Mar 20, 2018

आज़ाद



एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे. सेठजी ने अपने घर पर पिंजरे में एक तोता पाला हुआ था.

तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि “सेठजी आप रोज कहाँ जाते है”. सेठजी बोले कि भाई हम तो सत्संग में ज्ञान सुनने जाते हैं. तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ? तब सेठजी कहते हैं कि ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता है. इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता है.

तोता कहता है कोई बात नही सेठजी, आप मेरा एक काम करना. सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि मैं आजाद कब होऊंगा?

सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है कि महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा है कि वो आजाद कब होगा? संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है, वो बेहोश होकर गिर जाते हैं. सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहां से निकल जाते हैं.

घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा? सेठजी कहते है कि तेरी तो किस्मत ही खराब है. तेरी आजादी का पूछते ही महात्मा जी बेहोश हो गए. तोता कहता है कोई बात नही सेठजी, मैं सब समझ गया.

दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता है. सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है. 

सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है कि कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहां हैं? सेठजी कहते हैं, हां महाराज, आज सुबह-सुबह वो जानबुझ कर बेहोश हो गया. मैंने सोचा कि वो मर गया है. इसलिये मैंने उसे जैसे ही उसे पिंजरे से बाहर निकाला तो वो फुर्र से उड़ गया.

तब संत ने सेठजी से कहा कि देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो, बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर वो आजाद हो गया.

सारांश :
हम सत्संग में तो जाते हैं, ज्ञान की बातें भी करते हैं. सुनते भी हैं. पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में हीं उलझा रहता है. सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को पसंद करते हैं, जिसमें हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है. हमें वहां भी मान-यश मिल जाये, यही सोचते रहते हैं. जबकि सत्संग में जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर सभी बातों को महत्व देना चाहिये. और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं उसे साहस के साथ मन से उतार कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए. फ़िर हम आज़ाद महसूस करते हैं. और अपने साथ-साथ दूसरों के लिए भी अच्छा सोचना सीख सकते हैं. ये ही सच्चा सत्संग है.