहे हैं? और आख़िरकार बच्चें होते क्या हैं?

दुनिया का हर बच्चा इनोसेंट है. हर बच्चे की नेचर अलग-अलग है. किसी को कोई काम अच्छा लगता है तो किसी को कोई दूसरा काम. हर बच्चा इस दुनिया को एक अलग नजरिये से देखता है. आप भी उनको ऐसे ही देखना शुरू कीजिये. तुलना करने से कही उसका बचपन तो ख़त्म नहीं हो रहा?

हर बच्चे के शौक अलग-अलग होते हैं. बातों और चीज़ों को एक्सप्रेस करना या चीज़ों का कलेक्शन करना सभी बच्चों को अच्छा लगता है. मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि एक्सप्रेस करना और कलेक्शन करने का स्वभाव बच्चों की मेंटल और इमोशनल स्टेज को शो करता है. ऐसी एक्टिविटी बच्चों की मेंटल एबिलिटी बढाने में भी मददगार होती देखी गयी है.

कुछ बच्चों को कार्टून्स का कलेक्शन करना अच्छा लगता है तो कुछ को इरेज़र-पेंसिलों का, कुछ को रंगीन पन्नियाँ तो कुछ को पुरानी किताबें संभाल कर रखने का शौक होता है. ऐसा बच्चे तीन कारणों से करते हैं- 1. उनको पुरानी चीज़ों से प्यार होता है या 2. वो चीज़ें कभी काम आएँगी या 3. क्रिएटिव बच्चे इन चीज़ों का यूज़ अपनी क्रिएटिविटी के काम में करते हैं.

हर माता-पिता को बच्चों को समझने के लिए उनकी एक्टिविटी पर ध्यान देना जरुरी है. उन्हें जानना होगा कि आखिर बच्चे के दिमाग में उस समय क्या चल रहा है और वह इन चीजों का कलेक्शन क्यों कर रहा है? इससे न केवल बच्चे को अच्छा लगता है, वहीँ आपको भी ये समझने में आसानी हो जाती है कि आखिरकार बच्चे को किस डायरेक्शन में आगे बढ़ाना चाहिए.  

कुछ ऐसे सवाल जिसके आंसर एज ऐ पैरेंट आपको पता होते हैं, पर क्या आप उन आंसर को अप्लाई करते हैं या अवॉयड कर जाते हैं, कारण चाहे जो भी हो.

1.  बच्चे स्कूल से घर वापस आते ही सबसे पहले अपना फैवरेट कार्टून देखना शुरू कर देते हैं. टी.वी देखने के अलावा उन्हें कोई और काम नजर ही नहीं आता. रिसर्च कहती है कि कार्टून देखने से बच्चों की काल्पनिक शक्ति पर बहुत गलत प्रभाव पड़ रहा है. वे रियल लाइफ से दूर होते जा रहे हैं. आपको भी पता है की ये सच है. आप तब क्या उपाय तलाशते हैं?

2.  टीवी देखने से आँखों पर ख़राब इफ़ेक्ट भी पड़ता है. कम उम्र में भी बच्चे की आँखों पर चश्मा लग जाता है. आप तब क्या उपाय तलाशते हैं?


3.  टीवी देखते हुए, खासकर कार्टून देखते हुए खाने-पीने की आदतों में भी बदलाव आ जाता है. अधिकतर कार्टून करेक्टर फ़ास्ट-फ़ूड, बर्गर, समोसे आदि खाते दिखाई देते हैं. अब बच्चें क्या करें? कभी-कभी अलग सा खाना ठीक है, पर एक बार आदत हो गयी तो? कैसा शरीर बनेगा आपके बच्चे का? आप तब क्या उपाय तलाशते हैं?

4.  लड़ाई, झगडा, हिंसा वाले कार्टून देख कर बच्चे चिडचिडे हो सकते हैं. मारपीट करना शुरू कर देते हैं. आप तब क्या उपाय तलाशते हैं?


5.  आप वर्किंग हैं या घर के काम में बेहद बिजी हैं. बच्चे के लिए समय नहीं निकल पा रहे. वो कोई सवाल न करे या शरारत न करे तो आपने उसे कार्टून देखने के लिए टीवी का रिमोट थमा दिया. आपका कोई दोष नहीं लेकिन बच्चे को टीवी की लत लग चुकी है. आप तब क्या उपाय तलाशते हैं?


ऐसा नहीं है कि आपको उपाय पता नहीं हों. आप बेहतर जानते हैं क्योंकि बच्चे के माता-पिता हैं. बस उन उपायों को रियल लाइफ में अपनाइए और अपने बच्चों को भी अपने जैसा रियल बनाइये. फिर जब आप बुजुर्ग होंगे तो आपको किसी बात का दुःख नहीं होगा.