Apr 22, 2018

रेड लाइट

लाइफ है तो हम हैं. ख़ुशी है तो गम हैं. कभी कुछ ज्यादा है तो कभी कुछ कम है. धक्-धक् है तो दम है वरना आंखें नम है.

जिंदगी बस ऐसे ही चलती है. हर किसी की ऐसे ही चलती है. ऐसे ही चलेगी. आप उदास मत होइये. देखिये, बिलकुल सीधी बात है. कोई पहाड़ी रास्ता नहीं है जिंदगी. बस सिंपल लाइफ कभी-कभी बोर कर देती है और इसलिए कुछ नया कर लेना चाहता है इंसान. सिर्फ़ इसलिए कि वो ख़ुशी हासिल कर सके. इस ख़ुशी के चक्कर में वो रास्ते बदलता है, नए अनुभव लेता है, कभी रुकता है, कभी ठहरता है और अगली सुबह फ़िर एक नए सफ़र पर निकल पड़ता है. 
ये प्रोसेस पैदा होने से शुरू होता है और मरने तक चलता रहता है. और फ़िर हम निकल लेते हैं. अरबों सालों से अरबों जीवों के साथ ये ही प्रोसेस चलता है और यकीन मानिए, कोई भी इसे रोक नहीं सकता. ये बाय-डिफ़ॉल्ट केस स्टडी है. और बड़ा अनोखा और सिंपल रहस्य. इसलिए लोग लाइट लेते हैं अक्सर? जबकि ये ही मंजिल का रास्ता बनाती है. क्यों?  
कहानी का डायरेक्टर भी कैमरे के सामने नहीं आता. बस वो हमसे एक्टिंग अपनी मर्ज़ी की करवा लेता है. और करना सबको पड़ता है. मरना भी सबको पड़ता है. 
अब कुल मिला के बच गया बीच का टाइम कि क्या करके मरना है? बस ये जिसको समझ आना शुरू हो जाये तो समझो चारों धाम की यात्रा घर बैठे हो गयी. बड़ी कठिन है ये साइंस? कोई 20 की उम्र में, कोई 40 की, कोई 60 की उम्र में थोड़ा – थोड़ा समझने लग जाता है. वक़्त सब समझा देता है. तसल्ली से. इत्मीनान से.
आने का समय तय है. ओके है. क्लियर है? सिम्प्लेस्ट है.
जाने का समय तय है. ओके है. ये भी क्लियर ही है? 4 कंधों का प्रैक्टिकल और राम नाम सत्य. सबने देखा है और बड़े अच्छे से जानते है. हां, मन नहीं मानता. कहता है, मैं थोड़े जाऊंगा? क्यों? हमेशा क्या सिर्फ़ दूसरे ही जायेंगे? मन लफंगा कहीं का.
आने और जाने के बीच में जिन जिन स्टेशन से गुजरना है उसमें हम थोड़ा चुनाव जरुर कर सकते हैं अपनी सुविधानुसार लेकिन हर स्टेशन अपनी पसंद का मिले, ये कदापि जरुरी नहीं. हर स्टेशन को अपना मानना पड़ता है. पसंद नहीं तो कुछ देर बाद स्टेशन बदल भी सकते हैं. पर यात्रा जारी रहेगी क्योंकि रेड लाइट आने तक कारवां गुजरना ही है.
बड़े बड़े राजा-महाराजा, साइंटिस्ट, फिलोस्फेर्स, ज्ञानी, विश्व-विजेता, महारथी, धनवान, रूपवान, स्वस्थ, गरीब, अपंग, शाकाहारी, मांसाहारी, आस्तिक, नास्तिक और हर योनि के जीव......सब आते हैं और चले जाते हैं. सबके अलग अलग स्टेशन तय हो जाते हैं. जीने के माध्यम और उद्देश्य क्लियर हो जाते हैं, डिफाइन हो जाते हैं. अब वो जीवन को किस रूप में देखेंगे, ये सबका पर्सनल मसला बनने लगता है और यहीं से शुरू होती है स्टेशन पर फाइट. समझ-समझ का अंतर सिंपल चीज़ों को उलझाने लगता है और छिपा हुआ डायरेक्टर अपने एक्टर्स की अवार्ड-विनिंग एक्टिंग देख कर उनके लिए मनमाफिक मोमेंटो खोजने निकल पड़ता है. 
छोटे से बड़े, हर आदमी की छाप उसके जाने के बाद एक स्टाम्प की तरह चिपकी रह जाती है और इतने में ग्रीन लाइट का समय ख़त्म होने लगता है. येलो लाइट जगमगाने लगती है ये इंडिकेशन देते हुए कि रेड लाइट बस करीब है. लास्ट स्टेशन जब आएगा तो उतरना हो होगा. सबको. आज नहीं तो कल.
बस इतना करते चलिए कि अंतिम रेड लाइट से पहले कोई मलाल न रह जाए. और सिर्फ़ पैसे का दुःख मत मनाइये. ये मलाल का विषय कभी था ही नहीं. ना ही कभी होगा.
ये समझने का विषय है कि आने-जाने, स्टेशन पर रात बिताने और रेड लाइट के छा जाने तक आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या रहा होगा? बस ये ही आपके अगले अनजाने सफ़र की स्क्रिप्ट का आधार बनेगी.



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