Jan 31, 2018

February Born People




February Born People से जुड़ी ख़ास बातें 

अगर आपका जन्म किसी भी साल के फरवरी माह में हुआ है तो आपमें गजब की आकर्षण शक्ति है.

आपका स्वभाव रोमांटिक तो होना ही है. आखिर 'वेलेंटाइन डे' वाला महीना जो है. आपका प्यार बेहद गहरा और पवित्र होता है. छल-कपट से कोसों दूर.

बाहरी ब्यूटी आपको उतनी आकर्षि‍त नहीं करती जितना कोई मासूम सीधा-सच्चा दिल. 

आप अपने दिल की बात सबसे कह देंगे मगर जिससे कहना है उससे कभी खुलकर कह नहीं पाते हैं. कुछ करिए जनाब.

आपमें दो बातें ख़ास हैं. 1. अन्तर्बोध क्षमता यानी इंट्यूशन पावर और 2. ग्रहण करने की क्षमता. यानि ग्रॉस्पिंग पावर.

आप जब खुश होते हैं तो खूब खुश होते हैं इतने कि खुशी आपसे संभाले नहीं संभलती और जब दुखी होते हैं तो खूब दुखी.

आपको समझ पाना बहुत मुश्किल तो नहीं लेकिन इतना आसान भी नहीं. 

आपके दोस्तों की संख्या खूब हो सकती है. हर उम्र के, हर वर्ग के दोस्त आपके ग्रुप में मिल जाएंगे. मगर सच्चा दोस्त मिलना बेहद मुश्किल होता है.

आप अक्सर बैठे-बैठाए धोखा खा जाते हैं क्योंकि हर किसी पर विश्वास कर लेना आपकी कमजोरी है.

बचत करना आपको आता ही नहीं है. फरवरी में जन्म लेने वाले कुछ तो इतने मासूम होते हैं कि थोड़ी-सी भी बचत करेंगे तो सारी दुनिया में हल्ला मचा देंगे.

आप भाग्य से ज्यादा कर्म से आगे बढ़ते हैं.

आपकी ईगो आपको साथी के सामने झुकने से रोकती है. 

आपकी ईमानदारी और स्पष्ट व्यवहार की दुनिया तारीफ करती है. आप हमेशा दूसरों मदद के लिए तत्पर रहते हैं.

फरवरी में जन्में व्यक्ति अधिकतर डॉक्टर, लेखक, शिक्षक, चित्रकार, कंप्यूटर विशेषज्ञ या नेता बनते देखे गए हैं. किसी अलग क्षेत्र में कामयाबी हासिल करने के लिए आपको खासा संघर्ष करना पड़ता है.

आपको योग्यता और प्रतिभा की तुलना में पद और पैसा दोनों अक्सर नहीं मिलता, या कहें कि कुछ देर से मिलता है.

फरवरी माह में जन्मे लोगों में एक विशेष तरह का लुभावना अंदाज होता है। वे वाकपटुता से महफिल को जीत लेते हैं.


सभी फरवरी वालों को सलाह दी जाती है कि आप अपना व्यक्तित्व मजबूत बनाएं. अपने आत्मविश्वास को कभी कमजोर ना पड़ने दें. समय के साथ जरूरी परिवर्तन को स्वीकार करें. पुरानी विचारधारा को त्यागें तो आप जैसा शानदार इंसान कोई नहीं.

हैप्पी बर्थ डे फ़रवरी अवतार.





स्त्रोत:इंटरनेट 

ख़ुशी के पल



क्या जीवन में पैसा ही सबकुछ है?

उदाहरण 1 : जमीन-ज़ायदाद भी खूब है. हँसता-खेलता परिवार है. घर पर बर्तन, सफ़ाई और कपड़े धोने के लिए मेड भी उपलब्ध है. फ्यूचर प्लानिंग भी की हुई है. सब कुछ सही है पर जब सुबह आप नौकरी पर निकलते हैं, तो भी चेहरे से ख़ुशी गायब है? पैसा है तो ख़ुशी के पल कहाँ चले गए? क्या ख़ुशी के पीछे सिर्फ़ पैसे का रोल बड़ा हुआ या कुछ और है जिसे आप मिस कर रहे हैं?

