Dec 3, 2018

गट्टू चोर है मेरा नाम। नाम तो सुना ही होगा।






एक चोर था जिसका नाम ‘गट्टू’ था। वह अपने शहर का नामी चोर हुआ करता था. वैरी फेमस.

डेली चोरी करना उसकी आदत बन गई थी। जब तक वह रात को किसी के घर में कूदकर चोरी न कर लाता, उसे रात-भर नींद नहीं आती थी, फ़िर भले ही चोरी में उसके हाथ दुअन्नी आती।

एक रात गट्टू शहर की अंधेरी गलियों में घूम रहा था उसे उचित स्थान और अवसर की खोज थी।

उसी शहर में एक धनी व्यक्ति के यहा रात्रि जागरण का कार्यक्रम हो रहा था, जिसमें वाद्य यंत्रों की सुरीली धुन के साथ भगवान् की महिमा का वर्णन किया जा रहा था।

जो भी गायक था, वो अवश्य ही सुरीले कंठ का स्वामी तो था, साथ ही अच्छा भगवद्भक्त भी था। वह दो पंक्तियां गाने के बाद ईश्वर की महिमा का ऐसा वर्णन करता कि सुनने वाले मुग्ध हो जाते।

गट्टू चोर भी भटकता हुआ उस घर में आ गया, जहाँ प्रागण में विशाल भीड़ के समक्ष गायक ने भगवन्नाम की स्वरलहरी छेड़ रखी थी ।

गट्टू का माइंड एक्टिव हो गया। उसके विवेक में यह बात आ गई कि प्रांगण में जैसा रस बरस रहा था, उसे सुनने के लिए निश्चय ही घर के सभी सदस्य वहीं उपस्थित होंगे थे और घर खाली पड़ा होगा।

ऐसा अवसर गट्टू भला क्यों गवांने वाला था? वह तत्काल भवन के पिछवाड़े गया और रस्सी डालकर घर में प्रवेश कर गया। उसका सोचना सही निकला। घर निर्जन था। गट्टू चोर धन-दौलत ढूंढने में जुट गया। अंधकार होने की वजह से उसे कुछ नहीं मिल पा रहा था तो वह एक खिड़की को खोलने के इरादे से खिड़की के पास पहुंचा। उसने खिड़की खोली तो थम गया।

अभी-अभी गायक ने रत्न-मणि-माणिक्य की चर्चा की थी। गट्टू ध्यान से सुनने लगा।
गायक कह रहा था: प्रात काल होने पर ग्वालबाल कृष्ण और बलदाऊ को खेलने के लिए बुलाने आ जाते हैं।” तब तक माता यशोदा अपने दोनों पुत्रों को नहला चुकी थीं। अब वे कृष्ण और बलराम को गहनों से सजा रही थीं। करोड़ों रुपए के गहने। मुकुट में झिलमिलाते हीरे, बाजूबंद में दमकते हीरे, गलहार में मणियां जिससे प्रकाश किरणें फूट रही थीं। कानों में स्वर्ण के बड़े-बड़े झिलमिलाते कुंडल। क्या नज़ारा था।

कितने सुंदर लग रहे थे दोनों ! यह वृंदावन की सबसे मनोहर झांकी है। तत्पश्चात स्वर्णाभूषणों से सुसज्जित कृष्ण-बलराम गौ चराने वन की तरफ चल पड़ते हैं।”

गट्टू चोर ने जब यह सुना तो उसके दिमाग में खलबली मच गई। ‘मैं भी निरा मूर्ख हूं। थोड़े से धन-माल के लिए रातों को मारा-मारा फिरता हूं। जबकि यह पंडित बता रहा है कि दो बच्चे अरबों के गहने पहनकर जगंल में गाय चराने जाते हैं। इससे उनका पता पूछ लेता हूँ और जंगल में जा दबोचता हूं। बच्चे ही तो हैं। मेरा रूप देखकर ही भयभीत हो जाएंगे, वरना एक-एक थप्पड़ जड़ दूंगा तो गहने उतारने ही पडेंगे।’ गट्टू सोच रहा था।

