Oct 2, 2018

“काला वाला या सफ़ेद ”?




कभी - कभी अपनी बात, अपना दर्द बड़े लोगों को समझाने के लिए आपको बोलना ही पड़ता है. कुछ ऐसा ही हुआ एक पत्रकार जी के साथ जब वो एक किसान से बात कर रहे थे.

आइए महसूस करें एक छोटे से काल्पनिक इंटरव्यू के माध्यम से कि आखिर दुःख या irritation क्या होता है?

TV पत्रकार: आप अपने बैल को क्या खिलाते हैं?
किसान: काले वाले को या सफ़ेद वाले को?
TV पत्रकार: सफ़ेद वाले को
किसान: घास
TV पत्रकार: और काले वाले को?
किसान: उसे भी घास

TV पत्रकार: आप इन बैलों को बांधते कहां हो?  
किसान: काले वाले को या सफ़ेद वाले को?
TV पत्रकार: सफ़ेद वाले को
किसान: जी, बाहर के कमरे में.
TV पत्रकार: और काले वाले को?
किसान: उसे भी बाहर के कमरे में.

TV पत्रकार: आप इन बैलों को नहलाते कैसे हो?  
किसान: काले वाले को या सफ़ेद वाले को?
TV पत्रकार: सफ़ेद वाले को
किसान: पानी से
TV पत्रकार: और काले वाले को?
किसान: उसे भी पानी से

अब पत्रकार साहब का पारा 7वें आसमान पर चढ़ गया. पर मर्यादा का ध्यान आते ही थोड़ा शांत हुए.

TV पत्रकार: भाई साहब. जब आप दोनों के साथ सब कुछ एक जैसा ही करते हैं तो मुझसे बार-बार ये क्यों पूछते हैं कि “काला वाला या सफ़ेद ”?
किसान: क्योंकि काला बैल मेरा है.
TV पत्रकार: तो फ़िर सफ़ेद बैल?
किसान: वो भी मेरा है.

किसान के उत्तर से पत्रकार साहब निरुत्तर होकर बेहोश हो गए.
जब काफ़ी देर बाद वो होश में आए तो
किसान: अब पता चला TV वाले बाबू.
TV पत्रकार: क्या पता चला?
किसान: जब तुम लोग 1 ही समाचार को पूरे दिन घुमा-फिरा कर दिखाते रहते हो तो हम भी ऐसे ही दुखी होते हैं.

पत्रकार महोदय चुपचाप वहां से चले गए. उनको पत्रकारिता के असली महत्व का आज पता चल ही गया.




चलते-चलते संदीप गौड़ द्वारा रचित 2 क्षणिकाओं की प्रस्तुति आपके लिए.

पहली:


दूसरी:

मेरे मां-बाप
अपने बच्चों के साथ रहते थे.
और दादा-दादी अकेले.
मैं अपने
बच्चों के साथ रहता हूं
और मेरे माता-पिता अकेले.
मेरे बच्चे
अपने बच्चों के साथ रहेंगे
और मैं और मेरी पत्नी अकेले.
तब शायद मैं लौटना चाहूंगा
अपने मां-बाप के पास.

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