उदाहरण 2 : घर में खाने के लाले पड़ें हुए हैं. पिता जी पर क़र्ज़ का बोझ है. बड़ी बहन की शादी के लिए अच्छा लड़का नहीं मिल पा रहा है. माँ की तबियत भी ठीक नहीं रहती. उधार की सी जिंदगी है पर जब सुबह आप नौकरी पर निकलते हैं, तो चेहरे से ख़ुशी झलकती चलती  है? पैसा नहीं है तो ख़ुशी कैसे आ गयी? क्या ख़ुशी के पीछे सिर्फ़ पैसे का रोल बड़ा हुआ या कुछ और है जिसे आप एन्जॉय कर रहे हैं?

हम में से अधिकांश लोग हर सुबह ऐसी नौकरी पर जाने के लिए तैयार होते हैं जिसमे हमें ख़ुशी नहीं मिलती. कभी हमें काम करना बोरिंग लगता है तो कभी लगता है कि जैसे किसी मजबूरी के चलते हम नौकरी में फंसे हुए हैं? वास्तव में हम महीने के अंत में सैलरी के रूप में मिलने वाले पैसे के लिए काम कर रहे हैं. कभी, हमें उन पैसों की जरूरत होती है, कभी कम पैसों में भी हम काम कर सकते हैं.  

सवाल ये है कि हम क्यों ऐसे काम करते रहते हैं, जो हमारी पसंद नहीं है? इसका जवाब है वो पोपुलर धारणा कि "हम तभी खुश रहेंगे जब हमारे पास पैसा होगा".
हम इस धारणा को हर जगह देखते हैं. हम ये सोचते हुए बड़े होते हैं कि हर महीने अच्छा वेतन मिलने से रिटायरमेंट तक बहुत सारी सेविंग्स हो जाएगी जो हमारे बाद में काम आएगी.

लोगों पर की गयी अनेकों स्टडीज में ये पाया गया है कि पैसे का हमारी खुशियों पर क्षणिक प्रभाव होता है. मतलब ये कि पैसा हमें सिर्फ थोड़ी देर के लिए ही ख़ुशी देता है.

उदाहरण के लिए  - बिलकुल वैसे ही जैसे आपने आज खरीददारी की. अब आपकी ख़ुशी तभी तक रहेगी जब तक आप कोई नया विज्ञापन देख कर फिर से खरीददारी का नहीं सोचने लगते. और ये अंतहीन सिलसिला थमता नहीं, उल्टा हमें बैचनी और निराशा के कुँए में ले जाता है. पिछली ख़ुशी गायब, अगली ख़ुशी का इंतजार. बीच के लम्बे समय में उदासी, पैसों की चिंता, समाज में आगे रहने को होड़ और फिर एक दिन जलवा ख़त्म.

ये ही विचार हमें नौकरी से चिपकाये रखता है फिर चाहे हम अंदर से बिखरे ही क्यों ना पड़े हों? लोग स्वयं को दुसरें लोगों के बराबर खुश दिखने-दिखाने के चक़्कर में एक दूसरे के साथ ही कॉम्पीटीशन में लग जाते हैं जिससे न केवल उनका आपसी प्रेम और समझ ख़त्म होने लगती है उल्टा ऑफिस और घर के माहौल पर भी नेगेटिव इफ़ेक्ट पड़ने लग जाता है.


तो इसका समाधान क्या है?

आप जिस प्रकार के काम को पसंद करते हैं उस प्रकार के कार्य करने वाली कम्पनी को ज्वाइन करें या अपना खुद का कोई स्टार्ट-अप शुरू करें. स्टार्ट-अप पारम्परिक कम्पनियों की तुलना में, पूरे वर्ल्ड में नए रोजगार के अवसर सृजन करा रहे हैं. भारत में ही बहुत से लोग अपनी सामान्य नौकरी छोड़ कर अपने पसंदीदा सामाजिक या मीडिया के क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं. याद रखें की अपने पसंदीदा काम की शुरुआत करने में कभी देर नहीं होती.

आप या तो जहाँ हैं, उस जगह काम करना पसंद कर लें या फिर अपना काम कर लें. तीसरा कोई उपाय नहीं है खुश रहने का और ध्यान दें की पैसा यहाँ कही चर्चा का विषय नहीं बन रहा है. आपका नजरिया पैसे से कही ज्यादा ज़िम्मेदार है, आपकी ख़ुशी के लिए.

चाहें तो आज ही आजमा के देख लीजिये. नहीं पसंद आयें तो पूरे पैसे वापस. हा- हा.


इन शोर्ट, यदि पैसा नहीं है तो क्या हम संतुष्ट रहते हैं?

