Sep 24, 2018

उस आदमी को घबराहट हुई.





आज़ादी का दिन आने वाला था. 15 अगस्त बेहद करीब था. 

एक 10 साल का बच्चा अपना पेट भरने के लिए छोटे-छोटे झंडे बेच रहा था. वो कार में AC चला कर बैठे लोगों के पास जाता. दुकानों पर सामान ख़रीद रहे लोगों को कन्विंस करने की कोशिश भी करता. कॉलेज से घर लौट रहे स्टूडेंट्स से भी झंडे खरीदने की रिक्वेस्ट करता. 

इसी बीच उसके कस्टमर भी उससे भाव-तौल कर रहे थे. आखिर कौन अपने पैसे नहीं बचाना चाहता? 

पास से गुजर रहे एक 52 साल के आदमी ने जब उस बच्चे के पैरों की तरफ देखा तो बड़ा दुखी हुआ. वो फटाफट पास की जूतों के दुकान पर गया और उस बच्चे के लिए नए जूते ख़रीदे. बच्चे ने तुरंत अपने फटे – कुचले जूते निकाले और नए वाले पहन लिए. 

उसके चेहरे की ख़ुशी अब देखते ही बन रही थी. उसने उन सज्जन को बड़ी अद्ब भरी निगाहों से देखा और पूछा : “क्या आप भगवान हैं?”. उस आदमी को घबराहट हुई. उन्होंने अपने कानों को हाथ लगाया और बोले: “नहीं बेटे, मैं भगवान नहीं हूं.” बच्चा फ़िर से मुस्कुरा कर बोला: “ तो फ़िर पक्का आप भगवान के दोस्त होंगे?”.

सज्जन बोले “कैसे”. 

बच्चे ने बड़ी मासूमियत से कहा कि कल रात ही मैंने भगवान से रिक्वेस्ट की थी कि मुझे नए जूते दिला दो. वो आदमी मुस्कुराया और बच्चे के सर पर हाथ फेर कर वहां से जाने लगा. अब वो ख़ुद भी जान गया था कि भगवान का दोस्त होना कोई मुश्किल काम नहीं है.

सार:
अपनी सोच को सही दिशा में ले जाने की कोशिश ही असली आज़ादी है.

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