May 7, 2018

भगवान् ने मुझे चीट किया है.

बहुत पुरानी बात है. एक नगर में एक वेश्या की मौत हो गयी और संयोग से उसी दिन उसके सामने रहने वाला एक बूढ़ा सन्यासी भी अलविदा कह गया. देवता दोनों को लेने आ पहुंचे. वेश्या को स्वर्ग जाने का अपॉइंटमेंट लैटर मिला और संन्यासी को नरक जाने का. वेश्या मुस्कुराने लगी और संन्यासी एकदम से आगबबूला हो उठा.


तुम ये कैसा अन्याय कर रहे हो? मुझे नरक में और इस दौ कोड़ी की वेश्या को स्वर्ग में ले जा रहे हो. तुमसे जरूर कोई भूल हो रही है. अपना डेटाबेस चेक करो. फाइल पर गलत नाम छाप दिया है. रीनेम करो. पता करो अपने एडमिन से. स्वर्ग का संदेश मेरे नाम आया होगा और नर्क का इसके नाम का.

मुझे भगवान् यानि अपने एडमिन से मिलने दो. लेट् मी डिस्कस दी मैटर. मेरा सारा जीवन बीत गया शास्त्र पढ़ने में और ये रिजल्ट. रिजल्ट में मिस्टेक है. मुझे भगवान् ने चीट किया है.

उसे भगवान् के पास ले जाया गया.

भगवान् ने कहा कि हमारे डेटाबेस में ट्रांसपेरेंसी 100% है. जरा अतीत में जाओ. याद करो. ये वेश्या शराब पीती थी. भोग में रहती थी. पर जब तुम मंदिर में बैठकर भजन गाते थे. धूप- दीप जलाते थे. घंटियां बजाते थे. तब ये सोचती थी कि कब मेरे जीवन में ऐसा सौभाग्य आएगा कि मैं मंदिर में बैठकर भजन कर पाऊंगी. ये ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती थी. और तुम्हारे धूप-दीप की पवित्र खुशबू जब इसके घर पहुंचती थी तो ये उसे अपना अहोभाग्य समझती थी. मंदिर की घंटियों की आवाज सुनकर प्रभु सुमिरन में खो जाती थी. उधर तुम्हारा मन पूजा-पाठ करते हुए भी ये ही सोचता रहता था कि ये वेश्या है तो सुंदर पर उस तक पंहुचा कैसे जाए? पर सामाजिक प्रतिष्ठा के चलते तुम ये कर ना सके क्योंकि पूरे नगर के लोग तुम्हें संन्यासी मानते थे. जब ये नाचती थी. शराब परोसती थी तो याद करो कैसे तुम्हारे मन में वासना जाग उठती थी. तुम्हें इसमें रस आता था और इसे न पा सकने की वजह से तुम हमेशा खुद को अभागा समझते रहे.
बस इसलिए ही इस वेश्या को स्वर्ग में लाया गया और तुम्हें नरक में. वेश्या को धर्म पुकारता था और तुम्हें पुकारती थी वासना. ये वेश्या होते हुए भी प्रार्थना करती थी और तुम संन्यासी होते हुए भी इच्छा रखते थे इसकी.
ये कीचड़ में पड़ी होकर भी कमल के फूल की तरह ऊपर उठती चली गई. तुम कमल बनकर आए थे लेकिन कीचड़ में धंसे रहे.

सार: असली सवाल यह नहीं कि तुम बाहर से क्या हो? लोगों को क्या दिखते हो? अपितु असली सवाल तो यह है कि तुम भीतर से क्या हो?
क्योंकि भीतर ही सत्य है. निर्णायक है और मंजिल प्रदान करने वाला है.

No comments: