Mar 21, 2018

महात्मा बुद्ध

बात उन दिनों की है जब महात्मा बुद्ध विश्व में भ्रमण करते हुए लोगों को ज्ञान बांटा करते और बौद्ध धर्म का प्रचार किया करते.

एक बार महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक वृक्ष नीचे ध्यान मुद्रा में बैठे थे.
अचानक एक बूढी औरत वहां रोती–बिलखती हुई आई और गौतम बुद्ध के चरणों में गिर पड़ी. और बोली – हे बुद्ध, मैं दुनिया की सबसे दुखी औरत हूं. मैं अपने जीवन से बहुत ही परेशान हूं.
महात्मा बुद्ध – क्या हुआ? आप क्यों दुखी हैं?
बूढी औरत- हे बुद्ध, मेरा एक ही बेटा था जो मेरे बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था. कल रात तेज बुखार से उसकी मृत्यु हो गयी. उसके जाने के बाद मेरे ऊपर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. मैं बहुत दुखी हूं. भगवान् ने मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया? अब मैं किसके सहारे जीऊँगी?
महात्मा बुद्ध – हे माता! मैं आपके दुख को समझ सकता हूं. आप एक काम करें. आप मुझे किसी ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल लाकर दें, जिस घर में कभी किसी की मृत्यु ना हुई हो. फिर मैं आपकी समस्या का हल बताऊँगा.
औरत धीमे क़दमों से गांव की ओर चल पड़ी. पूरे दिन वो इधर से उधर, सभी लोगों के घर में भटकती रही. लेकिन उसे कहीं भी ऐसा घर नहीं मिला जहां कभी किसी की मृत्यु ना हुई हो और जहां कोई दुख ना हो. वो जिससे भी मिली, हर कोई अपने दुखों से परेशान था. सबके पास अपनी अलग-अलग समस्या थी. पर थी.
शाम को वह औरत फिर से महात्मा बुद्ध के पास पहुंची. औरत को खाली हाथ वापिस आया  देखकर बुद्ध ने कहा- हे माता! क्या हुआ? आप खाली हाथ क्यों लौट आयीं?
बूढी औरत – हे बुद्ध, मैं तो पूरे गांव में घूम आई. लेकिन मुझे एक भी घर ऐसा नहीं मिला जहां कभी किसी की मृत्यु ना हुई हो. और तो और, सभी लोगों के पास अपना अलग दुख था.
बुद्ध बोले – हे माता. यही बात मैं आपको बताना चाहता था कि इस दुनिया में हर कोई दुखी है. सबके पास दुख का अपना-अपना कारण है. आप ये मत सोचिये कि भगवान ने आपके साथ कुछ गलत किया है. जब तक जीवन है सुख-दुख चलता ही रहेगा. 
जैसे दिन के बाद रात आती है और फिर रात के बाद दिन. ठीक वैसे ही सुख के बाद दुख आएगा और फिर दुख के बाद सुख. सुख और दुख जीवन के महत्वपूर्ण अंग हैं. केवल वही इंसान दुख से बच सकता है, जिसे सुख की चाह ना हो.