Jul 22, 2018

बादशाह और फ़क़ीर

एक बार की बात है। दरबार सजा था। बादशाह के सामने एक बुजुर्ग फ़क़ीर की एंट्री हुई।

बादशाह ने एक फ़कीर से कहा “मांगो क्या मांगते हो...?
फ़कीर ने अपना दानपात्र आगे कर दिया और बोला... हुज़ूर! आप सिर्फ़ इसे भर दें...।

बादशाह बड़ा ही दिलवाला था। उसने फ़ौरन अपने गले के सारे हार उतारे... अँगूठियां उतारीं... जेब से सोने चांदी की अशर्फ़ियां निकालीं और फ़कीर के पात्र में डाल दिए लेकिन दानपात्र बड़ा था, इसलिए भर न सका... 

तो बादशाह ने फ़ौरन अपने अकाउंटेंट यानि खजांची को बुलाया...
खजांची हीरे जवाहरात की बोरी लेकर हाज़िर हो गया।  
बादशाह ने पूरी बोरी उलट दी... लेकिन जवाहरात दानपात्र में गिरते गए और दानपात्र बड़ा होता गया... यहां तक कि तमाम हीरे जवाहरात उसमें समाते गए...।

बादशाह को बड़ी बेइज़्ज़ती का एहसास हुआ। उसने ख़ज़ाने का मुँह खोल दिया, लेकिन दानपात्र भरने का नाम ही नहीं ले रहा था...।
खज़ाने के बाद दरबारियों, आम जनता-जनार्दन और उनकी तिजोरियों की बारी आई लेकिन, दानपात्र फ़िर भी ख़ाली का ख़ाली ही रहा...।
एक-एक कर के सारा नगर ख़ाली हो गया लेकिन फ़कीर का दानपात्र ख़ाली ही रहा...।

आख़िर बादशाह हार गया फ़कीर जीत गया...।
फ़कीर ने दानपात्र बादशाह के सामने उल्टा किया फिर मुस्कुरा कर सलाम किया और वापस जाने के लिए मुड़ गया...।
बादशाह बुजुर्ग फ़कीर के पीछे भागा और हाथ जोड़कर कर अर्ज़ किया, हुज़ूर! मुझे सिर्फ़ इतना बताते जाइये कि ये आपका ये दानपात्र किस चीज़ का बना हुआ है...?

"बुजुर्ग फ़कीर ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, ऐ नादान बादशाह!
ये ख़्वाहिशों से बना हुआ पात्र है,
और सुन, ये ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होती,
इसलिए ये पात्र कभी भरता ही नहीं।
हे बादशाह सलामत...इसे तो सिर्फ़ क़ब्र की मिट्टी ही भर सकती है।

सार: जीवन भी कुछ ऐसा ही है और सबके लिए ही ऐसा ही। जितनी कम ख्वाहिशें, उतनी ज्यादा नियामतें और जितनी ज्यादा ख्वाहिशें, उतनी ज्यादा तकलीफें। और राज की बात ये कि ये आसान सा लगने वाला प्रोसेस पूरी उम्र बीत जाने पर भी थोड़ा सा समझ आ जाये तो भी रहमत मानिये। आपका दिन शुभ हो।

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