यह इस पर निर्भर करता है आप किन कामों में अपना कितना समय बिता रहे हैं. अगर आपके लिए ख़ुशी का मतलब है किताबें पढ़ना, और अपनों के साथ समय बिताना है और आप काम, उससे जुड़े मसलों, और जॉब में अधिक समय बिताते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आप खुश नहीं रहते. आप अपनी रूचि का कार्य करना शुरू करें और देखेंगे कि पैसा आप कमाने लगें हैं वो भी ख़ुशी के साथ.


तीन चीज़ें जो खरीदी नहीं जा सकतीं?

एक इंसान कामयाब होने और इसका एहसास करने के लिए उधार पर बड़ी-बड़ी और महंगी चीज़ें खरीद लेता है. यह ऐसा है जैसे कोई अच्छा महसूस करने के लिए नशा करता है. दोनों ही चीज़ें सस्ती लग सकती हैं और शायद असर भी करें, मगर सिर्फ कुछ समय के लिए. वहीं दूसरी तरफ, ये हमें लंबे समय के लिए नुकसान पहुँचा सकती हैं.

ध्यान रखिए, दुनिया की सोच हमें गुमराह करती है. जीवन के साधनों का दिखावा करना बेकार है. सच्चाई तो यह है कि ज़्यादा-से-ज़्यादा चीज़ें बटोरने की चाहत में हम इस हद तक भटक सकते हैं कि ज़िंदगी में ज़्यादा अहमियत रखनेवाली चीज़ें हमें नज़र नहीं आ पातीं.

याद रखिए, कुछ चीज़ें पैसों से नहीं खरीदी जा सकतीं. आखिर ये चीज़ें क्या हैं, आइए देखें.


पहली चीज़ है : परिवार की एकता और सदस्यों में प्यार का भाव

नॉएडा में रहनेवाली, 18 साल की नियारा कहती हैं कि मेरे पापा नौकरी और उससे मिलनेवाले पैसों को बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं. हमारे पास ज़रूरत की हर चीज़ है, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा है. फिर भी मेरे पापा कभी घर पर नहीं रहते, वे अकसर काम के सिलसिले में सफर करते रहते हैं. मेरे और मम्मी के लिए उनके पास वक़्त ही नहीं होता. मैं मानती हूँ कि पापा ये सब नौकरी की वजह से करते हैं, लेकिन परिवार के लिए भी उनकी कुछ ज़िम्मेदारियाँ बनती हैं.

ज़रा सोचिए: अगर ऐसा ही चलता रहा, तो आगे चलकर नियारा के पापा को किस बात का अफसोस रहेगा? धन-दौलत और ऐशो-आराम की चीज़ों को ज़्यादा अहमियत देने की वजह से, क्या बेटी और पत्नी  के साथ उनके रिश्ते पर कोई असर पड़ेगा? पैसों से बढ़कर, परिवार के सदस्यों को उनसे और क्या चाहिए?

सच क्या है? - पैसों से परिवार की एकता खरीदना नामुमकिन है. अगर आप परिवार में एकता हासिल करना चाहते हैं तो ज़रूरी है कि आप उनके साथ समय बिताएं, प्यार और परवाह दिखाएं.


दूसरी चीज़ है : सच्ची सुरक्षा

कानपुर की 23 साल की आशा का कहना है कि मेरी मम्मी हमेशा मुझसे कहती हैं कि मुझे ऐसे लड़के से शादी करनी चाहिए जो बहुत पैसे वाला हो. साथ ही, मुझे कुछ हुनर भी सीखना चाहिए ताकि मुसीबत की घड़ी में किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े. मम्मी को हमेशा पैसों की धुन सवार रहती है.

ज़रा सोचिए: भविष्य के बारे में योजनाएँ बनाते वक्‍त, आपको कौन-सी ज़रूरी बातें ध्यान में रखनी चाहिए? कब ये ज़रूरी बातें आपके लिए हद-से-ज़्यादा चिंता करने की वजह बन सकती हैं? सच्ची सुरक्षा के बारे में, आशा की मम्मी को किस तरह का नज़रिया अपनाने की ज़रूरत है?

सच क्या है? - सिर्फ पैसा इकट्ठा करने से हमारा भविष्य सुरक्षित नहीं होता क्योंकि पैसा कभी-भी चुराया जा सकता है. ये बीमारी या मौत को नहीं मिटा सकता. सच्ची सुरक्षा ईश्वर और उसके मकसद को समझने-जानने से ही मिल सकती है.


