Apr 22, 2018

“कितना अच्छा होता कि तुम अगर सुंदर भी होते.“

सम्राट चंद्रगुप्त ने एक दिन अपने प्रतिभाशाली मंत्री चाणक्य से कहा-
“कितना अच्छा होता कि तुम अगर सुंदर भी होते.“
चाणक्य ने उत्तर दिया, "महाराज सुन्दरता तो मृगतृष्णा है. आदमी की पहचान तो गुण और बुद्धि से ही होती हैसुन्दरता से नहीं.“
“क्या कोई ऐसा उदाहरण है जहाँ गुण के सामने सुन्दरता फीकी दिखे. चंद्रगुप्त ने पूछा?
"ऐसे तो कई उदाहरण हैं महाराज, चाणक्य ने कहा, "पहले आप पानी पीकर मन को हल्का करें, बाद में बात करेंगे."
"महाराज पहले गिलास का पानी इस सोने के घड़े का था और दूसरे गिलास का पानी काली मिट्टी की उस मटकी का था.
अब आप बताएँ, किस गिलास का पानी आपको मीठा और स्वादिष्ट लगा?"
सम्राट ने जवाब दिया- "मटकी से भरे गिलास का पानी शीतल और मीठा लगा एवं उससे मन को तसल्ली भी मिली."

वहाँ उपस्थित महारानी ने मुस्कुराकर कहा, "महाराज हमारे प्रधानमंत्री ने बुद्धिचातुर्य से प्रश्न का उत्तर दे दिया. भला यह सोने का सुंदर घड़ा किस काम का, जिसका पानी बेस्वाद लगता है. दूसरी ओर काली मिट्टी से बनी यह मटकी, जो सुंदर तो नहीं है, लेकिन उसमें गुण छिपे हैं. उसका शीतल मीठा पानी पीकर मन तृप्त हो जाता है. 
अब आप ही बतला दें कि सुन्दरता बड़ी है अथवा गुण एवं बुद्धि?"


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