Oct 20, 2018

उस दिन सुबह के लगभग 11 बजे की बात है.







ये कहानी है एक 30 साल के लड़के की. कैसे उसकी 1 गलती ने उसके 12 साल तबाह कर दिए? और फ़िर वो जिंदा कैसे हुआ? उसकी जुबानी सुनिए उसके बदलाव की कहानी.

चिंता और टेंशन ने मेरी लाइफ़ के वो बेहतरीन 12 साल ख़राब कर दिए. वो साल जो किसी की भी लाइफ़ के सबसे बेहतरीन साल होने चाहिए. यानि 16 से 28 साल की उम्र का सफ़र. जोश भरा होने वाला सफ़र मेरे लिए बिलकुल अलग था. 

मेरे लिए ये दौर उदास, निराश, हताशा से भरा था. अब जब मेरा वो टाइम गुजर चुका है तो मैं घर की खिड़की किनारे, हाथ में चाय का प्याला लिए, बैठा हुआ सोचता हूं कि मुझसे बड़ा बेवकूफ इस दुनिया में शायद ही कोई और होगा. 

मेरे ये 12 साल किसी और की वजह से नहीं बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी गलती से ख़राब हुए.

दरअसल मैं आज से 2 साल पहले तक ख़ुद को चिंता का जलता हुआ पहाड़ बना चुका था. मैं हर चीज़ को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंता और तनाव में रहता था. अपनी पढाई, फिर अपनी नौकरी, अपने परिवार को लेकर मैं हमेशा डरा हुआ महसूस करता था. मैं नहीं जान पा रहा था कि मेरे अंदर अपने लिए इतनी हीन भावना क्यों भर गयी है?

आप यकीन नहीं करेंगे कि उन दिनों मैं इतना डरा हुआ फील करता था कि अपने जानकारों को सामने से आता देख कर मैं रास्ता बदल लिया करता. अपने किसी फ्रेंड से मिलते हुए मैं ऐसे जताता जैसे मैंने उसे देखा ही नहीं. ऐसा इसलिए होता था क्योंकि मुझे डर था कि ये लोग किसी ना किसी बहाने नुझे नीचा दिखाने की कोशिश करेंगे. ऐसी घबराहट के चलते मैं कई बार क्लास में फेल होते होते बचा. और तो और मुझे जल्दी-जल्दी अपनी Job बदलनी पड़ी क्योंकि मुझे हमेशा ये डर सताता रहता कि मैं नौकरी देने वालों को ये कैसे बताऊंगा कि मैं उनके लिए क्या कर सकता हूँ?

कुछ सालों बाद भगवान ने मेरी सुन ली. इन्हीं उलझनों से झूझता हुआ एक दिन मैं शाम को Ear फ़ोन लगाकर अपना पसंदीदा गाना सुन रहा था और इसी दौरान मैंने उस दिन के ऑफिस के काम को याद करते-करते चिंता और तनाव से मुक्ति पा ली.

बस वो दिन है और आज का दिन. तबसे लेकर अब तक मुझे एक बार भी कोई डर नहीं लगा और आज मैं जिंदा हूं और ख़ुश भी. ये बात मुझे बहुत सकून देती है. 

आपको पता है उस दिन ऐसा क्या हुआ जो मैं बदल गया? हुआ ये कि उस दिन सुबह के लगभग 11 बजे की बात है. मैं ऑफिस में अपना काम निपटा रहा था. किसी काम से एक 55 साल का आदमी मेरी टेबल पर आया. वो बेहद अमीर और हंसमुख नेचर का लग रहा था. मुझे उसका कुछ डॉक्यूमेंटेशन का काम करना था. मैंने उनका काम समय रहते पूरा कर दिया. वो इस बात से बड़ा खुश हुआ. 

जब वो मेरी टेबल छोड़कर जाने लगा तो उत्सुकतावश मैंने उनसे उनके ही बारे में पूछ लिया क्योंकि मैं उनसे थोड़ा इम्प्रेस हो गया था. मुझे लगा ये आदमी कहीं ना कहीं मेरे काम आ सकता है. वो आदमी वापिस मेरे आगे बैठा और उसने 5 मिनट में मुझे जिंदगी का पाठ पढ़ा डाला. 

