Mar 21, 2018

ख़ुदा की शहनाई



उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ- 'भारत रत्न' से सम्मानित प्रख्यात शहनाई वादक
जन्म- 21 मार्च, 1916, बिहार.
मृत्यु- 21 अगस्त, 2006.
योगदान: शहनाई को विश्व भर में एक विशिष्ट पहचान दिलवाने में.
ख़ास: वर्ष 1947 में देश की आज़ादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर भारत का तिरंगा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई भी वहां आज़ादी की स्वर-लहरी गा रही थी. उसके बाद तो हर साल 15 अगस्त के दिन, प्रधानमंत्री के भाषण के बाद उस्ताद जी का शहनाई वादन एक प्रथा ही बन गयी.
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ विश्व के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक माने जाते थे. मज़हबी शिया होने के बावज़ूद ख़ाँ साहब विद्या की हिन्दू देवी सरस्वती के परम उपासक थे. बिस्मिल्लाह ख़ाँ को उनके चाचा अली बक्श 'विलायतु' ने संगीत की शिक्षा दी, जो बनारस के पवित्र विश्वनाथ मन्दिर में अधिकृत शहनाई वादक थे.

नाम के साथ का दिलचस्प क़िस्सा
उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम के साथ एक दिलचस्प वाकया भी जुड़ा हुआ है. उनका जन्म होने पर उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने उनकी तरफ़ देखते हुए 'बिस्मिल्ला' कहा. इसके बाद उनका नाम 'बिस्मिल्ला' ही रख दिया गया.

कमाल के उस्ताद
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने 'बजरी', 'चैती' और 'झूला' जैसी लोकधुनों में बाजे को अपनी तपस्या और रियाज़ से ख़ूब सँवारा और क्लासिकल मौसिक़ी में शहनाई को बेहद सम्मानजनक स्थान दिलाने में कामयाब रहे. इस बात का भी उल्लेख करना गौरवशाली है कि जिस ज़माने में बालक बिस्मिल्लाह ने शहनाई की तालीम लेना शुरू की थी, तब गाने बजाने के काम को इ़ज़्जत की नज़रों से नहीं देखा जाता था.

विदेशों में शहनाई वादन
यूरोप, अमेरिका, भूतपूर्व सोवियत संघ, जापान, हांगकांग, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ़्रीका, और विश्व भर की लगभग सभी राजधानियों में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने शहनाई का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. उनकी शहनाई की गूँज आज भी लोगों के कानों में गूँजती है.

डॉक्टरेट की मानद उपाधि
'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' और 'शांतिनिकेतन' ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान करके सम्मानित किया.

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ की असली बेगम
बिस्मिल्ला ख़ाँ शहनाई को ही अपनी असली बेगम कहा करते थे और संगीत ही उनके लिए उनका पूरा जीवन था. उस्ताद पर लिखी किताब ‘सुर की बारादरी’ के लेखक यतीन्द्र मिश्र लिखते हैं- "ख़ाँ साहब कहते थे कि संगीत वह चीज है, जिसमें जात-पात कुछ नहीं है. और संगीत किसी मजहब का बुरा नहीं चाहता."

रिकॉर्ड–तोड़ जुगलबंदी
उस्ताद विलायत ख़ाँ के सितार और पण्डित वी. जी. जोग के वायलिन के साथ ख़ाँ साहब की शहनाई जुगलबंदी के एल. पी. रिकॉडर्स ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले. इन्हीं एलबम्स के बाद जुगलबंदियों का दौर चला. संगीत-सुर और नमाज़ इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह ख़ाँ के लिए सारे इनाम-इक़राम, सम्मान बेमानी थे.

फ़िल्मी सफ़र में उस्ताद का जलवा
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने कई फ़िल्मों में भी संगीत दिया. उन्होंने सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘जलसाघर’, कन्नड़ फ़िल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, और हिंदी फ़िल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ के लिए शहनाई की धुनें छेड़ी. आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फ़िल्म ‘स्वदेश’ के गीत ‘ये जो देश है तेरा’ में शहनाई की मधुर तान उनकी बिखेरी आखिरी तान थी.

उस्ताद से भी बढ़ कर थे एक संत
बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब एक ऐसे इंसान और संगीतकार थे कि उनकी प्रशंसा में संगीतकारों के पास भी शब्दों की कमी नज़र आई. पंडित जसराज का मानना है- उनके जैसा महान् संगीतकार न पैदा हुआ है और न कभी होगा. वो हमेशा सबको अच्छी राह दिखाते और बताते थे. वो एक ऐसे फरिश्ते थे जो धरती पर बार-बार जन्म नहीं लेते हैं और जब जन्म लेते हैं तो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते है. बाँसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया का कहना है- बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब भारत की एक महान् विभूति थे. अगर हम किसी संत संगीतकार को जानते है तो वो हैं बिस्मिल्ला खा़न साहब.

सम्मान
सन 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
सन 1961 में पद्म श्री
सन 1968 में पद्म भूषण
सन 1980 में पद्म विभूषण
2001 में भारत का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न

कठिन समय
बिस्मिल्ला ख़ान ने एक संगीतज्ञ के रूप में जो कुछ कमाया था वो या तो अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में या फ़िर लोगों की मदद में ख़र्च हो गया था. एक समय ऐसा भी आया जब वो आर्थिक रूप से मुश्किलों में घिर गए थे. तब सरकार ने आगे आकर उनकी मदद की.

अंतिम इच्छा और उस्ताद का निधन
21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में इनका देहावसान हो गया. उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी. लेकिन अपनी यह इच्छा पूरी होने से पहले ही वो चल बसे. ख़ुदा की इच्छा के आगे किसका बस चलता है.

आज उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान साहब के 102वें जन्मदिवस पर उनको नमन.