Mar 23, 2018

ईश्वर, तुम समझ रहे हो ना?

ये कहानी क्या है बस एक एहसास है. जिसे हो गया उसे हो गया. तो सुनिए साहब.

एक हलवाई की छोटी सी दुकान लेकिन अपने समोसों के लिए बड़ी फेमस. एक बड़े से कड़ाही में समोसे तले जा रहे थे. 

उनमें से एक समोसा अपने रंग-रूप में निखार आने से बेहद खुश था. वह उबलते तेल में से फुदक-फुदक कर इधर उधर देख रहा था. ख़ुशी के मारे मानो डांस कर रहा हो. उसे पता था कि कुछ देर के बाद वो जिंदा नहीं होगा. उसे जाना ही होगा. फ़िर भी वो ख़ुशी के गीत गा रहा था. बीच-बीच में वो थोड़ा इमोशनल भी हो रहा था. अब उसका नंबर आने वाला था.

जब उसे कड़ाही से बाहर निकालने का प्रोसेस चल रहा था तो उसने प्लेट परोसने वाले लड़के को र्इश्वर मान कर मन ही मन प्रार्थना की, हे र्इश्वर, मुझे उस कोने में बैठे प्रेमी-प्रेमिका के प्लेट में मत परोसना. वो टेबल नंबर 7 वाली जोड़ी. प्रेमिका के प्लेट में तो हरगिज ही नहीं. वह प्रेमी के सामने नाक सिकोड़ कर नखरें दिखाएगी, ”मैं नहीं खाऊँगी, तेल की बदबू है. कितना अजीब है ये.
फ़िर प्रेमी शान दिखाएगा, जानू, नहीं खाना है तो छोड़ दो इसे. चिप्स मंगवा दूं? कोल्ड ड्रींक ले लो? नहीं पसंद तो हम कहीं और चलते हैं. बोलो. तुम कहो तो आर्डर अभी कैंसिल कर दूं.

और वह जो सामने टेबल नंबर 3 पर बैठा गोलू, उर्मी सेठ का बेटा - उसकी प्लेट में भी, मुझे कतर्इ मत डालना. कब से राक्षसी नजरों से हमें ही देख रहा है. डाक्टर ने उसे ज्यादा खाने को मना किया है. संयम बरत रहा है बेचारा मोटू. फिर भी 4-5 तो जरुर खाएगा ही. खाएगा क्या, मुहं में ठूंसेगा। 4 से 5 डकार लेगा. पेट पर हाथ लगा कर देखेगा और फिर से क्या खाया जाए यह सोचने लगेगा.

दुकान के बाहर जो दिहाड़ी मजदूर खड़ा है, जो कि अब तक दो तीन बार हमारी कीमत पूछ चुका है. वह बहुत ही भूखा है. मुझे देख कर उसके मुहं में पानी आ रहा है. वो ललचाई नज़रों से हमारी तरफ़ न जाने कब से देखे जा रहा है. पर 6 रूपए एक समोसे पर खर्च करना उसे खल रहा है. फिर भी वह आएगा. भूख और लालच से थक-हार कर ही आएगा. देखेगा-परखेगा. भाव-तौल करने की असफ़ल कोशिश भी करेगा. तब जाकर एक खरीदेगा. फ़िर भले ही इस खर्च की भरपाई करने के लिए बस के बदले उसे 10 किलोमीटर पैदल चल कर घर क्यों ना वापिस जाना पड़े.

र्इश्वर, तुम मुझे ही उस मजदूर को खाने को देना. मुझे लेकर वो सामने लगे उस पीपल पेड़ के नीचे चला जाएगा. मुझे घूमा-फिरा कर हर तरफ़ से मुझे देखेगा. मेरे रंग-रूप को निहारेगा. मेरी सुगंध लेगा. फिर बड़े ही प्यार से थोड़ा-थोड़ा तोड़ कर मुंह में डालेगा. मेरे स्वाद से उसकी आत्मा प्रसन्न होती रहेगी. मुझे खाकर उसका पेट भले ही ना भरे, मन अवश्य ही तृप्त होगा. सामने हैंडपंप होते हुए भी, पानी पीकर वो मेरे स्वाद के अहसास को हरगिज खोना नहीं चाहेगा. वो मुझे याद रखेगा.


पूछो, “क्या मैं किसी का सच्चा दोस्त हूँ?” ये ही सही प्रश्न है.



