May 27, 2018

शारदा का एक छोटा सा टेस्ट



एक गांव में एक बूढी औरत रहा करती थी. उसका नाम शारदा था. उसका अपना कोई नहीं था. अपना गुजारा करने के लिए वो दिन-रात गोबर के उपले बनाती और उनको गांव में बेच आती. इससे उसकी दो रोटी का जुगाड़ हो जाया करता. शारदा भगवान कृष्ण को बहुत मानती थी और उठते-बैठते उनका नाम जपा करती. अब जैसा कि हर जगह देखा ही जाता है कि आलोचना और बुराई करने वाले लोग किसी को नहीं छोड़ते. उस गांव में भी कुछ ऐसे ही मास्टरपीस थे जो शारदा की भक्ति का मज़ाक उड़ाते और उसको तंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

और एक दिन शाम ढ़लते ही उन लोगों ने शारदा के बनाये सारे उपले चुरा लिए और बात करने लगे कि अब देखते हैं कि जिस कृष्ण का ये नाम लिए फिरती है, वो इसकी हेल्प कैसे करते हैं? अगली सुबह जब शारदा की नींद खुली तो उसने पाया कि उसके बनाये सारे उपले कोई चुरा कर ले गया.

शारदा मन ही मन हंसती है और अपने कान्हा से कहती है,“पहले तू माखन चुराता था और मटकी फोड़ गोपियों को सताता था. और अब इस बुढ़िया के उपले छुपा मुझे सताता है. ठीक है, जैसी तेरी इच्छा”. यह कह शारदा अगले दिन के लिए उपले बनाना शुरू कर देती है. दोपहर होने लगती है. उसे जोरों से भूख लगी है लेकिन घर में खाने को कुछ भी नहीं है. दो गुड़ के टुकड़े रखे हैं बस. शारदा गुड़ का एक टुकड़ा मुहं में डाल कर, पानी के कुछ घूंट पी कर आराम करने लगती है.

अब क्या होता है?
भगवान तो भगवान हैं. भक्त के आगे नतमस्तक. शारदा को कष्ट में होता देख कर वो बैचन हो जाते हैं. लेकिन पहले शारदा का एक छोटा सा टेस्ट लेते हैं. वो साधु का वेश धारण कर उसके घर पहुँच जाते हैं और कुछ खाने को मांगने लगते हैं. बूढी शारदा अपने घर आए एक साधु को देख आनंदित होती है, पर घर में कुछ खाने को नहीं है - यह सोचकर दुखी भी हो जाती है. वो गुड़ का बचा वो अंतिम  टुकड़ा साधु को शीतल जल के साथ खाने को दे देती है. साधु महाराज शारदा के त्याग को देख ख़ुश हो जातें है और उसे सहायता का आश्वासन दे चले जाते हैं. 

साधु सीधे गांव के सरपंच के यहां पहुचते हैं और सरपंच से कहते हैं, “सुना है इस गांव में रहने वाली बूढी शारदा नामक औरत के उपले किसी ने चुरा लिए हैं. सरपंच जी, मेरे पास एक सिद्धि है. यदि गांव के सभी लोग अपने-अपने उपले ले आयें तो मैं अपनी सिद्धि के दम पर शारदा के सारे उपले अलग कर दूंगा”. सरपंच भी एक भला आदमी मालूम होता है और उसे भी शारदा के उपले चोरी होने का दुख है. इसलिए वो साधु रूपी कृष्ण की बात तुरंत मान कर गांव भर में मुनादी करवा देता है कि सब अपने घर के उपले तुरंत गांव की चौपाल पर लाकर रख दें.

जिन शातिर लोगों ने शारदा के उपले चोरी किये थे, वो भी अपने उपलों को शारदा के उपलों में मिला कर उपलों के बाकी ढेर में मिक्स कर देते हैं. उनको ये पूरा यकीन है कि सब उपले तो एक ही जैसे होते हैं अतः साधु महाराज इतने उपलों में से शारदा के उपले पहचान ही नहीं सकते.
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि दुष्टों और ग़लत करने वाले लोगों को भगवान की लीला और शक्ति दोनों पर ही कभी विश्वास नहीं होता.

आगे क्या होता है?
साधु वेश में पधारे भगवान श्री कृष्ण सब उपलों को कान लगाकर सुनते हैं और पल भर में ही शारदा के उपले अलग निकाल देते हैं. शारदा अपने उपलों को तुरंत पहचान जाती है और ख़ुशी से अपने उपले उठा, साधु को प्रणाम कर अपने घर लौट जाती है.

जिन लोगों ने शारदा के उपले चुराए थे, उन्हें यह समझ में नहीं आता कि साधु ने कान लगाकर उन उपलों को कैसे पहचाना? अतः जब साधु गांव से कुछ दूर निकल जाते हैं तो आए तो वो लोग साधु से इसका कारण जानने पहुंच जाते हैं. 
फ़िर साधु उनको बड़े प्यार से समझाते है कि “शारदा हमेशा कृष्ण का नाम जपा करती थी और उसके भाव इतने पवित्र थे कि नाम जप उसके बनाये उपलों में भी चला जाता था. कान लगाकर मैंने बस यह सुना कि किन उपलों में से कृष्ण का नाम निकलता है और जिन उपलों में से कृष्ण का नाम निकल रहा था, मैंने उन्हे अलग कर दिया”. अब वो सभी लोग बिना कोई सवाल किये गांव वापिस चले जाते हैं.

सार: 
इस कहानी में साधु इम्पोर्टेन्ट नहीं है, भगवान की स्तुति इम्पोर्टेन्ट हैं. वैसे भी आजकल ओरिजिनल साधु मिलना बहुत ही टफ है. इसलिए इनके चक्करों में ना पड़ें. 

लेकिन हां, भगवान को सच्चे मन से ज़रूर याद करें. यकीं मानिये, इससे हम सभी पर ईश्वर कि महान कृपा होती है और मुसीबतों, गलत लोगों और बेवजह की कठिनाइयों से हमारा बचाव बहुत ही आसानी से हो सकता है. आप भी इसका टेस्ट करके देखिये. ये वास्तव में काम करता है और किताबी ज्ञान से थोड़ा हटकर जीने का विषय है.

आपका दिन शुभ हो.
(शारदा नाम काल्पनिक है)


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