May 5, 2018

ट्रीटमेंट के दौरान वो एक रिहेबलिटेशन सेंटर पहुंची.

साल 2011 में हुए एक हादसे में उनको अपना एक पैर खोना पड़ा लेकिन उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया. हारना और असंभव शब्द उनकी डिक्शनरी में कहीं नज़र नहीं आता.

ये हैं किरण कनौजिया. इंडिया की पहली महिला ब्लेड रनर. जिन्होंने अपने साहस और हौसले के दम पर अपने अँधेरे को उजाले में बदल डाला. पूरे वर्ल्ड में नाम कमाया और लोगों को मुसीबतों से लड़कर आगे बढ़ने के लिए मोटीवेट किया.
किरण फरीदाबाद (हरियाणा) की रहने वाली हैं. कंप्यूटर एप्लीकेशन में मास्टर्स हैं और जॉब करती हैं इंफोसिस हैदराबाद में.
साल 2011 में जब वे अपना बर्थडे सेलिब्रेट करने हैदराबाद से अपने घर फरीदाबाद आ रहीं थीं, तभी पलवल स्टेशन के पास दो बदमाशों ने उनके सामान को छीनने की कोशिश की. किरण ने फाइट किया लेकिन इसी दौरान वे नीचे ट्रैक पर जा गिरी और गंभीर रूप से घायल हो गयी. उन्हें अस्पताल ले जाया गया और डॉक्टर्स को उनकी जान बचाने के लिए उनकी एक टांग काटनी पड़ी.
ये काफी दर्दनाक और अप्रत्याशित था. लेकिन किरन भीतर से मजबूत थी. वो किसी की दया का पात्र बनकर जीवन गुजरना नहीं चाहती थी. उन्होंने संकल्प लिया कि अपने भविष्य की स्क्रिप्ट वो खुद लिखेंगी. अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाएंगी और देश में ही नहीं बल्कि पूरे वर्ल्ड में नाम कमायेंगी.
किरण घर की सबसे बड़ी बेटी थीं. इसलिए परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाते हुए कुछ महीनों के बाद वापस नौकरी पर लौट गयीं. उन्होंने आर्टीफिशल पैर का प्रयोग करना शुरू किया. ये बहुत ही निराश कर देने वाले मोमेंट्स थे. पर अब वो पीछे मुड़ कर नहीं देखना चाहती थी. ट्रीटमेंट के दौरान वो एक रिहेबलिटेशन सेंटर पहुंची जहां उन्होंने देखा कि लोग रनिंग के लिए ब्लेड का प्रयोग कर रहे थे. वो वहां के डॉक्टर्स से मिली. सभी डॉक्टर्स ने उनका हौंसला बढ़ाते हुए उन्हें ब्लेड को प्रयोग करने के लिए कहा. ब्लेड को लगाने के बाद किरण ने पाया कि वे आसानीं से दौड़ लगा सकतीं थीं. बस फ़िर क्या था. किरण को जैसे अपने सपनों का पासवर्ड मिल गया था. उन्होंने रनिंग की प्रैक्टिस करना शुरू किया. पहले वे 5 किलोमीटर तक दौड़ी और कुछ दिनों बाद 10 किलोमीटर तक की दौड़ लगाने लगीं. फ़िर एक दिन ऐसा आया कि वो 21 किलोमीटर की दूरी तय करने में कामयाब होने लगीं. किरण का कम्पटीशन बस केवल खुद से ही था.
किरण आज इंडिया की पहली महिला ब्लेड रनर हैं. उन्होंने दिल्ली, हैदराबाद और मुंबई समेत कई शहरों में आयोजित होने वाली मैराथन रेस में भाग लिया है. वो ख़ुद को खुशकिस्मत भी मानती हैं कि इस पूरे सफर में उन्हें सबका सहयोग मिलता रहा है. फ़िर चाहें वो उनके परिवार वाले हों, उनके दोस्त और वेल विशेर्स हों या फिर वो लोग हों जो उन्हें कभी नहीं जानते थे.

किरण कहती हैं कि भले ही उन्होंने अपना एक पैर गंवाया लेकिन उस घटना ने उन्हें एक मजबूत इंसान बनाने में बहुत मदद की. अब उनकी जिंदगी बेहद पॉजिटिव, एनर्जेटिक और खुशहाल है. और वो अब केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि बाकी लोगों को प्रेरित करके उनकी जिंदगी में भी बदलाव लाना चाहतीं हैं.

आपको सलाम है किरण. आप हम सब के लिए भी हौसले और हिम्मत की एक नयी किरण हो. जय हिन्द.



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