अब गट्टू को उस घर से कोई मोह नहीं रहा और वह वहां से निकलकर वापस कार्यक्रम में आ बैठा। अब उसे कार्यक्रम के समाप्त होने की प्रतीक्षा थी। अर्धरात्रि बीत जाने पर कार्यक्रम समाप्त हुआ तो प्रसाद वितरण हुआ। गट्टू ने भी प्रसाद लिया और बाहर गली में आ खड़ा हुआ। काफी देर पश्चात उसे वह गायक पंडित अकेला आता नजर आया। उसका मन प्रसन्न हो उठा।

पंडित उसके पास से गुजर गया तो गट्टू उसके पीछे लग गया। एक निर्जन स्थान देखकर गट्टू ने पंडित की बाह पकड़ ली।
तनिक ठहर जाओ पंडितजी महाराज!” गट्टू बोला:”लपके कहाँ जाते हो? हम भी तो तुम्हारे पीछे हैं अपना काम छोड़कर।”
क…क…कौन हो तुम?” पंडित जी डर गए।
मैं गट्टू चोर हूं। नाम तो सुना ही होगा?”
मुझसे क्या चाहते हो भाई ! मैं तो गरीब ब्राह्मण हूं।”
महाराज! आप अपनी मूर्खता से गरीब हैं अन्यथा आपसे बड़ा धनवान कौन होता? आप तो ऐसे खजाने के बारे में जानते हैं जो करोड़ों से भी कहीं ज्यादा है।”

पंडित जी कुछ भी नहीं समझे। ”अब आप मुझे उन दोनों बालकों का पता बताइए महाराज! जो इतने रत्न जड़ित स्वर्ण आभूषण पहनकर गौ चराने वन में जाते हैं। मैं उनसे गहने छीनकर लाऊंगा और साथ ही साथ आपको भी मालामाल कर दूंगा।”

पंडित जी पहले तो अचंभे में पड़ गए। फिर उसकी मूर्खता पर मन-ही-मन हंस पड़े।
अच्छा वे बालक ! उनका पता जानना चाहते हो? भाई, वे तो बड़ी दूर रहते हैं।”
कोई बात नहीं। मैं चला जाऊंगा। आप बस मुझे उनका पता और उनके पास के धन-माल को सविस्तार बता दीजिए। उनके गहने कितने के होंगे?”

उन गहनों का मूल्य कोई नहीं बता सकता। वे तो अनमोल हैं। उनके गहनों में एक कौस्तुभ मणि है जो अकेली संसार की समस्त सम्पदा के बराबर है।”
अच्छा !” चोर के नेत्र आश्चर्य से फैले : ”इतनी बहुमूल्य मणि !”

हां भाई ! उस मणि जैसा रत्न तो पृथ्वी पर दूसरा है ही नहीं। वह मणि जहां होती है वहाँ अंधकार नहीं रह सकता।”
महाराज ! अब मुझसे धैर्य नहीं हो रहा। मुझे जल्दी उन बालकों का पता और उनके नाम बताओ। नाम जानना भी आवश्यक है। नाम से ढूंढने में जरा आसानी भी रहेगी।” गट्टू व्यग्रता से बोला।

नाम तो उनके कृष्ण और बलराम हैं।”
 किरशन और बल्लाराम !”
तुम निपट मूर्ख हो ! अच्छा ऐसा करो नंदलाल याद रखो। यह भी नहीं रख सकते तो सांवरिया नाम याद रखो।”
सांवरिया ! यह अच्छा है। रटता जाऊंगा। याद हो जाएगा। अब सुगम मार्ग बताओ जिससे जल्दी वहां पहुंच सकूं।”
वृंदावन चले जाओ। वन में कदम्ब का पेड़ ढूंढ लेना। सांवरिया वहीं बांसुरी बजाता है। हो सकता है तुम्हें मिल जाए।” 

