Apr 17, 2018

उस रात बाप - बेटे ने काफ़ी देर तक बातें की.

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सुनील किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा. सुनील ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया. अब फाइनल इंटरव्यू कंपनी के डायरेक्टर को लेना था. और डायरेक्टर को ही तय करना था कि सुनील को नौकरी पर रखा जाए या नहीं?


डायरेक्टर ने सुनील का बायोडाटा देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ सुनील Extra-Curricular Activities में भी हमेशा अव्वल रहा.

डायरेक्टर- "क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान कभी scholarship मिली है?"
सुनील - "जी नहीं"
डायरेक्टर- "इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे."
सुनील - "जी हां, सर."
डायरेक्टर- "तुम्हारे पिताजी क्या काम करते हैं?"
सुनील - "जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं."
यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा - "ज़रा अपने हाथ तो दिखाना."
सुनील के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे.
डायरेक्टर- "क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की है?"
सुनील - "नहीं सर, मेरे पिता जी हमेशा यही चाहते थे कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें पढ़ूं. और हां सर, एक बात और.. मेरे पिता जी बड़ी तेजी से कपड़े धोते हैं."
डायरेक्टर- "क्या मैं तुम्हें एक काम करने के लिए कह सकता हूं?"
सुनील - "जी, आदेश कीजिए."
डायरेक्टर- "आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना और फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना."

सुनील यह सुनकर प्रसन्न हो गया. उसे लगा कि अब नौकरी मिलना तो पक्का है. तभी तो डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है.
सुनील ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा.

पिता को थोड़ी हैरानी हुई. फिर भी उसने बेटे की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए. सुनील ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया. साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे. उसके पिता के हाथ रेगमाल पेपर की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे. यहां तक कि जब भी वह कटे के निशानों पर पानी डालता, चुभन का अहसास पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था.
सुनील को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे. पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक कामयाबी का. पिता के हाथ धोने के बाद सुनील को पता ही नहीं चला कि उसने उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले. उसके पिता रोकते ही रह गए, लेकिन सुनील अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया.

उस रात बाप - बेटे ने काफ़ी देर तक बातें की.

अगली सुबह सुनील फिर नौकरी के लिए कंपनी के डायरेक्टर के ऑफिस में था. डायरेक्टर का सामना करते हुए सुनील की आंखें गीली थीं.

डायरेक्टर- "हूं, तो फिर कैसा रहा कल घर पर सुनील? क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे?"
सुनील - " जी हाँ, सर कल मैंने जिंदगी के कुछ वास्तविक अनुभवों को सीखा और महसूस किया.
पहला : मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है? मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतना आगे नहीं आ सकता था.
दूसरा :  पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है?
तीसरा : मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार इतनी शिद्दत के साथ महसूस की.
डायरेक्टर- " सुनील, ये ही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं. मैं यह नौकरी केवल उसे देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे. ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे. ऐसा शख्स जिसने सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो.
मुबारक हो सुनील, तुम इस नौकरी के पूरे हक़दार हो."

सारांश
आप अपने बच्चों को बड़ा घर दें. बढ़िया खाना दें. बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें. लेकिन साथ ही अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि कोई भी काम करते हुए कैसा लगता है? उन्हें भी अपने हाथों से वो काम करने दें. खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें. ऐसा इसलिए नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते, बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही और सच्चा प्यार करते हैं. आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं.

सबसे अहम हैं कि आपके बच्चे किसी काम को करने की कोशिश की कद्र करना सीखें. एक दूसरे का हाथ बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर लाएं.
और यकीन मानिए....कोशिशें कामयाब होती हैं. ईमानदार कोशिशें.

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