May 1, 2018

Mr. Y को उनकी जासूसी करनी पड़ रही है.

ये दौर एक शानदार मगर प्रतिस्पर्धा के पथरीले रास्ते से गुजर रहा है. एक अच्छा खासा पढ़ा-लिखा स्वस्थ जीवित आदमी और उसका परिवार जल्दी से जल्दी ये तय कर लेना चाहते हैं कि उनकी संतान क्या बने? क्यों बने? किस फील्ड में बने? कहाँ उसकी जोइनिंग हो? कहाँ उसका ट्रांसफर हो? कैसे और किससे उसकी शादी हो? किन-किन सालों में वो बच्चे पैदा कर लें? और उनकी संतानों के बच्चें यानि के उनके नाती-पोते किस स्कूल में पढेंगे? वो क्या बनेंगे? और कैसे बनेंगे? सभी आंकड़े तैयार हैं. बस दिशा-निर्देश की कमांड देना बाकी है. 

इतनी तैयारी की वजह साफ़ है – सब बुद्धिमान लोग अपनी संतानों को सामाजिक मापदंडो के हिसाब से तुरंत सेट करने की जुगत में लगे दिखाई दे रहें हैं और उनके सपने इतने व्यावहारिक हैं कि उनके पड़ोसी यानि Mr. Y को उनकी जासूसी करनी पड़ रही है कि आख़िरकार Mr. X  यानी आप और आपकी प्रतिभाशाली संतान लाइफ का ऐसा कौन सा केमिकल फार्मूला तैयार कर रहें हैं जिससे आपके आने वाली 2-3 पीढ़ियों को पिला देने से मानो सम्पूर्ण परिवार की सभी समस्याओं का हल जड़ से ख़त्म हो जायेगा. इतना दबाव, इतना तनाव, इतनी पीड़ा, इतना सैक्रिफाइस? किसके लिए? और आख़िरकार क्यों? क्या इससे आपकी संतान को जाने- अनजाने कोई अप्रत्याशित गिफ्ट (निराशा और डिप्रेशन) तो आप नहीं दे रहें हैं? उसके जीवन का ख्याल रखना, उसका मार्गदर्शन करना आपका अधिकार है और फ़र्ज़ भी. लेकिन उसमें इतनी तो गुंजाईश रखी जा सकती होगी कि आपके बच्चे को भी लगे कि उसका जीवन कुछ परसेंट तो उसकी ख़ुशी और पसंद का हो? है कि नहीं? अपने दिन याद करिए? आप क्या बनना चाहते थे और क्या बन गए? 


आइये एक बच्चे के ऐसे ही एक प्रैक्टिकल सवाल को देखते हैं. (ये बच्चा अभी सिर्फ़ 19–20 साल का होगा)

सवाल : मैं एक परीक्षा का एंट्रेंस एग्जाम टेस्ट पास करने की कोशिश पिछले 3 सालों से कर रहा हूं. मगर लगातार फेल हो रहा हूं. पापा-मम्मी का सपना पूरा नहीं कर पाने का मलाल दिल में रह-रह के बढ़ रहा है. मैं बहुत निराश हो गया हूं और उस निराशा से बाहर नहीं आ पा रहा हूं. दिल की धड़कन तेज चलती रहती हैं. कुछ खाने-पीने का मन नहीं करता. आस-पड़ोस के लोगों और दोस्तों से मिलने से डर लगने लगा है. अब पेरेंट्स भी उम्मीद छोड़ चुके हैं. मैं इन दिनों बड़ा ही डिप्रेस फ़ील कर रहा हूं. मुझे सभी रास्ते बंद नज़र आ रहे हैं.  मेरा क्या होगा? क्या मैं कभी स्वाभाविक जीवन जी सकूँगा?

जवाब : निराशा और डिप्रेशन एक लगातार चलने वाला प्रोसेस है। जब तुम निराश होते हो तो हताश हो जाते हो और हताशा बढ़ जाने पर आ जाता है डिप्रेशन. तुम्हें जानकर हैरानी होगी कि निराशा और डिप्रेशन’ जीवन को को डेड करने वाले सबसे होशियार हथियार हैं. जब तुम्हारा उत्साह किसी भी लेवल को सपोर्ट नहीं कर पाता तो फ्रेंडशिप निभाने डिप्रेशन आ जाता है और फ़िर अच्छे जीवन की संभावना टाटा-बाय-बाय कहने लग जाती है.
इस पोजीशन से तुम्हें निकलना चाहिए. अगर तुम कहते हो कि मैं किसी चीज से, किसी बात से लगातार निराश हो रहा हूं तो तुम हताशा और डिप्रेशन से ज्यादा दूर नहीं रह सकोगे. निराशा ग्राउंड फ्लोर है तो डिप्रेशन टॉप फ्लोर. अब लिफ्ट का बटन तुम्हारें हाथ में है. या तो ये लिफ्ट छोड़ दो नहीं तो ये तुम्हें आज नहीं तो कल टॉप फ्लोर के दर्शन ज़रूर करवा देगी.

