May 4, 2018

वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा.

बहुत समय पहले की बात है एक नदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था. पहाड़ों से उतरती नदी पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे.

एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा.
जो आड़ा गिरा वह अड़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा. फ़िर चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए. मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा.”
वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा – रुक जा नदी.....
अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती. मैं तुझे यहीं रोक दूंगा.
पर नदी तो बढ़ती ही जा रही थी. उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है.
पर उसके सोर्स और डेस्टिनेशन के बीच का समय उसकी पीड़ा का, उसके दुःख का कारण बन गया था.
वहीं दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा था.
“चल नदी, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूंगा. चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई रुकावट नहीं आने दूंगा. तुझे सागर तक पहुंचा कर ही दम लूंगा.”
नदी को इस पत्ते का भी कुछ पता नहीं. वह तो अपनी ही धुन में सागर की ओर बढती जा रही है. पर ये पत्ता तो आनंदित है. वह तो बस ये ही समझ रहा है कि वह ख़ुद नदी को अपने साथ बहाए ले जा रहा है. 
आड़े पत्ते की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था कि चाहे वो नदी का साथ दे या नहीं, नदी तो वहीं पहुंचेगी जहाँ उसे पहुंचना है.
पर उसके सोर्स और डेस्टिनेशन के बीच का समय उसके सुख का, उसके आनंद का कारण बन गया था.
पहला आड़ा पत्ता जो नदी से लड़ रहा है और उसे रोक रहा है. उसकी जीत का कोई उपाय संभव नहीं है.
और जो दूसरा सीधा पत्ता नदी को बहाए जा रहा है. उसकी हार का कोई उपाय संभव नहीं है.

प्रबुद्ध जन कहते हैं कि ठीक इन पत्तों की तरह आप भी अपनी फ्रीडम का प्रयोग उस परमेश्वर की इच्छा से लड़ने में कर सकते हैं. और तब जीवन उस आड़े पत्ते के जीवन की तरह दुःख और हताशा के अलावा और कुछ नहीं होगा. 
या फिर आप अपनी फ्रीडम को ईश्वर के प्रति समर्पण बना सकते हैं और सीधे पत्ते की तरह आनंद के सागर में गोते लगा सकते हैं.

दोनों तरह की फ्रीडम आपको उपलब्ध है. इतनी फ्रीडम कि आप आड़ा या सीधा कुछ भी सोच कर इन पत्तों की तरह अपनी मंजिल तक पहुँच सकते हैं. फ़िल्म तो सिर्फ़ आपके सफ़र की बनेगी. शुरुआत और अंत तो सबका एक जैसा ही होता है.

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