Aug 3, 2018

कृष्ण लीला


एक छोटी लेकिन समझ कर जीना सिखाने वाली कहानी. आइये देखें.

महाभारत का युद्ध चल रहा था. भीष्म और द्रोणाचार्य मारे जा चुके थे. और सेनाध्यक्ष की पोस्ट दुर्योधन ने कर्ण के हवाले कर दी थी. कर्ण के रणकौशल के सामने पाण्डव सेना के छक्के छूटने लगे थे. ख़ुद अर्जुन की हालत भी पस्त हो चली थी. वह निराश होने लगा.
अब भाग्य का कमाल देखिये या कर्ण के बैड लक का या के परशुराम जी के श्राप का: कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में धँस गया. यह देखकर कर्ण तुरंत रथ से नीचे कूदा और उसे निकालने की कोशिश करने लगा.
श्रीकृष्ण ने कर्ण की यह पोजीशन देख अर्जुन को उस पर बाण वर्षा करने का इशारा किया. अर्जुन ने उनके आदेशों का पालन किया. नतीजा ये हुआ कि कर्ण बाणों की वर्षा को नहीं झेल सका. 
उसने अर्जुन से कहा, "हे अर्जुन, थोड़ी देर रुक जाओ. क्या तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा कि मेरा फोकस रथ का पहिया निकालने की तरफ़ है? क्या तुम नहीं जानते कि जो फाइटर रथविहीन हो, जिसके अस्त्र-शस्त्र ख़त्म हो गये हों, या जो निहत्था हो और युद्ध रोकने की प्रेयर कर रहा हो, ऐसे फाइटर पर धर्मयुद्ध के जानकार और बहादुर शस्त्र-प्रहार नहीं करते?
इसलिए हे धनुर्धर ! जब तक मैं इस पहिये को कीचड़ से बाहर न निकाल लूँ, मुझ पर प्रहार न करो, क्योंकि यह धर्म के फेवर में नहीं होगा".

कर्ण का अर्जुन को ऐसा कहना श्रीकृष्ण को शूल की तरह चुभा.

उन्होंने प्रेमपूर्वक कर्ण से कहा, "बड़े आश्चर्य की बात है कर्ण कि आज अचानक तुम्हें धर्म याद आ रहा है?
सच है कि जब नीच मनुष्य मुसीबत में पड़ता है, तो उसे अपने कुकर्मों की याद तो नहीं आती, मगर दूसरों को धर्मोपदेश देने का विचार अवश्य आता है. 
हे कर्ण, उचित होता, तुमने अपने धूर्त कर्मों और पापों का विचार किया होता! हे महावीर योद्धा कर्ण ! जब दुर्योधन के साथ मिलकर तुमने लाक्षागृह बनवाया, भीम को खत्म करने के इरादे से जहर पिलवाया, 13 साल बीत जाने के बाद भी पाण्डवों को उनका राज्य नहीं दिया, देवी द्रौपदी का चीरहरण करवाया, निहत्थे अभिमन्यु को तुम्हारे समेत 7 महारथियों ने क्रूरता से मारा, तब तुम्हारा ये धर्मज्ञान कहाँ चला गया था?

क्या तब तुम्हें धर्मपालन की याद नहीं आई? और अब जब तुम पर मौत का साया मंडरा रहा है तो तुम अच्छाई और धर्म की बातें कर रहे हो?
कर्ण के पास भगवान के सवालों का कोई जवाब नहीं था.
वह अर्जुन की बाणवर्षा के सामने कुछ नहीं कर सका और कुछ ही देर बाद धराशायी हो कर काल के मुहं में समा गया.

सार: 
हम चाहे जितना चालाक बन जायें लेकिन अटल सत्य ये ही है कि कर्मों की चेकिंग टाइम तो टाइम होती ही है. और हमारा हिसाब तो हमें ही चुकता करना पड़ेगा. 
जैसी करनी, वैसी भरनी - इस कहावत को पुरानी मानकर अनदेखा ना करें तो ही बेहतर.

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