उसने बताया कि मेरे माता-पिता बड़े अच्छे परिवार से थे. हमारे कई सारे बिज़नेस थे. बहुत अच्छा पैसा और इज्ज़त भी. करीब 4 साल पहले अचानक बिज़नेस में घाटा लगना शुरू हुआ. जब तक हम समझ पाते कि क्या हुआ, हम लुट चुके थे. ऐसी हालत देख के पहले पिता जी को हार्ट-अटैक आ गया और वो चल बसे. उनके जाने के कुछ दिनों बाद मेरी माँ ने भी आँखे मूंद ली. मैं, मेरी पत्नी और मेरे 2 बच्चे अब लगभग लावारिस अवस्था में आ चुके थे. हमें आगे का कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. बिज़नेस के लेन-देन के चलते अब सिर्फ़ एक घर हमारे पास रह गया था. रोजी-रोटी के लिए उसे भी गिरवी रखने की नौबत आने लगी थी. रोज वकीलों से मिलना, पुराने लोगों के हिसाब-किताब चुकता करते करते मैं तंग आ चुका था और आत्महत्या की सोचने लगा था. अपने मासूम बच्चों की शक्ल देख कर मुझे रोना आता था. 

मेरी पत्नी अपना दुःख किसी को बता भी नहीं सकती थी. वो दिन नहीं थे. वो बेबसी की इंतहा थी.

उसकी कहानी सुन कर मेरी हालत पतली हो गयी थी. मैं ये समझ ही नहीं पा रहा था कि कैसे React करूँ? उसके दर्द के सामने तो मेरी परेशानियां कुछ भी नहीं थी.

हिम्मत करके मैंने पूछा – तो आपने वापसी कैसे की?

उसने कहा कि मेरा बचपन का एक फ्रेंड था जो मुझसे हमेशा प्यार करता था. मैंने उसको एक दिन फ़ोन करके अपने घर बुलाया और सारी बात बताई. उसने कुछ भी देर ना करते हुए मुझसे एक ख़ाली पेपर और पेंसिल लाने को कहा. मैं ले आया. फ़िर उसने कहा कि तुम पेपर को 2 पार्ट्स में डिवाइड कर लो. लेफ्ट साइड में अपनी सारी चिंताओ को लिख दो और राईट साइड में चिंताओं के कारण लिख दो. मैंने वैसा ही किया. 

फ़िर उसने कहा कि हम 15 दिन बाद मिलेंगे और देखेंगे कि क्या हुआ. मैंने कहा ओके. उसने जाने से पहले कुछ फाइनेंसियल टिप्स दिए और चला गया.

15 दिन बाद हम मिले तो उसने कहा कि आज तुम फ्रेश लग रहे हो. मैं मुस्कुरा दिया. इन 15 दिनों में मुझे चिंता नहीं हुई थी. जो प्रोब्लेम्स मैंने पेपर पर लिखी थी, उनमें से अधिकतर प्रोब्लेम्स आई ही नहीं.

बस उस दिन मुझे जीने के तरीके का सही पता चला और तबसे आज तक मैं ऐसे ही पेपर और पेंसिल की मदद से लाइफ़ को Simplify करता रहा हूं और मुस्कुराता हूं. ऐसा कहकर वो आदमी चला गया.

उसकी कहानी ने मेरे सोचने के तरीके को बदल डाला. मैंने भी उसके फ्रेंड के तरीके का यूज़ करना शुरू किया और आज चिंता मेरे आस-पास भी नहीं फटकती. अब मैं सबसे ख़ुश होकर मिलता हूं. नौकरी भी ख़ुश होकर करता हूं और दोस्तों के साथ दिल खोलकर मिलता हूं. 

मैं जान गया हूं कि मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है सिवाय इसके कि मैं अपने डर के सही कारणों को समझूं और सही फ़ैसले लेना सीख सकूं.


(इमेजिनेशन पर आधारित प्रेरणात्मक लेख)
  

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