Mar 22, 2018

डिजिटल देवता



मानवीय सभ्यता के उदय से ही भारत अपनी शिक्षा तथा दर्शन के लिए प्रसिद्ध रहा है. भारतीय संस्कृति ने दुनिया का हमेशा ही मार्गदर्शन किया है.

और आज भी जब शिक्षा और विज्ञान के आधुनिक तरीकों पर बात होती है तो ये ध्यान देने वाला तथ्य है कि बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनीज के सर्वे-सर्वा भी आधारभूत रूप से भारत से ही सम्बन्ध रखते हैं. वो ही विश्व को नए आइडियाज और इनोवेशन देने में बड़ी भूमिकाओं में दिखाई देते हैं. साथ-ही साथ नैतिक और सामाजिक स्वभाव भारतीयों की एक बड़ी आध्यात्मिक धरोहर है. 

ये साइंस-टेक्निक-मोरल मॉडल का संगम ही भारत को आगे ले जाने में पर्याप्त है. बस दिशा और दशा पहचानने की ओर कदमताल करना बाकी रह जाता है. वर्तमान युग में भी नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, दार्शनिक और शिक्षा क्षेत्र के अनुभवी इसी बात का प्रयास कर रहे हैं कि भारत में इस युग की शिक्षा के उचित उद्देश्यों का निर्माण कैसे हो? 

प्राचीन समय में भारतीय शिक्षा के उद्देश्य स्पष्ट हुआ करते थे. फ़िर हम गुलाम हुए. और ऐसे गुलाम हुए कि आजादी के सालों बाद भी शायद ही ऊबर सकें हो. पहले था. सबके लिए अच्छा हो जाये और अब तो आप देखेंगे कि बड़े से बड़े क्वालिफाइड, सम्मानित और प्रतिभावान भी इसी चक्कर में घूम गए हैं कि "मैं और मेरे". सब के लिए समान रूप से सोचने की उनकी शक्ति जैसे किसी ने छीन ली हो. या के उन्होंने मान लिया है कि कुछ नहीं बदलने वाला? 

साहब, आपके बिना क्या और कैसे बदलेगा? यूथ तो आपकी तरफ़ नज़र गडाये उम्मीदों से देख रहा है. उसके सपनों और और आगे की पूरी जिंदगी का तो थोड़ा सोचिये. आप नहीं तो कौन? वो तो हार मान लेगा. फ़िर आप झट से कह देंगे की यूथ में तो संस्कार ही नहीं बचे. साहब, संस्कार देगा कौन? और यूथ संस्कार ले किससे? कोई इनपुट-आउटपुट सीरीज तो बनाइये?

कमाल हो रहा है. ये आज़ादी के बाद का दौर है. विश्वास नहीं होता. 21वीं सदी की सोच है? समझने से परे है. युवा, अनुभवी मार्ग-दर्शकों की तरफ टकटकी लगाये देख रहा है पर वो मार्ग-दर्शक किस दिशा में ध्यान-मग्न हैं, पता ही नहीं चल पा रहा. अनगिनत उम्मीदों, शानदार उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आपको इतना ऊँचा स्थान मिला है. साहब, आप के पास सोच है, साधन है, विज़न है. आपके रहते भी हमारे युवा रट्टू तोता बनेंगे या फिर कुछ नहीं बनेंगे तो क्या होगा?

साहब, कुछ तो सोचिये. सारा भारत डिवाइड होता जा रहा है. और ये कहाँ जा रहा है? और आने वाले 30 सालों में कहाँ जायेगा? आप कह सकते हैं साहब. आप कर सकते हैं साहब. आप हमारी उम्मीदें हैं. सबका सोचिये ना.

आप सबके हाथों में नीति-निर्धारण की लाल किताब है. लिख दीजिये कुछ ऐसा कि सकारात्मक बदलाव के फूल खिल सकें. और सबके बगीचे मुस्कुरा उठें. इंसान हैं सब साहब. जीना तो सभी का बनता है.

शिक्षा के सही माप-दंड बना डालिए. कब करेंगे. आपको पता है? दुनिया रोबोट बना रही है और हमारे युवा अपने टीचर्स को गोलियां मारने लगे हैं. साहब, जिस देश में नारी को देवी तुल्य माना जाता रहा हो, वहां दिन दहाड़े लड़कियों को उठाने का विज्ञान विकसित हो रहा है. ये भारत की कौन सी विरासत का हिस्सा है? क्या इतना गिर जाने के बाद हम दुनिया के आगे गर्व से सीना तान के, आँख से आँख मिला कर बात कर सकते हैं?

साहब, कुछ सोचिये ना? कुछ रीयलिस्टिक करिए ना? सबके लिए करिए ना?
आज़ादी के उन दीवानों को याद करिए जो सिर्फ़ इसीलिए चले गए कि हम सभी खुली हवा में साँसें ले सकें.
आप आगे आइये. फ़िर देखिये. उनकी आत्मा भी आशीर्वाद देगी. युवा भी समझदारी दिखा सकेंगे. पेंशन की टेंशन छोड़िये ना. हम संभालेंगे आपको. पर अभी आप के हाथों में है सब करना. अभी तो भारतीय युवाओं के डिजिटल देवता Facebook और Whatsapp ही बने हुए हैं.

देखिये साहब, कितने अकेले हैं युवा हमारे. कुछ और कर ही नहीं पा रहे वो. कोई उनसे बात करने वाला, उनकी सुनने वाला, उनको सुनाने वाला नहीं है. फ़िर ये क्या करेंगे? पॉजिटिव हो पाएंगे, ऐसा तो मुश्किल ही लगता है. आप ही कर सकते हैं इन्हें पॉजिटिव. अब एडिक्शन पकड़ रहा है इन्हें. और ये कुछ दिनों में मोबाइल में ही 2 बेडरूम सेट ना बना लें? और साहब, ये विज्ञान या इंजीनियरिंग नहीं है.

चलिए. जब आपको समय मिले तो सोचियेगा साहब.
अभी सबको शहीदी दिवस मुबारक हो.