मिलेगा कैसे नहीं ! अच्छा अब चलता हूँ। लौटकर आपका हिस्सा आपको अवश्य देकर जाऊंगा। प्रणाम पंडित जी !”
प्रणाम !” पंडित जी ने चैन की सांस ली। पीछा छूटा निपट मूर्ख से। अब भटकेगा वन-वन ‘सांवरिया-सांवरिया’ रटता हुआ।

गट्टू वहां से चल दिया। मन-ही-मन वो ‘सांवरिया’ की रट लगाए हुए था। वह सीधा वृंदावन के मार्ग पर चल पड़ा। न उसे भूख सता रही थी और न ही प्यास लग रही थी। वह नहीं चाहता था कि खाने-पीने के चक्कर में वह उस बालक का नाम भूल जाए। इसी धुन में चलता हुआ गिरता-पड़ता सांवरिया रटता वह वृंदावन के मनोहारी वन में पहुंच गया।उसे वन में प्रवेश करते ही कदम्ब का वृक्ष दिखाई पड़ गया तो उसकी समस्त थकान दूर हो गई। अब वह अपने लक्ष्य के बिल्कुल समीप जो था। चूंकि रात्रि थी, इसलिए अब तो प्रात: काल में ही वे बालक गाय चराने आते। उसे सारी रात्रि प्रतीक्षा करनी ही होगी। वह वहां पर ही बैठा-बैठा सांवरिया रटता रहा और सुबह की प्रतीक्षा करने लगा। 

प्रात: हुई तो पूर्व दिशा से सूर्य की लालिमा पृथ्वी पर पड़ी।
बड़ा ही मनोहारी प्रकाश था। गट्टू के हृदय में व्यग्रता घर किए थी। वह कम-से-कम 50 बार पेड़ से कूदा और फिर चढ़ा। सूर्यदेव गरमाने लगे थे। उसी अनुपात में सकट का हृदय भी व्याकुल हो रहा था। सच बात तो यह है कि ईश्वर को पाने के लिए इसी व्याकुलता की जरूरत होती है। ईश्वर पूजा-पाठ करने से नहीं मिलते। उपवास-दान करने से भी उन्हें पाना मुश्किल है। उन्हें पाने के लिए तो बस उनके दर्शन की तीव्रतम् अभिलाषा मन में होनी चाहिए। भोले गट्टू के मन में प्रभु-दर्शन की वह अभिलाषा उत्पन्न हो गई थी।
भाव के भूखे दीनानाथ को इससे क्या मतलब था वह कि कौन था? क्या करता था? उन्होंने तो गट्टू के भाव को परखा और खुद उससे मिलने चल पड़े।

अंतत: उसे एक दिशा में दूर कहीं बांसुरी की स्वर लहरी सुनाई दी। वह पेड़ से नीचे कूद आया। बांसुरी की आवाज प्रतिपल करीब आती जा रही थी। उस स्वर लहरी में न जाने कैसा जादू था कि गट्टू को अपने मन-मस्तिष्क लहराते प्रतीत होने लगे। एक अद्भुत नशा उसके विवेक से टकरा रहा था। वह अपनी सुध-बुध खो बैठा और वहीं बेहोश हो गया। जिस बांसुरी की धुन सुनकर कभी ब्रह्मा भी मोहित हो गए थे भला उस धुन से गट्टू मदहोश क्यों नहीं हो जाता। उसे होश आया तो उछलकर खड़ा हुआ। अब उसे जंगल में एक दिव्य प्रकाश फैला नजर आया। दूर धूल उड़ाती गायें नजर आईं।


