Oct 19, 2018

Week में 1 दिन डिजिटल उपवास






इंटरनेट के शानदार इस्तेमाल ने जहां घर बैठे कई सुविधाओं को ऑनलाइन तरीके से भारत के युवाओं और बच्चों तक पहुंचा दिया है, वहीं नई – नई अजीबोगरीब मानसिक और शारीरिक मुसीबतों के बीच भी उलझा दिया है.

फ्री इंटरनेट और सोशल मीडिया का चस्का इंडिया को लग चुका है. जहां Updation के लिए अच्छा संकेत है वहीं लिमिट से ज्यादा यूज बेहद Surprising.

ये तो सबको मान ही लेना चाहिए कि कम से कम  इंडिया अब Digitally Develop हो चुका है. 
क्यों और कैसे ??
15 साल के बच्चे को भी पता है कि 45 साल का आदमी क्या-क्या कर चुका होता है. इतनी Advanced डेवलपमेंट तो शायद ही पहले कभी हुई हो. इससे जहां हर चीज़ की नॉलेज बच्चे को हो गई है वहीं अब उसकी Curiosity, Naturality और इमोशनल अटैचमेंट पर भी डिजिटल Tag लग चुका है. ये कमाल हो गया है. क्या नहीं हुआ है ? 

अब ये तो सिस्टम मेकर्स पर हैं कि वो इसे प्रतिभा का सही Use Declare करें या फ़िर ये कि पुरानी सभी शिक्षाएं तो सिर्फ़ बचकानी थी. क्योंकि रियल सिचुएशन अब ये है कि बैलेंस करना भारी पड़ रहा है.

यूथ अब सिर्फ़ एक तरफ़ ही मूव कर रहा है. यानि डिजिटल जीना, डिजिटल सोचना, डिजिटल जागना, डिजिटल सोना, डिजिटल पढ़ना, डिजिटल Parenting, डिजिटल रिश्ते, डिजिटल लव, डिजिटल हेट और डिजिटल स्वभाव.
Artificial Intelligence का इससे महानतम रूप और हो भी क्या सकता है? 

एक नज़र दौड़ा लेते हैं आज के युग के बच्चों के विकास में आधुनिक डिजिटल मीडिया के फ़ायदे और साथ ही फ्री मिल रहे उन नुकसानों पर जो बाद में बहुत महंगे पड़ सकते हैं.

डिजिटल युग के फ़ायदे
लेटेस्ट चीज़ों की तुरंत जानकारी

लाइफ़ आसान कर देने वाली सुविधाएं

शारीरिक भागदौड़ कम या लगभग ख़त्म

कुछ सीखने की जरुरत ख़त्म. नेट पर देखो और सिख लो कल्चर का विकास

किसी से कुछ भी सीखने की ज़रूरत गायब. ख़ुद गुरु, ख़ुद चेले

हाथ में स्मार्ट फ़ोन. मॉडर्न होने की पहचान. किसी पड़ोसी की ज़रूरत कहां? और किसलिए? सब ऑनलाइन. फ़ास्ट. इजी. नो Arguments. नो खिच- खिच


बॉडी रिलैक्स्ड. माइंड ऑलवेज Engaged. एक्टिव. शार्प. इमोशनलेस. प्रैक्टिकल बच्चा. कामयाबी की गारंटी.


किताबों का झंझट ख़त्म.


हाथ में जादू की छड़ी. जहां मर्ज़ी, जैसे मर्ज़ी घूमा दो.


अब ढेर सारी हैप्पीनेस और एंटरटेनमेंट ऑनलाइन Available. किसी और से क्या लेना.


10 साल की उम्र में 30 साल का Developed माइंड. इससे ज्यादा investment और कहां? और कितना निखार चाहिए था ?


ऑनलाइन जनरेशन. ऑनलाइन Expectation. ऑनलाइन Thoughts. ऑनलाइन सोच. ऑफलाइन कट. सब झट-फट.


डिजिटल युग के नुकसान
जल्दबाजी की आदत – फ़ास्ट सोचने की वजह से


Jealous होना – दूसरों को इन्फीरियर देखने की वजह से


गुस्सा और नफ़रत – मनमाफ़िक कुछ ना होने या कम होने की वजह से


फेसबुक पर अपने कमेंट पर Like कम मिले या नहीं मिले तो सीधे Depression और एंग्जायटी


Whats-app पर Quick Response नहीं मिला तो रिश्ता ख़त्म


लगातार मोबाइल यूज़ करते रहने से बैचनी, घबराहट और बेवजह का डर लगना


हाथ की उंगलियों में और कलाइयों में दर्द


आंखों में खुजली


स्पॉन्डिलाइटिस


सामाजिक रिश्तों में सच की जगह ऑनलाइन Sympathy का जलवा


बिना काम किसी से बात करना. मदद लेना – देना बंद


माइंड से जुड़ी नई बीमारियों का विकास


क्रिएटिविटी कम, फ़ास्ट Revision मॉडल


स्कूल और घर में पढाई से ध्यान भटकना


सब कुछ जानने की जल्दी. ख़ुद को और अपनों को टाइम देना मुश्किल


माइंड बिजी तो लगता है कि लाइफ़ बिजी. Actual में ऐसा नहीं है


नींद का बहुत कम हो जाना या बिलकुल ही नहीं आना


फिजिकल एक्टिविटी बंद. सिर्फ माइंड एक्टिव. बॉडी फैटी



तो अब सबसे ज्यादा Need किस बात की है?
एक ब्रेक की. जैसे ज्यादा खाने से पेट ख़राब हो तो एक दिन उपवास रख लेना चाहिए ताकि नार्मल सिचुएशन आ जाये. वैसे ही डिजिटल मीडिया की ज्यादा डोज़ से बचने का उपाय है – डिजिटल उपवास. बीच – बीच में ये उपवास रखते चलिए. ठीक रहेगा. नहीं तो हर दिन दशहरा ना हो जाए. मतलब ये कि बच्चों के रोज-रोज पटाखे ना बजें और माइंड में Pollution ना हो तो उनकी डिजिटल सफ़ाई कराते रहिए. आप भी अपना ध्यान रखिए.

हैप्पी दशहरा. अच्छा लीजिए. अच्छा बाटिये.

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