Dec 6, 2018

5 Most Common Regrets.







Australia की ब्रोनी वेयर कई Years तक कोई मीनिंगफुल  काम तलाशती रहीं. लेकिन कोई शैक्षणिक योग्यता और एक्सपीरियंस न होने की वजह से उनकी बात बन नहीं पा रही थी. लेकिन हर किसी को कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ता है.  

ब्रोनी ने एक हॉस्पिटल की Palliative Care Unit में काम करना शुरू किया। यह वो Unit होती है जिसमें Terminally ill या Last Stage वाले मरीजों को admit किया जाता है। यहाँ मौत से जूझ रहे लाईलाज बीमारियों व असहनीय दर्द से पीड़ित मरीजों के मेडिकल डोज़ को धीरे-धीरे कम किया जाता है और Councelling के माध्यम से उनकी Spiritual and Faith Healing की जाती है ताकि मौत को शांतिपूर्वक अपना सकें और ख़ुशी ख़ुशी दुनिया से अलविदा ले सकें.

ब्रोनी ने ब्रिटेन और मिडिल ईस्ट में कई सालों तक मरीजों की Counselling करते हुए पाया कि मरते हुए लोगों को कोई न कोई पछतावा ज़रूर था.

कई सालों तक सैकड़ों मरीजों की Counselling करने के बाद ब्रोनी ने मरते हुए मरीजों के सबसे बड़े 'पछतावे' या 'Regret' में एक Common पैटर्न को Feel किया.

हम सब इस Universal Truth से वाकिफ़ हैं कि मरता हुआ व्यक्ति हमेशा सच बोलता है. उसकी कही एक-एक बात Epiphany अर्थात 'ईश्वर की वाणी' जैसी होती है.

जानकारी के मुताबिक, ब्रोनी ने मरते हुए मरीजों के Epiphany को रिकॉर्ड किया. बाद में उन्होनें अपने Conclusions को एक Book “The Top Five Regrets of the Dying" के रूम में Publish किया. बुक छपी और Superhit साबित हुई. अब तक ये किताब लगभग 29 Languages में Print चुकी है। पूरी दुनिया में इसे लगभग 12 लाख से भी ज़्यादा लोग पढ़ चुकें हैं और Motivate हो रहे हैं.

ब्रोनी द्वारा किताब में Listed '5 सबसे बड़े Regrets' हैं:

1. "काश मैं दूसरों के अनुसार न जीकर अपने अनुसार ज़िंदगी जीने की हिम्मत जुटा पाता".
यह सबसे ज़्यादा Common Regret था, इसमें यह भी शामिल था कि जब तक हम यह महसूस कर पाते हैं कि अच्छा स्वास्थ्य ही आज़ादी से जीने की राह देता है, तब तक मौका हाथ से निकल चुका होता है.

2. "काश मैंने इतनी कड़ी मेहनत नहीं की होती".
ब्रोनी ने बताया कि उन्होंने जितने भी Male मरीजों का ट्रीटमेंट किया, उनमें से लगभग सभी को यह पछतावा था कि उन्होंने अपने रिश्तों को समय नहीं दिया. ज़्यादातर मरीजों को Regret था कि उन्होंने अपना अधिकतर जीवन अपने कार्य स्थल पर ही खर्च कर डाला. उनमें से हर एक ने ये भी कहा कि वे थोड़ी कम कड़ी मेहनत करके अपने और अपनों के लिए समय निकाल सकते थे, अगर वो उस समय ये सोच पाते तो.

3. "काश मैं अपनी Feelings को Express करने की हिम्मत जुटा पाता".
ब्रोनी ने पाया कि बहुत सारे लोगों ने अपनी Feelings का गला केवल इसलिए घोंट दिया ताकि शाँति बनी रहे. As a Result, उनको औसत दर्ज़े का जीवन जीना पड़ा और वे जीवन में अपनी वास्तविक योग्यता के अनुसार जगह नहीं पा सके. इस बात की कड़वाहट और असंतोष के कारण उनको बेवजह ही कई बीमारियाँ हो गयीं.

4. "काश, मैं अपने दोस्तों के Contact में रहा होता".
ब्रोनी ने देखा कि अक्सर लोगों को मौत के पास पहुँचने तक भी अपनी पुरानी दोस्ती के पूरे फायदों का वास्तविक एहसास तक नहीं हुआ था. उनमें से अधिकतर तो अपनी Personal लाइफ़ में ही इतने उलझ गये थे कि उनकी कई सालों पुरानी 'गोल्डन फ़्रेंडशिप' उनके हाथ से निकल गयी थी. उन्हें 'दोस्ती' को अपेक्षित समय और ज़ोर न देने का गहरा अफ़सोस था. हर कोई मरते वक्त अपने Friends को याद कर रहा था.

5. "काश मैं अपनी इच्छानुसार स्वयं को खुश रख पाता".
इस रिसर्च से आश्चर्य की एक बहुत ही Important बात सामने आयी कि कई लोगों को लाइफ़ के Last Stage तक यह पता ही नहीं लगता है कि 'ख़ुशी' यानी Happiness भी एक choice है.

सार:
जी भर के जी ले मेरे यार.
Happiness is Right Now or Never.

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