व्याकुल होकर वह दौड़कर उधर लपका तो गायों से बहुत पीछे उसे उस मनोहर प्रकाश की छटा बिखेरते वे मुरली मनोहर दाऊ के साथ नजर आए।
ओ सांवरिया ! तनिक ठहर तो लाला !” उसने उच्च स्वर में पुकारा।
दोनों बालक मुड़े तो गट्टू सम्मोहित हो गया।
अहा. कितने सुंदर मुख है इन बालकों के !’ उसका हृदय कह उठा : ‘आखों में ! कितनी सुलभता है ! इतने सुंदर और भोले बालक तो मैंने कहीं नहीं देखे। कैसे निर्दयी माता-पिता हैं इनके जो ऐसे सुकुमार बालकों को वन में गाय चराने भेज देते हैं। ऐसी मनोहारी छवि ! इन्हें तो देखते रहने को जी चाहता है ।’ मैं इनसे गहने कैसे छीनूंगा? मेरा तो हृदय ही फट जाएगा, परंतु मैं इतनी दूर आया हूं गहने तो छीनूंगा। मैं तो चोर हूं मुझे इनसे मोह क्यों हो रहा है? मुझे तो गहने लेने हैं।’

अरे लाला, भागे कहां जा रहे हो? मैं कितनी मुसीबत भुगतकर यहां आया हूं, कुछ पता है?
गट्टू चोर है मेरा नाम। सुना ही होगा। अब अपने सब गहने उतारो और चुपचाप घर चले जाओ।” गट्टू ने घुड़ककर कहा।
हम अपने गहने तुम्हें क्यों दें?” सांवला बालक मंद मुस्कान से बोला।
देते हो या कसकर थप्पड़ जमाऊं” चोर ने आखें निकालीं।
नहीं देंगे ।”
अच्छा ! तो मुझे तुम दोनों की पीठ तोड़नी पड़ेगी”।
अरे बाप रे ! कोई बचाओ। बाबा, अरे ओ बाबा ! बचाओ !”

चोर ने झपटकर सांवरिया का मुंह दबा लिया। अचानक जैसे बिजली चमक उठी। उस स्पर्श ने गट्टू के अंतर तक बिजली कौंधा दी। वह जैसे पाषाण में बदल गया। अंतर में अभी भी कहीं तार झंकृत हो रहे थे। और गट्टू चोर को जाने क्या हुआ वह रो पड़ा। अरे तुम कौन हो? क्यों तुम्हारे स्पर्श से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं बहुत हल्का हो गया हूं?

मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे मैं किसी अलौकिक आनंद के सागर में डूब रहा हूं। तुम्हारी मुग्ध करने वाली छवि मुझे मेरे उद्देश्य से भटका रही है। तुम निश्चय ही नर रूप में कोई देव हो।”
अरे नहीं बाबा !” सांवरिया ने कहा : ”हम तो साधारण बालक हैं। हम तो नंदराम के बेटे हैं।”
जो भी हो । अब तुम जाओ। अब मैं तुम्हारे गहने नहीं लूंगा। अब मेरे हृदय में कोई कामना ही नहीं रही। बस तुम एक बार अपनी छोटी सुंदर हथेलियों को चूम लेने दो। मैं पूर्ण तृप्त हो जाऊंगा। अब मैं कहीं जाने वाला नहीं। यहीं इसी पेड़ के नीचे रहूँगा ताकि प्रतिदिन तुम्हारी सलोनी सूरत निहार सकूं। तुम प्रतिदिन कुछ पल के लिए मुझे अपने दर्शनों से कृतार्थ करते रहना। जिस दिन तुमने दर्शन नहीं दिए मैं उसी दिन व्याकुल होकर प्राण त्याग दूंगा।”

और यदि हम तुम्हें अपने गहने दे दें तब?”
गहने ! गहनों का अब मैं क्या करूँगा। नहीं, मुझे तुम्हारे दर्शनों के अलावा किसी सुख की कामना नहीं है।”
फिर उस पंडित को क्या मुहं दिखाओगे जिससे कहकर आए हो कि तुम निश्चय ही उसे मालामाल कर दोगे?”
अरे वाह! तुम्हें कैसे मालूम ?” चोर चकित हो गया।

