Oct 4, 2018

अब आगे से वो मंदिर नही आया करेगी.




एक महिला रोज मंदिर जाती थी. 

एक दिन उस महिला ने उस मंदिर के पुजारी को बताया कि अब आगे से वो मंदिर नही आया करेगी.
इस पर पुजारी ने पूछा - क्यों ?

तब महिला बोली - मैं देखती हूं कि लोग मंदिर परिसर में अपने फोन से अपने बिज़नेस की बात करते हैं. कुछ लोग तो मंदिर में भगवान का नाम लेने की जगह गपशप करते घूमते हैं. कुछ लोग पूजा-पाठ कम और पाखंड तथा दिखावा ज्यादा करते दिखाई पड़ते है. मुझे तो किसी में भक्ति-भाव नज़र नहीं आता बल्कि ऐसा महसूस होता है कि सब यहां अपना मतलब साधने आते हैं.

महिला की बात पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे, फिर बोले – हो सकता है कि आपकी सभी बातें सही हों. लेकिन अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले क्या आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं ?

महिला बोली - आप बताइए क्या करना है ?

पुजारी ने कहा -- एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए. शर्त ये है कि गिलास का पानी जमीन पर गिरना नहीं चाहिये.

महिला बोली – बिल्कुल, मैं ऐसा कर सकती हूं. ये बड़ा आसान है.
फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा कर भी दिखाया.

उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से सिर्फ़ 3 सवाल पूछे कि जब आप भगवान की परिक्रमा कर रही थी तो
1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा ?
2.क्या आपने किसी को मंदिर में गपशप करते देखा ?
3.क्या किसी को पाखंड या दिखावा करते देखा ?

महिला बोली – नहीं पुजारी जी. मैंने ऐसा कुछ भी नहीं देखा.
फिर पुजारी बोले - जब आप परिक्रमा लगा रही थी तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमें से पानी न गिर जाए इसलिए आपको इधर-उधर का कुछ भी दिखाई नहीं दिया.
क्या ये सच है ?           
महिला ने कहा – हां.

तब पुजारी ने कहा - अब जब भी आप मंदिर आयें तो अपना ध्यान सिर्फ़ परम पिता परमात्मा में ही लगाना. फिर आपको कुछ दिखाई नहीं देगा. सिर्फ भगवान ही सर्वत्र दिखाई देगें.

क्योंकि कहा भी गया है....
'' जाकी रही भावना जैसी. प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ''


सार:
अब आप ही बताइए कि इस जीवन में हमारे दुखों के लिए आखिर कौन ज़िम्मेदार है ?
क्या भगवान ज़िम्मेदार हैं ?
क्या आपका भाग्य ज़िम्मेदार है ?
क्या आपके रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त या सहकर्मी ज़िम्मेदार हैं ?
क्या आपकी सरकार या आपके नेता ज़िम्मेदार हैं ?
आखिर सही मायनों में कौन ज़िम्मेदार है ?

जरा गौर से सोचिये ?

आपका सरदर्द - आपके फालतू विचार का परिणाम.
आपका पेट दर्द – आपके गलत खाने का परिणाम.
आपका कर्ज – आपके जरूरत से ज्यादा खर्चे का परिणाम.
आपके कोर्ट केस - आप के अहंकार का परिणाम.
आपके फालतू विवाद - ज्यादा व् व्यर्थ बोलने का परिणाम.

इन सबके अलावा भी हजारों ऐसे कारण है जिनकी वजह से हम बेवजह दूसरों पर दोषारोपण करते रहते हैं.
इसमें ईश्वर दोषी कहां है ?
इसमें किसी और का दोष कहां है ?

अगर हम इन दुखों के कारणों पर गहराई से विचार करें तो पाएंगे की कहीं न कहीं हमारी ग़लतफ़हमियाँ ही इनके पीछे हैं. वो दूर हुई नहीं कि जीवन मुस्कुराया.

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