Sep 16, 2018

सब को 100% चाहिए.



जिंदगी मस्त है अगर देखने वाले की आँखों में मस्ती है.
जिंदगी पस्त है अगर देखने वाले की आँखों में अँधेरा है.
जिंदगी खुबसूरत है अगर देखने वाले की आँखों में आशा है.
जिंदगी बदसूरत है अगर देखने वाले की आँखों में निराशा है.
जिंदगी स्वर्ग हैं अगर देखने वाले की आँखों में धन्यवाद है.
जिंदगी नरक है अगर देखने वाले की आँखों में जलन है.
जिंदगी दिन है अगर देखने वाले की आँखों में सेवा है.
जिंदगी रात है अगर देखने वाले की आँखों में स्वार्थ है.
जिंदगी नदी है अगर देखने वाले की नज़र में स्वीकार्यता है
और
जिंदगी गंदा नाला है अगर देखने वाले की नज़र में खोट है.

दोस्तों, कुछ ऐसी ही है जिंदगी. उतार-चढ़ाव से भरी लेकिन अपने आपमें खरी.

ये तो इंसान की ख़ुद की सोच पर है कि वो जिंदगी को किस एंगल या किस नजरिये से देख रहा है.

ख़ुदा ने तो अपनी तरफ़ से उसे ख़ुद जैसा बना कर भेजा है. अब वो किस सोच से अपना जीवन चलाना चाहता है, ये तो उसकी ख़ुद की मर्ज़ी है.

दूसरे को blame कर देना कितना easy है लेकिन दूसरे की अच्छी बातों की praise कर पाना कितना कठिन. 

ये सब इंसान ख़ुद कर रहा है. कोई अच्छा कर रहा है. कोई बुरा कर रहा है. कोई धीरज धर रहा है तो कोई कान भर रहा है. 

ब्रह्मांड से किसी को कोई command नहीं मिल रही कि किसी के लिए गलत करो. इंसान को धरती पर भेजने का मतलब ये कभी नहीं रहा होगा कि वो किसी दूसरे के लिए ग़लत करे. misunderstanding या miscommunication हों तो दूर करे पर ग़लत किसी के लिए ना करे.
आजकल जो इतना stress या mental pressure लोग महसूस कर रहें हैं, उसका मेन reason है तुलना यानि दूसरे से ख़ुद को सुपीरियर दिखाने का भाव - comparison. 
कोई छोटा रहना ही नहीं चाहता. सब को 100% चाहिए.

ख़ुश रहने के लिए बड़ा या छोटा होना important नहीं है. इसके लिए हमें अपनी thinking को analyze करना होता है. 

क्या हम सिर्फ़ अपने point of view से देख रहें हैं या सामने वाले के point of view को भी capture कर पा रहें हैं? 

ये सवाल ही दुनिया की समस्याओं को सही तरीके से सुलझा सकेगा. 

और इसके लिए हमें अपने thought process को change करना होगा. जब सब ऐसा कर सकने में सफ़ल हो जायेंगे तभी हमारा इस धरती पर आना एक gift होगा otherwise हम एक garbage ही रह कर इस दुनिया को अलविदा कह कर चले जायेंगे. कचरा साफ़ हो जायेगा.

दूसरों से तो सब minimum 100% ही चाहते हैं लेकिन क्या हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि हम कितना % contribute कर रहें हैं किसी और के लिए.

आज सभी परेशान हैं क्योंकि अपना-अपना सोच रहें हैं. मैं और मेरा. सोचिये, अगर ऊपर वाला भी हमें इस धरती पर place करने से पहले ये ही सोचता तो हम में से कितने यहाँ present होते? 
उसने तो सबको अपनी copy बना कर भेजा होगा और हम क्या कर रहें हैं- कुछ और ही paste कर रहें हैं. result तो reverse आना ही है.

अब देखिये. अपने आसपास नज़र घूमा कर देखिये. सब ऐसे दिख रहें हैं जैसे कि जिंदगी में अफ़सोस के सिवा उन्हें कुछ नहीं मिला. छोटे-छोटे बच्चे भी इतने serious दिख रहें है मानो दुनिया चलाने का सारा pressure उन पर डाल दिया गया हो. हम जाने-अनजाने कर भी कुछ ऐसा ही रहे हैं. उनकी naturality कोई और ख़त्म नहीं कर रहा है. 
हम ही हैं इसके responsible. blame चाहे circumstances पर डाल दें या किसी और पर. सोच कर देखिएगा ज़रूर.

और समझदार हो चुके लोगों की तो story ही लाज़वाब है. किसी से भी मिलिए या बात कीजिये. अफ़सोस के अलावा वो आपको कुछ और नया नहीं बता पा रहे. दुनिया की नज़र में जो successful हैं वो भी किसी बात का अफ़सोस कर रहें हैं और जो दूसरे बच गए हैं वो भी किसी और बात का अफ़सोस करने में busy हैं.

अफ़सोस को लेकर एक छोटी सी कविता आपके सामने पेश है. अच्छी और सच्ची लगे तो तालियाँ दीजियेगा.

गरीब के बच्चे को अफ़सोस हैं कि वो ग़रीब क्यों हैं? icecream नहीं खा सकता.
अमीर के बच्चे को अफ़सोस है कि वो दोस्तों के साथ खेलने बाहर नहीं जा सकता.
सरकारी नौकरी वाले को अफ़सोस है कि टाइम पर extra भत्ता क्यों नहीं मिला.
प्राइवेट जॉब वाले को अफ़सोस है कि उसका सरकारी नौकरी में खाता क्यों नहीं खुला?
रिक्शा वाले को अफ़सोस है कि काश एक auto चलाता.
auto वाले को अफ़सोस है कि काश वो ख़ुद की taxi चलाता.
taxi वाले को अफ़सोस है कि काश मेरे पास 2 टैक्सी और होती.
कमाऊ पति को अफ़सोस है कि पत्नी housewife क्यों हैं?
कमाऊ पत्नी को अफ़सोस है कि पति मेरा outdated क्यों हैं?
सासु जी को अफ़सोस है कि मेरी बहूँ मेरे जैसा क्यों नहीं सोचती?
बहूँ को अफ़सोस है कि सासु मुझे बेटी जैसा प्यार क्यों नहीं देती?
intelligent बच्चों को अफ़सोस है कि 99.3% marks बहुत कम हैं?
normal बच्चों को अफ़सोस हैं कि 72.7% से भी पिता जी ख़ुश क्यों नहीं होते?
बाकी बचे बच्चों को अफ़सोस हैं कि हम पढ़ ही क्यों रहे हैं?
जिनके 4 बच्चे हैं, उनको अफ़सोस है कि इतनी मंहगाई में क्या होगा?
जिनके 2 बच्चे हैं, उनको अफ़सोस है काश दोनों को डॉक्टर बना पाते.
जिनके 1 भी बच्चा नहीं है, उनको अफ़सोस है कि भगवान् 1 तो दे देता. बनता चाहे कुछ भी.
businessman को अफ़सोस है कि मेरे worker दिल लगा कर काम क्यों नहीं करते?
workers को अफ़सोस है कि हमारा मालिक कब हमारी feelings समझेगा?

अब मज़ेदार बात ये है कि इन सब में से कौन सही है और कौन ग़लत ? ये आपको पता चल गया होगा.







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