हमें सब मालूम है। लो ये गहने ले जाओ नहीं तो वह पंडित तुम्हारी हंसी उड़ाएगा कि तुम दो छोटे बालकों से गहने न ला सके।”
बात तो तुम्हारी ठीक है, परंतु तुम्हारे माता-पिता तुम पर गहनों के लिए क्रोधित नहीं होंगे?”
नहीं होंगे। हमारे पास बहुत गहने हैं। तुम फिर आना। हम तुम्हें और भी गहने देंगे।” ये कहकर श्रीकृष्ण ने अपने गहने उतारे।
फिर मैं ऐसा करता हूँ कि तुम्हारे गहने ले जाकर उस पंडित को दिखाता हूं। फिर आकर तुम्हारे गहने लौटा दूंगा। इस तरह मेरी भी बात रह जाएगी और तुम्हारे गहने भी तुम्हें मिल जाएंगे।

मैं तो बस तुम्हारी मनमोहिनी छवि देखकर ही जीवित रह सकता हूं। इन गहनों से मेरा जीवन नहीं चलेगा।”
ठीक है। जैसा तुम्हें उचित लगे।” श्रीकृष्ण ने कहा और दोनों ने अपने गहने उतारकर पोटली में बाँधकर उसे दे दिए।

गट्टू वहां से चल दिया इस उत्कठा में, कि उसे जल्दी ही वापस भी आना है और वो बिना कहीं आराम किए उस पंडित के पास पहुँच गया।

महाराज !” वह पंडित से बोला: ”आप बड़े निर्दयी हैं। ऐसे सुकुमार बालकों के गहने लूटने भेज दिया। अरे, मेरा हृदय तो उन्हें देखते ही बदल गया। कैसी मनोहारी छवि थी उनकी ! मैं तो उनका दास बन गया। कितने दयालु भी हैं। मैं नहीं चाहता था फिर भी उन्होंने अपने गहने मुझे दे दिए। यह देखिए कितने सारे गहने हैं। यह रही वह अनमोल कौस्तुभ मणि ! यह रहा रत्नजडित बाजूबंद। देख-भर लो दूंगा नहीं। वापस करने का वचन दे आया हूं।”

पंडित तो खुली पोटली से जगमगाते रत्न आभूषण को देखकर ही चक्कर खा गया। यह कैसा चमत्कार था ! वह पापी चोर कैसे उस दिव्यमूर्ति के दर्शन पा सका जिसके लिए बड़े-बड़े साधु योगी जगत को त्यागकर दिन-रात उसी की लौ में रमे रहते हैं?

यह सब कहाँ से ले आया तू ?” पंडित जी ने पूछा ।
कहाँ से? अरे यह उन्हीं बालकों के गहने हैं जिनका पता तुमने मुझे बताया था। यह उसी सांवरिया के गहने हैं।”

तेरी लीला कमाल है गिरधारी !” पंडित जी के मुख से निकला : मैंने जीवन-भर तेरी स्तुति की। रात-रात भर जागकर तेरा गुणगान किया और तूने इस वजमूर्ख पापी चोर को जो अपने कर्मों से सज्जनों को त्रास देता है अपने गहने तक दे डाले? वाह रे छलिया, मेरी धूपबत्ती भी तुझे न सुहाई और इस दुष्ट की तलाश पर ही तू प्रसन्न हो गया।”