विश्व भर में उनके फोलोवेर्स हैं जो स्ट्रेस, नो थॉट मैनेजमेंट और मैडिटेशन के उनके बताये रास्तों से गुजरते हैं और इजी लाइफ महसूस करते हैं. हां, ये जरुर माना जाता रहा है कि उनके खुले विचारों की वजह से जहाँ उन्हें लाखों की संख्या में शिष्य मिलते रहते हैं, वहीँ उनकी आलोचना भी समानांतर रूप से होती रहती है. ये हैं रजनीश यानि ओशो. 

हमें उनके बताये कुछ कोट्स पढने का मौका मिला. पढ़ कर लगा कि इसमें तो जीवन के बारे में ही वो सब लिखा है जो व्यवहारिक आदमी के जीवन की परिस्थितियों और संभावनाओं को सामने ला रहा है. आप भी देखिये. क्या ग़लत और क्या सही. ये तो आप ही बेहतर बता सकते हैं?

उनके दिए कुछ कथन
अगर आप सच देखना चाहते हैं तो ना सहमति और ना असहमति में राय रखिये.

कोई चुनाव मत करिए. जीवन को ऐसे अपनाइए जैसे वो अपनी समग्रता में है.

जब प्यार और नफरत दोनों ही ना हो तो हर चीज साफ़ और स्पष्ट हो जाती है.

किसी से किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता नहीं है. आप स्वयं में जैसे हैं एकदम सही हैं. खुद को स्वीकारिये.


जिस दिन आप ने सोच लिया कि आपने ज्ञान पा लिया है, आपकी मृत्यु हो जाती है. क्योंकि अब ना कोई आश्चर्य होगा, ना कोई आनंद और ना कोई अचरज. अब आप एक मृत जीवन जियेंगे.

अर्थ मनुष्य द्वारा बनाये गए हैं. और चूँकि आप लगातार अर्थ जानने में लगे रहते हैं, इसलिए आप अर्थहीन महसूस करने लगते हैं.

आप वो बन जाते हैं जो आप सोचते हैं कि आप हैं.

प्रसन्नता सद्भाव की छाया है. वो सद्भाव का पीछा करती है. प्रसन्न रहने का कोई और तरीका नहीं है.

जीवन कोई त्रासदी नहीं है. ये एक हास्य है. जीवित रहने का मतलब है हास्य का बोध होना.

अधिक से अधिक भोले, कम ज्ञानी और बच्चों की तरह बनिए. जीवन को मजे के रूप में लीजिये – क्योंकि वास्तविकता में यही जीवन है.

सम्बन्ध उनकी ज़रुरत हैं जो अकेले नहीं रह सकते.
कभी ये मत पूछो, ” मेरा सच्चा दोस्त कौन है?” पूछो, “क्या मैं किसी का सच्चा दोस्त हूँ?” ये ही सही प्रश्न है.

ये मायने नहीं रखता है कि आप 'गुलाब' हैं या 'कमल' हैं या के 'मैरीगोल्ड' हैं. मायने ये रखता है कि आप मुस्कुरा रहे हैं.

खुद को खोजिये, नहीं तो आपको दूसरे लोगों की राय पर निर्भर रहना पड़ेगा, जो अभी तक खुद को ही नहीं जानते.

अपनी यूनीकनेस का सम्मान करें, और तुलना करना छोडें. आप जो हैं, उसमे रिलैक्स रहें.

प्रेम तब खुश होता है, जब वो कुछ दे पाता है. अहंकार तब खुश होता है, जब वो कुछ ले पाता है.

एक गंभीर व्यक्ति कभी मासूम नहीं हो सकता. और जो मासूम है, वो कभी गंभीर नहीं हो सकता.

जैसे-जैसे आप अधिक जागरुक होते जाते हैं. इच्छाएं गायब होती जाती हैं. जब जागरूकता 100% हो जाती है, तब कोई इच्छा नहीं रह जाती. ये ही ध्यान है.

खुद को वैसे स्वीकार करें जैसे आप हैं. और ये दुनिया का सबसे कठिन काम है.

शेयर करना सबसे मूल्यवान स्पिरिचुअल अनुभव है. शेयर करना अच्छा है.

ये इम्पेर्फेक्ट है, और इसीलिए ये ग्रो कर रहा है. अगर ये परफेक्ट होता तो ये मर चुका होता. ग्रोथ तभी संभव है जब इम्पेर्फेक्शन हो.

अगर आप बिना प्रेम के काम करते हैं तो आप एक गुलाम की तरह काम कर रहे हैं. जब आप प्रेम के साथ काम करते हैं, तब आप एक राजा की तरह काम करते हैं. आपका काम आपकी ख़ुशी है. आपका काम आपका डांस है.