तीसरी चीज़ है: आत्म-संतोष

हिसार की 25 साल की सोम्या का कहना है कि मेरे माता-पिता ने मेरी परवरिश इस तरह की कि मैं सादा जीवन जी सकूं. कभी-कभी तो हमें थोड़ी चीज़ों में ही गुज़ारा करना पड़ता था. ऐसे माहौल में भी, मैं और मेरा भाई सुरेश हमेशा खुश रहते थे.

ज़रा सोचिए: कम चीज़ों में संतोष पाना क्यों मुश्किल हो सकता है? जब पैसे की बात आती है तो आप परिवार के सामने कैसी मिसाल रखते हैं?

सच क्या है? - ज़िंदगी में पैसा ही सबकुछ नहीं होता. पैसों से हर चीज़ खरीदी नहीं जा सकती. चाहे आदमी के पास बहुत कुछ हो, तो भी उसकी ज़िंदगी उसकी संपत्ति की बदौलत नहीं होती. सही मायनों में जीवन में संतोष तभी मिलेगा, जब हम हर इच्छा को मन की आँखों से नहीं बल्कि ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में देखना शुरू कर देंगे.


तो अब आप पैसा या खुशी, किसे चुनेंगे?

एक इंग्लिश बुक “खुद से प्यार करने का रोग” कहती है कि ऐशो-आराम के पीछे भागनेवाले लोग खुश कम और निराश ज़्यादा रहते हैं. पैसा पाने की चाहत रखनेवाले, मानसिक तौर पर तंदुरुस्त नहीं रहते. उन्हें सेहत से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे सिरदर्द, गले और पीठ का दर्द. पैसों के पीछे भागने से व्यक्‍ति की हालत बदतर हो जाती है. वो व्यक्ति चिडचिडा, नेगेटिव, स्वार्थी, अकड़-भरा और दगाबाज़ बन जाता है और कोई कितना भी उसे समझाए, वो किसी की भी सुनना बंद कर देता है.”



“बदलती सोच” के 2 उदाहरण

उदाहरण 1 : 1970-1990 के शुरूआती सालों में कॉलेज जाने वाले स्टूडेंट्स से पूछा गया कि उनके कॉलेज जाने की वजह क्या है? ज़्यादातर ने कहा कि वे पढ़ा-लिखा इंसान बनना चाहते हैं या ज़िंदगी में कुछ करना चाहते हैं. सिर्फ गिने-चुने स्टूडेंट्स ने कहा कि उनके कॉलेज जाने की वजह है बहुत-सा पैसा कमाना.

उदाहरण 2 : 1990-2010 में देखें तो ज़्यादातर स्टूडेंट्स ने कॉलेज जाने की सबसे बड़ी वजह बतायी कि वे बहुत-सा पैसा कमाना चाहते हैं. अचानक स्टूडेंट्स की सोच में यह बदलाव क्यों आया? जबकि एक तरफ इन्हीं स्टूडेंट्स में निराशा, आत्महत्या और दूसरी मानसिक समस्याओं से जूझनेवालों की गिनती तेज़ी से बढ़ रही है.


जरा सोचिए? सोचना ज़रूरी है. आपका भी कोई इंतजार कर रहा होगा या आप किसी का? इस वक़्त कहाँ है आप?


चलते चलते (हँसना मना है):
NASA ने “Whatsapp” के बाहर भी जीवन की सम्भावना जताई है.


Help links: ewellnessexpert.com, jw.org

Jan 30, 2018

फीलिंग्स का असली मतलब


आपकी सोच ही आपकी डेस्टिनी है
दोस्तों, वैसे तो हमेशा से हम सुनते हैं कि हर आदमी अपना लक लेकर पैदा होता है. लेकिन सदियों से इस बात पर रिसर्च होती रही है कि हमारे सोचने का पैटर्न कैसा होना चाहिए?

· क्या हम अपने विचारों में बदलाव लाकर अपनी डेस्टिनी बदल सकते हैं? क्या हम एक ख़ुशी भरा जीवन बिता सकते हैं ?

·     क्या हम अपने स्वभाव में पाजिटिविटी लाकर दूसरों के जीवन को भी महका सकते हैं?

·     क्या हम दूसरों के दर्द और पीड़ा को समझ कर उनके जीवन में भी मुस्कान बिखेर सकते हैं?

·      क्या सिर्फ़ अपने बारें में ही सोचते रहने से हमें सच्ची ख़ुशी मिल पाती है?

