Mar 3, 2018

चंद्रशेखर आज़ाद



चंद्रशेखर आजाद. क्रांति का एक ऐसा शेर जो आजीवन देश के लिए जिया और अंतत देश के लिए ही मौत के मुहं में समा गया. वो घिरा लेकिन डरा नहीं. दुश्मनों को उनके नाम से ही पसीना आ जाता था. और ये शेर जहां भी निकल पड़ता, वही से जोश और आज़ादी का जुनून लोगों के सर चढ़ के बोलने लगता.

चंद्रशेखर आज़ाद एक महान भारतीय क्रन्तिकारी थे. उनकी देशभक्ति और साहस ने लोगों को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लड़ने हेतु प्रेरित किया. उन्हें भगत सिंह के सलाहकार भी कहा जाता है. भगत सिंह, आज़ाद और सुखदेव की तिकड़ी को भारत के सबसे महान क्रांतिकारियों की त्रिमूर्ति माना जाता है.

आज़ाद का बचपन :
1.  चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजाद नगर) (वर्तमान अलीराजपुर जिला) में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था.
2.  उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था. आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी अकाल के समय में अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे. फिर कुछ दिनों बाद जाकर भाबरा गाँव में बस गये. यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता.
3.  चंद्रशेखर कट्टर सनातनधर्मी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे. इनके पिता नेक, स्वाभिमानी और दयालु प्रवर्ति के थे.
4.  बचपन से ही चंद्रशेखर में “भारत माता” को आज़ाद कराने की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी. इसी के चलते उन्होनें स्वयं ही अपना नाम आज़ाद रख लिया.


आज़ाद घर से भागे?
5.  चन्द्रशेखर की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही प्रारम्भ हुई. पढ़ाई में उनकी रूचि कभी नहीं रही. फ़िर भी इनके पिता के करीबी मित्र पं. मनोहर लाल त्रिवेदी जी ने इन्हें पढाया.
6.  चन्द्रशेखर के माता पिता उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहते थे किन्तु चौथी क्लास  तक आते-आते इनका मन घर से भागकर जाने के लिये पक्का हो गया था. आज़ाद बस बस घर से भागने के सही मौके का इन्तजार कर रहे थे.
7.  उनके अंदर देश-प्रेम का जूनून सवार था. एक दिन उचित अवसर मिलने पर चन्द्रशेखर आजाद घर से भाग गये.


असली क्रांतिकारी के रूप में जन्म:
8.  गांधीजी ने आज़ाद को असहयोग आन्दोलन से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. आज़ाद नाराज थे. तभी उनकी मुलाकात युवा क्रांतिकारी प्रन्वेश चटर्जी से हुई, जिन्होंने उन्हें राम प्रसाद बिस्मिल से मिलवाया. बिस्मिल “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन” (HRA) के संस्थापक थे. और HRA एक क्रांतिकारी संस्था थी. जब आजाद ने एक कंदील पर अपना हाथ रखा और तब तक नही हटाया जब तक की उनकी त्वचा जल ना जाये तब आजाद को देखकर बिस्मिल काफी प्रभावित हुए.

9.  इसके बाद चंद्रशेखर आजाद हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के एक्टिव मेम्बर बन गए थे और एसोसिएशन के लिये चंदा इकठ्ठा करने में मदद करते थे. उन्होंने ज्यादातर चंदा सरकारी तिजोरियो को लूटकर ही जमा किया था. वे एक नये भारत का निर्माण करना चाहते थे जो सामाजिक तत्वों पर आधारित हो.

10. 1925 में काकोरी कांड के बाद अंग्रेजों ने क्रांतिकारी गतिविधियो पर अंकुश लगा दिया था. इस काण्ड में रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाकउल्ला खान और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फांसी की सजा हो गयी थी. किसी तरह आजाद बच कर निकल गये. बाद में कुछ क्रांतिकारीयो की मदद से उन्होंने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को पुनः जीवित किया. अब उनका मकसद समाजवाद के आधार पर स्वतंत्रता पाना था.

11. चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसे ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाया जो सामान्य लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध दमनकारी नीतियों के लिए जाने जाते थे. आज़ाद काकोरी ट्रेन डकैती (1926), वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने के प्रयास (1926), और लाहौर में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स को गोली मारने (1928) जैसी घटनाओं में शामिल थे.

12. आज़ाद को सबक सिखाने के लिए पुलिस ने दिसंबर की कड़ाके वाली ठंड की रात में  गिरफ़्तार आज़ाद को ओढ़ने – बिछाने के लिए कोई बिस्तर नहीं दिया. पुलिस वालोँ का ऐसा मानना था कि यह लड़का ठंड से घबरा जाएगा और माफी माँग लेगा, किंतु ऐसा नहीं हुआ. यह देखने के लिए लड़का क्या कर रहा है? और शायद वह ठंड से ठिठुर रहा होगा. आधी रात को इंस्पेक्टर ने चंद्रशेखर की कोठरी का ताला खोला तो वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि चंद्रशेखर दंड-बैठक लगा रहे थे और उस कड़कड़ाती ठंड में भी पसीने से नहा रहे थे. 


  चंद्रशेखर आज़ाद की मौत:
13. आजाद की मौत इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को हुई. मुखबिरों से जानकारी मिलने के बाद ब्रिटिश पुलिस ने आज़ाद और उनके साथियों को चारों तरफ से घेर लिया था. आज़ाद बड़ी बहादुरी से अंग्रेजों का सामना कर रहे थे और इसी वजह से सुखदेव भी वहा से भागने में सफल रहे. लंबे समय तक चलने वाली गोलीबारी के बाद आज़ाद चाहते थे कि वे पुलिस के हाथ ना लगे, और जब पिस्तौल में आखिरी गोली बची तब उन्होंने वह आखिरी गोली खुद को ही मार ली. आजाद की वह पिस्तौल आप आज भी इलाहाबाद के म्यूजियम में देख सकते हैं.


जिस पार्क में उनका निधन हुआ था, आज़ादी के बाद इलाहाबाद के उस पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आजाद पार्क रेखा गया है. मध्य प्रदेश के जिस गांव में वो रहे, उसका नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया है.


देश के इस अनमोल रत्न को नमन.