Mar 22, 2018

Digital IQ -EQ



आज की दुनिया डिजिटल थिंकिंग के संस्कारों की तरफ जाती दिख रही है.
कोई भी देश हो. वो ज्यादा से ज्यादा ख़ुद को अपग्रेड करने के प्रयास करते नज़र आ रहें हैं. और अधिकतर प्रयास इस तरफ़ हैं कि किस तरह से साइकोलॉजिकल IQ को Digital IQ-EQ में बदला जाये. विकसित देश और विकसित और ताकतवर होने की कोशिशों में जुटे हैं. 

विकासशील देश भी प्रयत्न कर रहें हैं कि डेवलपमेंट की दौड़ में आगे निकले. सब डिजिटल टेक्नोलॉजी के माध्यम से ख़ुद को आत्मनिर्भर और प्रभावशाली बनाने में जुट चुकें हैं. 

आने वाला समय रोबोटिक्स, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और डाटा एनालिसिस का होगा.

देखना प्रासंगिक होगा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस दिशा में कब तक परिपक्वता से आगे बढेगा? अत्याधिक जनसँख्या और बहुमुखी अंतःकरण के चलते अभी ये लोकतंत्र सास-बहु और साजिश, योग्यता के सही मूल्यांकन के विकसित तरीकों के अभाव, उपजी बेरोजगारी और युवाओं की बढ़ी फ़ौज, जात-पात की दीवारों, किसानों से जुड़ी समस्याओं, विवादों के वायरल विडियो, और न समझ आ सकने वाले न जाने कितने ही इश्यूज से अनावश्यक ही जूझ रहा है. ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ़ खोखलापन है. नहीं. बिलकुल नहीं. कमाल की एनर्जी है. कमाल के IQs हैं. देश के लिए समर्पण का ज़ज्बा है. विभिनताओं में विशेषता, एकता और अपनापन है. लालच की मात्रा भी बेहद कम है. एक-दुसरे की मदद के लिए सब तैयार मिलते हैं. बस जरुरी जागरूकता की तरफ़ झुकाव का अभाव है. 

गैर-जरुरी आउट-डेटेड लाइफ ट्रेनिंग मैकेनिज्म की जगह विज़न ओरिएंटेड फ्यूचरिस्टिक माइंड-सेट मॉडल्स अपनाने की जरुरत है. एक-दुसरे को ये समझाने की जरुरत है. और सबसे बड़ी बात ये कि सबसे पहले ये उन्हें समझना होगा जिनके द्वारा ये विज़न आसानी से हर कोई अडॉप्ट कर सके. चूंकि सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो अधिकतर समस्याएं भी रीजनल मल्टीपल बिहेवियर ओरिएंटेड हो सकती हैं. जिन्हें सुलझाना ऐसा है जैसे किसी स्वेटर के रुओं को साफ़ करना. टफ है. लेकिन नामुमकिन नहीं. 

चूंकि रोजगार की जरुरत सबको है और वो रीयलिस्टिक स्किल डेवलपमेंट से ही संभव है तो सही दिशा की तरफ़ चला जाये तो सबसे बड़ा लोकतंत्र दुनिया के लिए मिसाल भी बन सकता है. मगर याद रहे, टेक्नोलॉजी पल-पल बदल रही है. विचारधारा Digitalized होती जा रही है. सही समय पर लिया गया कोई भी निर्णय महान फल दे सकता है. वहीँ दूसरी तरफ़ समझने के बाद भी अगर अवॉयड कर गए तो रही-सही पहचान भी लुप्त होने में देर नहीं लगेगी. 

ज़िम्मेदारी समाज के हर अंग और हर व्यक्ति की है. एक-दूसरे पर चीज़ें थोप कर ज्यादा दिन खुशहाल रहने के खयाली पुलावों से बाहर आकर सोचने का समय है. क्या पता, सबसे बड़ा लोकतंत्र इतिहास की सबसे बड़ी इबारत लिखने में कामयाब हो जाये.

(इस छोटे से आर्टिकल को लिखते हुए मुझे डॉ. शक्ति का चेहरा बार-बार याद आता रहा. देश को उन जैसे प्रेरणा-स्त्रोतों की बहुत आवश्यकता है. छोटे से लेकर बड़े तक - वो किसी को भी, कुछ भी सीखा सकते हैं. थैंक यू डॉ. शक्ति. मुझे बेहद ख़ुशी महसूस होती है. क्योंकि मुझे भी कुछ दिन आपके साथ रहने का मौका मिला और इस दरमियाँ कुछ अलग नज़रिए से लाइफ को सोच पाया.)