तुम अपना सिर गर्व से ऊँचा रखो क्योंकि जीवन की सबसे नेचुरल चीज़ ये है कि जीवन की एनर्जी निराश या उदास होना नहीं जानती है. ये पाजिटिविटी सपोर्टिंग इनबिल्ट सिग्नल है. तो अगर ये सवाल है कि निराशा से पिंडा कैसे छुटे? तो घबराओ मत. तुम्हें निराशा को छोड़ने की जरूरत ही नहीं है. बस तुम उसे पकड़ों ही मत. निराशा की लिफ्ट को लात मार दो. उससे ख़ुद को अनुभवी बनाने का ज्ञान पाने का प्रयास मत करो क्योंकि अंत में भी ये तुम्हें निराशा ही देगा, और कुछ नहीं. याद रखो कि जीवन का हर रूप ख़ुद उत्साह है. फेलियर केवल एक स्टेज है, मंजिल नहीं.  

निराशा और डिप्रेशन का सीधा-सीधा मतलब है कि आप अपने ही जीवन के खिलाफ काम करने लग पड़े हैं और क्या ये सचमुच में समझदारी होगी?  
एक नन्हें उगते पौधे को देखो, चाहे तुम उसको छत पर रख दो और कुछ नहीं. बस थोड़ी सी मिट्टी उस पर डाल दो तो वह 20 मीटर नीचे तक अपनी जड़ें फैला सकता है. तुम्हें लगता है कि पौधा कभी निराश होता है? नहीं. 

एनर्जी ऑफ़ लाइफ किसी तरह की निराशा नहीं जानती. निराश सिर्फ तुम्हारा मन हो जाता है क्योंकि लिमिटेड सोच का मन झूठी उम्मीदें पालने लगता है और जब तुम्हारी उम्मीदें जीवन के साथ कभी कभी तालमेल नहीं बिठा पाती या काल्पनिक अथवा साइकोलॉजिकल होती हैं तो बस मन को लगता है कि अब दुनिया में कुछ नहीं बचा तुम्हारे लिए. असल में ऐसा कुछ होता ही नहीं. कुछ समय इन्तजार करके देखो. तुम पाओगे कि तुम फ़िर से नयी एनर्जी से भर उठे हो.

कई लोग किसी भी परीक्षा में फ़ेल होने पर आत्महत्या कर लेते हैं या ऐसा करने की सोचने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके बिना दुनिया ख़त्म हो गयी. कुछ नहीं बचा. ये सिर्फ़ एक सामाजिक परिकल्पना है क्योंकि परीक्षा में बैठने वालों और पास हो जाने वाले लोगों के अनुपात में अंतर बहुत ज्यादा होता है. 

मान लीजिये किसी परीक्षा में एडमिशन या नौकरी की 1,000 सीटें हैं और परीक्षा देने वाले 1,000,00. तो क्या सिर्फ़ परीक्षा में सेलेक्ट हुए 1,000 लोग ही जीने लायक बचेंगे. बाकि 99,000 आत्महत्या कर लेंगे? नहीं, ऐसा कभी नहीं होता. ये सिर्फ़ मन की निराशा है. बाकी लोगों को बस कुछ दूसरे रास्ते तलाशने होंगे जहाँ से वो किसी और दिशा में आगे बढ़ सकें. बस इतना ही करना होता है. जिंदगी रिजल्ट के साथ जीने का नाम नहीं है. ये ख़ुद एक शानदार रिजल्ट है और तुम इसके सबसे बेस्ट प्रोडक्ट हो.

तो कुल मिलाकर निराश या उदास या हताश हो जाना पूरी तरह एक साइकोलॉजिकल थिंकिंग का हिस्सा है. ये प्रैक्टिकल तो बिलकुल ही नहीं है. यह जीवन से जुड़ा मसला ही नहीं है.

जब तुम निराश हो और तुम्हारा मन कहे कि जीने से मुझे कोई लाभ नहीं, मुझे मर जाने  दो,’ तो बस दो मिनट के लिए अपना मुंह और नाक बंद करके देखना और तुम्हारे अंदर का जीवन कहेगा, ‘मुझे जीने दो.’ मुझे ऐसे मरना होता तो जीने आता ही क्यों. 

याद रहे कि कोई सचमुच का बेवकूफ या मूर्ख व्यक्ति ही निराशा और डिप्रेशन में हमेशा के लिए जा सकता है. अगर तुम समझदार हुए तो डिप्रेशन में कैसे जा सकोगे? तुमने अपनी बुद्धि को पूरी तरह एक फ्रेम में कैद कर डाला, बस इसीलिए ये चांस बने वरना निराशा और डिप्रेशन का वास्तविकता से क्या लेना-देना. ये बस तुम्हारे मन का वहम मात्र है जो कुछ दिनों में तुमसे हारकर भाग जायेगा.

मुस्कुराओ. तुम जिंदगी हो. इसे बचा लो. 

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