·    क्या हमेशा एक ही ढर्रे पर चलते रहना बदलाव का संकेत कभी दे सकता है?

·    क्या हमें हमेशा ये ही लगता है कि दुसरे सिर्फ़ हमे धोखा देने के लिए ही पैदा हुए हैं?

·  क्या हम इतनी एजुकेशन लेने के बाद भी जातिवाद, भाई-भतीजावाद और स्वार्थवाद की गुलामी से खुद को मुक्त कर सके हैं?

·    क्या हम दूसरों के बारें में सोचने का वक़्त निकाल पाते हैं या सिर्फ उनसे उम्मीद ही करते रह जाते हैं?

·   क्या खुल के हम अपने विचार रख पाते हैं या सिर्फ़ दूसरों की जिंदगी में झाकतें रहना ही हमारी जिंदगी का मकसद है?

·    क्या खुद कुछ पाने से पहले हम दूसरों के लिए कुछ कर पाना पसंद करते हैं?

·    क्या हमें सिर्फ़ अपना रोना दिखाई देता है या हम भी कभी किसी की ख़ुशी के लिए रोये हैं?

·     क्या इस दुनिया को खुबसूरत बनाने में हमारा कोई योगदान है या हम सिर्फ़ टाइमपास करने के लिए ही पैदा हुए?

ऐसे तमाम सवाल हैं जिन पर अगर सही तरीकों से सोचा जाये और उन पर अमल किया जाये तो हो सकता है कि जिसको हम डेस्टिनी समझ कर दुखी हो जाते हैं, उसको हम बदल सकें?  
   
हम हमेशा एक कहावत सुनते हैं, जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं. ये कहावत पूरी तरह से सही हैं, क्योकि हमारा माइंड एक मोमेंट पर एक ही विचार कर सकता हैं पॉजिटिव या नेगेटिव.

और हम जब चाहे नेगेटिव थिंकिंग को पॉजिटिव थिंकिंग में बदल सकते हैं. कई बार तो किसी विषय या व्यक्ति के बारे में नेगेटिव थिंकिंग किसी एक घटना के बाद बदल जाती है. 

हमें एकदम यह पता चलता है कि किसी के बारे में हमारी राय गलत थी.
उदाहरण के लिए  – एक व्यक्ति को एक कार्यक्रम में चीफ गेस्ट बनाया गया. जब वो कार्यक्रम में पहुंचे तो सभी ने उनको नमस्कार करते हुए हाथ मिलाया. पर उनमें से एक आदमी ने उनकी तरफ देखा तक नहीं.  चीफ गेस्ट साहब को ख़ूब गुस्सा आया और उन्होंने अपने दिमाग में उस आदमी के बारे मे नेगेटिव सोच बना ली कि ये आदमी कितना घमंडी है? उन्हें बाद में किसी से बताया कि वो आदमी न तो देख सकता था और न ही कुछ सुन सकता था. इसके बाद चीफ गेस्ट साहब को ये अहसास हुआ कि उनकी सोच उस आदमी के बारे मे कितनी ग़लत थी. 

सवाल उठता है कि क्या उनका ग़लत सोचना उनकी डेस्टिनी थी या उनकी नेगेटिव थिंकिंग?

इसलिए सोच बदलिए. क्या पता डेस्टिनी हमें पॉजिटिव बनाना चाहती हो?

·       एक पल में ही हम अपनी सोच को बदल सकते हैं. करके देखिये.

·   हम लगातार खुद को नाराज करने वाली या नापसंद बाते करके नेगेटिव फीलिंग्स को जिन्दा रखते हैं. पर अच्छी बात ये है कि  हम “रूल ऑफ़ फीलिंग्स” को अप्लाई करके हमारे विचारों को बदल सकते हैं.

·  “रूल ऑफ़ फीलिंग्स” कहता है की “एक स्ट्रोंग फीलिंग हमेशा एक वीक फीलिंग पर हावी रहेगी और जिस किसी फीलिंग पर ज्यादा जोर देंगे, वो उतनी ही मजबूत होती जाएगी.

·   उत्साह और शक्ति से आदमी सदा सफल होता है पर इसका उल्टा निरुत्साही और दुर्बल मन के आदमी हर काम में फेल होते हैं. ये डेस्टिनी नहीं, सोच का परिणाम है.