Mar 22, 2018

डिजिटल देवता



मानवीय सभ्यता के उदय से ही भारत अपनी शिक्षा तथा दर्शन के लिए प्रसिद्ध रहा है. भारतीय संस्कृति ने दुनिया का हमेशा ही मार्गदर्शन किया है.

और आज भी जब शिक्षा और विज्ञान के आधुनिक तरीकों पर बात होती है तो ये ध्यान देने वाला तथ्य है कि बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनीज के सर्वे-सर्वा भी आधारभूत रूप से भारत से ही सम्बन्ध रखते हैं. वो ही विश्व को नए आइडियाज और इनोवेशन देने में बड़ी भूमिकाओं में दिखाई देते हैं. साथ-ही साथ नैतिक और सामाजिक स्वभाव भारतीयों की एक बड़ी आध्यात्मिक धरोहर है. 

ये साइंस-टेक्निक-मोरल मॉडल का संगम ही भारत को आगे ले जाने में पर्याप्त है. बस दिशा और दशा पहचानने की ओर कदमताल करना बाकी रह जाता है. वर्तमान युग में भी नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, दार्शनिक और शिक्षा क्षेत्र के अनुभवी इसी बात का प्रयास कर रहे हैं कि भारत में इस युग की शिक्षा के उचित उद्देश्यों का निर्माण कैसे हो? 

प्राचीन समय में भारतीय शिक्षा के उद्देश्य स्पष्ट हुआ करते थे. फ़िर हम गुलाम हुए. और ऐसे गुलाम हुए कि आजादी के सालों बाद भी शायद ही ऊबर सकें हो. पहले था. सबके लिए अच्छा हो जाये और अब तो आप देखेंगे कि बड़े से बड़े क्वालिफाइड, सम्मानित और प्रतिभावान भी इसी चक्कर में घूम गए हैं कि "मैं और मेरे". सब के लिए समान रूप से सोचने की उनकी शक्ति जैसे किसी ने छीन ली हो. या के उन्होंने मान लिया है कि कुछ नहीं बदलने वाला? 

साहब, आपके बिना क्या और कैसे बदलेगा? यूथ तो आपकी तरफ़ नज़र गडाये उम्मीदों से देख रहा है. उसके सपनों और और आगे की पूरी जिंदगी का तो थोड़ा सोचिये. आप नहीं तो कौन? वो तो हार मान लेगा. फ़िर आप झट से कह देंगे की यूथ में तो संस्कार ही नहीं बचे. साहब, संस्कार देगा कौन? और यूथ संस्कार ले किससे? कोई इनपुट-आउटपुट सीरीज तो बनाइये?

कमाल हो रहा है. ये आज़ादी के बाद का दौर है. विश्वास नहीं होता. 21वीं सदी की सोच है? समझने से परे है. युवा, अनुभवी मार्ग-दर्शकों की तरफ टकटकी लगाये देख रहा है पर वो मार्ग-दर्शक किस दिशा में ध्यान-मग्न हैं, पता ही नहीं चल पा रहा. अनगिनत उम्मीदों, शानदार उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आपको इतना ऊँचा स्थान मिला है. साहब, आप के पास सोच है, साधन है, विज़न है. आपके रहते भी हमारे युवा रट्टू तोता बनेंगे या फिर कुछ नहीं बनेंगे तो क्या होगा?

साहब, कुछ तो सोचिये. सारा भारत डिवाइड होता जा रहा है. और ये कहाँ जा रहा है? और आने वाले 30 सालों में कहाँ जायेगा? आप कह सकते हैं साहब. आप कर सकते हैं साहब. आप हमारी उम्मीदें हैं. सबका सोचिये ना.

आप सबके हाथों में नीति-निर्धारण की लाल किताब है. लिख दीजिये कुछ ऐसा कि सकारात्मक बदलाव के फूल खिल सकें. और सबके बगीचे मुस्कुरा उठें. इंसान हैं सब साहब. जीना तो सभी का बनता है.

शिक्षा के सही माप-दंड बना डालिए. कब करेंगे. आपको पता है? दुनिया रोबोट बना रही है और हमारे युवा अपने टीचर्स को गोलियां मारने लगे हैं. साहब, जिस देश में नारी को देवी तुल्य माना जाता रहा हो, वहां दिन दहाड़े लड़कियों को उठाने का विज्ञान विकसित हो रहा है. ये भारत की कौन सी विरासत का हिस्सा है? क्या इतना गिर जाने के बाद हम दुनिया के आगे गर्व से सीना तान के, आँख से आँख मिला कर बात कर सकते हैं?

