Mar 25, 2018

खेत

एक गुरु अपने एक शिष्य के साथ किसी रास्ते से गुजर रहा था. चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे. खेत अच्छी जगह पर स्थित था. खेत का नक्शा भी उम्दा था. लेकिन उसकी जर्जर हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है.

दोनों को बहुत प्यास लगी थी. वे खेत के बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया. अन्दर से एक आदमी निकला. उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे. सभी फटे-पुराने कपड़ों में थे.
गुरु ने कहा, “क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है.” “जी अवश्य”, आदमी ने कहा.

“मैं देख रहा हूं कि आपका खेत इतना बड़ा है. पर इसमें कोई फसल नही बोई गयी है. और ना ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं. तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, गुरु ने प्रश्न किया.

“जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है. उसे पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का इस्तेमाल कर के हमारा गुजारा चल जाता है.”, आदमी ने समझाया. गुरु और शिष्य आगे बढ़ने को हुए, तभी आदमी बोला, “शाम काफी हो गयी है. आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं.” दोनों रुकने को तैयार हो गए.

आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे, तभी गुरु ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहां से चलना है, और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को अपने साथ ले चलेंगे.” अपने आश्रम में रख लेंगे और कुछ दिनों बाद वापिस कर देंगे.

शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था. पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था. दोनों भैंस को अपने साथ लेकर रातों-रात गायब हो गए.

यह घटना शिष्य के दिमाग में बैठ गयी. कुछ सालों बाद, उसके गुरु ने कहा कि “समय आ गया है. जाओ और उस आदमी को उसकी भैंस वापिस कर दो.” शिष्य भैंस को लेकर उसी खेत के सामने पहुंचा. उसे मन ही मन पश्चाताप महसूस हो रहा था कि पता नहीं कि बिना भैंस के उस परिवार का क्या हुआ होगा?

जब वो उस जगह पर पहुचा. उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. वह उजाड़ खेत अब फलों के बगीचे में बदल चुका था. टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था. और जहां अकेली भैंस बंधी रहती थी, वहां अच्छी नस्ल की कई गायें और भैंस अपना चारा खा रही थीं. सब कुछ सामान्य से बहुत अच्छा था.

शिष्य ने सोचा कि शायद भैंस के खो जाने के बाद वो परिवार सबकुछ बेच कर कहीं चला गया होगा. और नए मालिक ने ये सब किया होगा. वो उस भैंस को वही छोड़ कर वापस लौटने लगा. कुछ दूर चलने पर उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखाई दिया. शिष्य ने उस आदमी को पहचानते हुए कहा “शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए, सालों पहले मैं आपसे मिला था”. आदमी शिष्य की तरफ़ बढ़ा. उसके पैरों को छुआ और बोला. “नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं है. मुझे अच्छी तरह याद है. आप और आपके गुरु जी यहां आये थे. कैसे भूल सकता हूं उस दिन को? 

उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया. आप लोग तो बिना बताये चले गए. पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी हमें छोड़ कर चली गयी. कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें? पर जीने के लिए कुछ तो करना था. तो मैं लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बुवाई कर दी. सौभाग्य से फसल बहुत ही अच्छी निकल आई. फ़सल बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बगीचे लगवा दिए और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के गावों का सबसे सफ़ल फल व्यापारी बन चुका हूं.

सचमुच, ये सब कुछ ना हुआ होता अगर उस दिन मेरी भैंस मुझे छोड़ कर ना जाती. शिष्य हैरानी से देखता रह गया. “लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा.

आदमी बोला, “बिलकुल कर सकता था”. पर तब ज़िन्दगी बिलकुल कम मेहनत के भी बड़े आराम से चल रही थी. मुझे कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है. इसलिए कभी कोशिश ही नहीं की. पर जब भैंस चली गयी, तब हाथ-पैर मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब इंसान भी इस मुकाम तक पहुंच गया. ये सब आपके गुरु और आपके आशीर्वाद से ही हो सका है. 

अब शिष्य अपने गुरु के उस आदेश का असली मतलब समझ चुका था. अब वो बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट पा रहा था. उसकी प्रसन्नता चरम पर थी. गुरु की दिव्यदृष्टि अब जाकर उसकी समझ में आई थी. उसने मन ही मन गुरु को नमस्कार कर आभार प्रकट किया और वहां से चल पड़ा.

सोचिये, कहीं आपकी ज़िन्दगी में भी तो कोई ऐसी भैंस नहीं जो आपको एक बेहतर ज़िन्दगी जीने से रोक रही हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको लगता हो कि आपने उस भैंस को बाँध कर रखा है. जबकि वास्तव में उस भैंस ने आपको बाँध रखा है. 

हम भी, हमारे विचारों से ठीक उसी तरह से बंधे रहते हैं जैसे वो भैंस. अब वो भैंस सही है या हम? समय-समय पर ये जांच करते रहना ही इस कहानी को आपके सामने रखने का मूल उद्देश्य है.