Mar 20, 2018

फ़क़ीर का सपना

एक मुसलमान फकीर हुए हैं - हाजी मोहम्मद.

बड़े ही धर्मात्मा पुरुष थे.
एक रात हाजी ने एक सपना देखा कि वह मर गया है और एक चौराहे पर खड़ा है, जहां से एक रास्ता स्वर्ग को जाता है और एक रास्ता नरक को; एक रास्ता पृथ्वी को जाता है, एक मोक्ष को.

चौराहे पर एक ख़ुदा का दूत खड़ा है - एक फरिश्ता. और वह हर आदमी को उसके कर्मों के अनुसार रास्ते पर भेज रहा है.

हाजी मोहम्मद तो जरा भी घबराया नहीं; जीवनभर फ़कीरी में था. हर दिन की नमाज पांच बार पूरी पढ़ी थी. साठ बार हज यात्रा की, इसलिए हाजी मोहम्मद उसका नाम हो गया. जाकर खड़ा हो गया ख़ुदा के सामने.

ख़ुदा ने कहा, 'हाजी मोहम्मद! इशारा किया, 'नरक की तरफ यह रास्ता है.’
हाजी मोहम्मद ने कहा, 'आप समझे नहीं शायद. कुछ भूल-चूक हो रही है. साठ बार हज किये हैं हमने.’
ख़ुदा ने कहा, 'वह व्यर्थ गयी;
वो कैसे जनाब? – हाजी ने पूछा.
क्योंकि जब भी कोई तुमसे पूछता तो तुम कहते, हाजी मोहम्मद!
तुमने उसका काफी फायदा जमीन पर ले लिया. तुम बड़े अकड़ गये उसके कारण. कुछ और किया है?'

हाजी मोहम्मद के पैर थोड़े डगमगा गये. जब साठ बार की हज व्यर्थ हो गयी, तो अब आशा टूटने लगी। उसने कहा, 'हां जी, रोज पांच बार की नमाज पूरी - पूरी पढ़ता था.’
उस ख़ुदा ने कहा, 'वह भी व्यर्थ गयी; क्योंकि जब कोई देखने वाला होता था तो तुम थोड़ी देर तक ही नमाज पढ़ते थे. पर जब कोई भी न होता तो तुम जल्दी खत्म कर देते थे. तुम्हारी नजर मुझ पर नहीं थी; देखने वालों पर थी. एक बार तुम्हारे घर कुछ लोग बाहर से आये हुए थे, तो तुम बड़ी देर तक नमाज पढ़ते रहे. वह नमाज झूठी थी. ध्यान में मैं ना था, वे लोग थे. लोग देख रहे है तो जरा ज्यादा नमाज, ताकि पता चल जाये कि मैं धार्मिक आदमी हूं - हाजी मोहम्मद; वह भी बेकार गयी; कुछ और किया है?'

अब तो हाजी मोहम्मद और घबरा गया और घबराहट में उसकी नींद टूट गयी.
सपने के साथ जिंदगी बदल गयी. उस दिन से उसने अपने नाम के साथ हाजी बोलना बंद कर दिया. नमाज छिपकर पढ़ने लगा; किसी को पता भी न हो. गांव में खबर भी पहुंच गयी कि हाजी मोहम्मद अब धार्मिक नहीं रहा. कहते हैं कि नमाज तक बंद कर दी है. बुढ़ापे में सठिया गया है.

लेकिन उसने इसका कोई खंडन न किया. वह चोरी छिपे नमाज पढ़ता. वह नमाज सार्थक होने लगी.
कहते है, मरकर हाजी मोहम्मद स्वर्ग गया.