·      हमें खुद को नेगेटिव थिंकिंग से दूर रखना चाहिए. मतलब कभी भी नेगेटिव की चर्चा न करें. हर बात में पॉजिटिव ढूंढने का प्रयास करें.

·     हम हर वक़्त पॉजिटिव भी नहीं रह सकतें क्योंकि वातावरण का प्रभाव भी पड़ता रहता है. नेगेटिव थॉट्स भी आते रहते हैं. उन्हें अनदेखा  करने के लिए बाहर जायें, अपना पसंदीदा गाना सुनें, जो आपको अच्छा लगे वो करते रहें. अपने क्लोज फ्रेंड्स से शेयरिंग करें जो आपके मूड को बेहतर करने में मदद करतें हो.

·     नेगेटिव एनर्जी वाले लोगों और नेगेटिव आलोचकों से दुरी बना के रखें. ऐसे लोग जीवन भर बुराई के अलावा शायद ही कुछ और सोच सकतें हैं.

·    कैसे भी हालात हो  “मैं सब कुछ कर सकता हूँ”,  “भगवान ने मुझे टैलेंट दिया है”, और “मेरा खुद पर और ख़ुदा पर पूरा भरोसा है”. खुद को इसी तरह से ऑटो – सुझाव देते रहें. आप हैरान रह जायेंगे कि लाइफ़ अब पॉजिटिव होने लगी है.


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इंटरनेट की स्पीड 100 गुना तेज : वाई–फाई नहीं अब लाई-फाई

इंटरनेट का नाम सुनते ही हम सोचने लगते हैं- मूवीज, न्यूज़, फेसबुक, व्ट्सअप आदि. इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोग डाटा, ऑडियो या विडियो डाउनलोडिंग या अपलोडिंग में सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, लेकिन कई बार वाई – फाई की स्लो स्पीड के चलते हमारा मन उदास हो जाता है फिर चाहे हम किसी भी 3 जी या 4 जी नेटवर्क का यूज कर रहे हों. लेकिन अब परेशान होने की ज़रूरत नहीं.

·    जर्मनी के साइंटिस्ट हेराल्ड हास जल्दी ही सबके लिए एक नयी तकनीक ले कर आ रहे हैं जिसका नाम है लाई- फाई.

·       लाई- फाई मीन्स लाइट फिडेलिटी.

·    इस तकनीक से हम वाई – फाई से 100 गुना ज्यादा स्पीड से इन्टनेट एक्सेस कर सकेंगे.

·   लाई-फाई की स्पीड इतनी तेज होगी कि आप धीमी रोशनी वाले बल्ब के नीचे खड़े होकर भी कुछ सेकेंड में अपनी पसंदीदा फिल्म या विडियो आसानी से डाउनलोड कर सकेंगे.

·    लाई-फाई: लाइट फिडेलिटी एक हाई स्पीड तकनीक है जो विजिबल लाइट कम्यूनिकेशन के जरिए डेटा का ट्रांसमिशन करती है.

·    यह तकनीक लाइट्स का इस्तेमाल करते हुए काफी तीव्र गति से डेटा का आदान-प्रदान करती है.

·       इस तकनीक में बल्ब वायरलेस हॉटस्पॉट की तरह काम करते हैं.

·    जरा कल्पना करें कि आपके आस-पास के सभी लाइट बल्ब्स को वायरलेस हॉट्सपॉट्स के रूप में बदल दिया गया हो और इन बल्बों से आपको तेज गति की इंटरनेट स्पीड मिलने लगे तो आपको कैसा अनुभव होगा. ख़ुशी ने नाच उठेंगे आप.

·     लाई-फाई से इंटरनेट की दुनिया पूरी तरह से बदल जाएगी क्योंकि ये वाई-फाई तकनीक से करीब 100 गुना तेज गति से काम करेगी.


·    बताया जा रहा है कि टेस्टिंग के दौरान लाई-फाई ने प्रति सेकेंड 224 गीगाबाइट की स्पीड प्राप्त की. मतलब साफ़ है कि इसके इस्तेमाल से 1 जीबी से ज्यादा की 18 फिल्में एक सेकेंड में डाउनलोड की जा सकेंगी.

·   माना ये भी जा रहा है कि 2025 तक लाई-फाई करीब 150 अरब डॉलर का बिजनेस टर्नओवर कर सकती है.

लाइट बेस्ड लाई-फाई हमारी इंटरनेट की दुनिया को किस तरह से बदल पायेगी, ये जल्दी ही हमें पता चलने वाला है.