अब चलता हूं पंडित जी ! सुबह तक पहुंचना है। उनके गहने वापस करने हैं। मुझे तो अब वहीं बसेरा करना है और उन मनोहर बालकों के मैं अब प्रतिदिन दर्शन किया करूंगा।”
अच्छा! मुझे तो तेरी बात पर विश्वास नहीं है। क्या तू मुझे उनसे मिला सकता है?” पंडित जी ने कहा । 
क्यों नहीं। चलो मेरे साथ। पर दूर बहुत है पंडित जी ! मार्ग भी बहुत कठिन है। सुबह तक पहुंचना है। कहीं भी रुकना नहीं है।
सोच लीजिए, परंतु लाला सांवरिया से विनती करके तुम्हें कुछ गहने अवश्य दिलवा दूंगा।”

पंडित जी तत्काल उसके साथ चल पड़े। रास्ता बड़ा कठिन था। गट्टू तो जाने किस धुन में चला जा रहा था, मगर पंडित जी की तो पिंडलियां दुखने लगी थीं। जी चाह रहा था कि वहीं सो जाएं परंतु एक सुअवसर उसे मिलता प्रतीत हो रहा था जिसे वह किसी भी मूल्य पर गवाना नहीं चाहता था। रात्रि-भर की यात्रा के पश्चात भोर का प्रकाश फैला तो गट्टू हर्षित स्वर में नाचने लगा।

पंडित जी ! यही है वो स्थान जहां वे दोनों मुझे मिले। अब थोड़ी देर प्रतीक्षा करनी होगी। वे गायें लेकर आते ही होंगे। आप एक काम कीजिए, इस पेड़ पर चढ़ जाइए। नए आदमी को देखकर बच्चे डर सकते हैं।” पंडित जी उस कदम्ब के पेड़ पर चढ़ गए। थोड़ा समय बीता।

पंडित जी ! वो आ गया। उसकी बांसुरी की मधुर धुन सुन रहे हो न?” गट्टू प्रसन्नता से चीखा : ”वह आ रहा है। अब थोड़ी ही देर लगेगी।” मुझे तो कोई बांसुरी नहीं सुनाई पड़ रही ।” पंडित व्यग्र हो उठा।
वह अभी तो आया है। आपके कानों में कोई विकार लगता है।” तब तक भक्तवत्सल भगवान कृष्ण और बलराम उसके समीप आ गए। दोनों ही बड़ी मंद-मंद मुस्कान से हंस रहे थे।

आओ लाला । यह लो अपने गहने। गिन लो। मैंने पंडित जी को एक भी नहीं दिया। पहन लो अपने गहने, परतु एक बात बताओ मेरे साथ पंडित आए हैं उन्हें आपकी बांसुरी की आवाज क्यों नहीं सुनाई दी?”

करुनानिधान ने मुस्कराकर पेड़ पर छिपे पंडित को देखा। ”पंडित जी नीचे आओ। देख लो सांवरिया को और गहने मांग लो।”
पंडित जी नीचे तो उतरे परतु कुछ दिखाई तो दे ही नहीं रहा था।
यहां तो कोई नहीं है?” वह बोले।
आपकी आखों को क्या हो गया है? सामने खड़े बालक नजर नहीं आ रहे?

लाला ! ” गट्टू भगवान से पूछ बैठा: ”यह क्या रहस्य हैं ! पंडित जी को न सुनाई देता है न दिखाई देता है। यह मुझे झूठा कह रहे हैं।
लाला ! ऐसा मत करो । गहने मत देना परंतु पंडित जी को अच्छा कर दो।”
अच्छी बात है ! तुम मुझे और इन्हें एक साथ स्पर्श करो।” कृष्ण ने कहा।
गट्टू ने ऐसा ही किया तो पंडित जी के दिव्य चक्षु खुल गए और वह प्रेम विह्वल होकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े।
गट्टू चोर निरंतर अपने ईष्ट की मोहक छवि निहार रहा था।



सार
आस्था और श्रद्धा के साथ लगन हो तो परमपिता परमात्मा आपके निश्छल प्रेम के वशीभूत हो ही जाते हैं। यह गट्टू चोर की निष्कपट लगन से आज सिद्ध हो ही गया था।

No comments: