Jun 30, 2018

होटल आनंद

एक शहर में एक होटल था. होटल का नाम था होटल आनंद. उस होटल का मालिक बहुत दयालु और सज्जन आदमी था. नाम था ओमप्रकाश. 


भगवान् की दया से ओमप्रकाश का होटल बिज़नस काफ़ी अच्छा चलता था. उसके होटल में काम करने वाले सभी कर्मचारी भी खुश और सेवा भाव रखने वाले थे. सेठ भी ग्राहकों की तरह उन सब से अच्छा बर्ताव करता. इस तरह से पूरे शहर और उस राज्य में आनंद होटल के खाने और ओमप्रकाश की अच्छाई की तारीफें हुआ करती थी. होटल से जुड़े हर आदमी का जीवन सुख से चल रहा था.

ओमप्रकाश की एक विशेषता थी कि वह अपने होटल में आने वाले हर विकलांग को फ्री में खाना खिलाता था. कई सालों तक उसका यह काम लगातार चलता रहा. ओमप्रकाश रोज सुबह पक्षियों को दाना भी दिया करता था. ऐसे करने पर उसे बहुत शांति मिलती थी. यह बात ओमप्रकाश अपने दोस्तों से शेयर भी  किया करता था.

एक दिन होटल में पधारे एक आदमी ने ओमप्रकाश से पूछा, आप प्रत्येक अपंग और विकलांग को मुफ्त खाना खिलाते हैं तो आपको कोई नुकसान नहीं होता?”

तब ओमप्रकाश ने कहा, “मैं हर दिन पक्षियों का दाना देता हूं. मैंने देखा और समझा है कि किसी अपाहिज या विकलांग पक्षी का दाना कोई अन्य पक्षी नहीं खाता है. वह तो एक पक्षी है और अगर उनमें यह भाव भगवान ने दिया है तो मैं तो फ़िर भी एक इंसान हूं. बस इसीलिए मुझे लगता है कि मुझे भी हर अपंग और विकलांग व्यक्ति को भोजन करवाना चाहिए. और आप यकीं मानिये, ऐसा करने पर मुझे जो आत्मिक शांति मिलती है वो करोड़ों रूपए कमाने से भी प्राप्त नहीं हो सकती.“ वो आदमी ओमप्रकाश की बातें सुनकर उनको नमस्कार करते हुए होटल से चला जाता है.

सार
इंसान सही मायनों में तभी इंसान है जब वो दूसरों के दुख में उन्हें खुश कर के अपनी खुशियां खोज सके. और इसीलिए ही शायद भगवान् हमें इंसान के रूप में बना कर भेजते हैं. किसी का खून चूसने और किसी को सताने के लिए नहीं. किसी पर दया का भाव उमड़ना आपके ह्र्दय की भावुकता और संवेदनशीलता का प्रमाण है और उस दया को दान में बदलकर संसार की भलाई के लिए लगाना ही आपके ह्र्दय की महानता है.

आपका दिन शुभ हो. आपके लिए भी और आपके द्वारा दूसरों के लिए भी.


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