साहब, कुछ सोचिये ना? कुछ रीयलिस्टिक करिए ना? सबके लिए करिए ना?
आज़ादी के उन दीवानों को याद करिए जो सिर्फ़ इसीलिए चले गए कि हम सभी खुली हवा में साँसें ले सकें.
आप आगे आइये. फ़िर देखिये. उनकी आत्मा भी आशीर्वाद देगी. युवा भी समझदारी दिखा सकेंगे. पेंशन की टेंशन छोड़िये ना. हम संभालेंगे आपको. पर अभी आप के हाथों में है सब करना. अभी तो भारतीय युवाओं के डिजिटल देवता Facebook और Whatsapp ही बने हुए हैं.

देखिये साहब, कितने अकेले हैं युवा हमारे. कुछ और कर ही नहीं पा रहे वो. कोई उनसे बात करने वाला, उनकी सुनने वाला, उनको सुनाने वाला नहीं है. फ़िर ये क्या करेंगे? पॉजिटिव हो पाएंगे, ऐसा तो मुश्किल ही लगता है. आप ही कर सकते हैं इन्हें पॉजिटिव. अब एडिक्शन पकड़ रहा है इन्हें. और ये कुछ दिनों में मोबाइल में ही 2 बेडरूम सेट ना बना लें? और साहब, ये विज्ञान या इंजीनियरिंग नहीं है.

चलिए. जब आपको समय मिले तो सोचियेगा साहब.
अभी सबको शहीदी दिवस मुबारक हो.

Digital IQ -EQ



आज की दुनिया डिजिटल थिंकिंग के संस्कारों की तरफ जाती दिख रही है.
कोई भी देश हो. वो ज्यादा से ज्यादा ख़ुद को अपग्रेड करने के प्रयास करते नज़र आ रहें हैं. और अधिकतर प्रयास इस तरफ़ हैं कि किस तरह से साइकोलॉजिकल IQ को Digital IQ-EQ में बदला जाये. विकसित देश और विकसित और ताकतवर होने की कोशिशों में जुटे हैं. 

विकासशील देश भी प्रयत्न कर रहें हैं कि डेवलपमेंट की दौड़ में आगे निकले. सब डिजिटल टेक्नोलॉजी के माध्यम से ख़ुद को आत्मनिर्भर और प्रभावशाली बनाने में जुट चुकें हैं. 

आने वाला समय रोबोटिक्स, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और डाटा एनालिसिस का होगा.

देखना प्रासंगिक होगा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस दिशा में कब तक परिपक्वता से आगे बढेगा? अत्याधिक जनसँख्या और बहुमुखी अंतःकरण के चलते अभी ये लोकतंत्र सास-बहु और साजिश, योग्यता के सही मूल्यांकन के विकसित तरीकों के अभाव, उपजी बेरोजगारी और युवाओं की बढ़ी फ़ौज, जात-पात की दीवारों, किसानों से जुड़ी समस्याओं, विवादों के वायरल विडियो, और न समझ आ सकने वाले न जाने कितने ही इश्यूज से अनावश्यक ही जूझ रहा है. ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ़ खोखलापन है. नहीं. बिलकुल नहीं. कमाल की एनर्जी है. कमाल के IQs हैं. देश के लिए समर्पण का ज़ज्बा है. विभिनताओं में विशेषता, एकता और अपनापन है. लालच की मात्रा भी बेहद कम है. एक-दुसरे की मदद के लिए सब तैयार मिलते हैं. बस जरुरी जागरूकता की तरफ़ झुकाव का अभाव है. 

गैर-जरुरी आउट-डेटेड लाइफ ट्रेनिंग मैकेनिज्म की जगह विज़न ओरिएंटेड फ्यूचरिस्टिक माइंड-सेट मॉडल्स अपनाने की जरुरत है. एक-दुसरे को ये समझाने की जरुरत है. और सबसे बड़ी बात ये कि सबसे पहले ये उन्हें समझना होगा जिनके द्वारा ये विज़न आसानी से हर कोई अडॉप्ट कर सके. चूंकि सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो अधिकतर समस्याएं भी रीजनल मल्टीपल बिहेवियर ओरिएंटेड हो सकती हैं. जिन्हें सुलझाना ऐसा है जैसे किसी स्वेटर के रुओं को साफ़ करना. टफ है. लेकिन नामुमकिन नहीं. 

चूंकि रोजगार की जरुरत सबको है और वो रीयलिस्टिक स्किल डेवलपमेंट से ही संभव है तो सही दिशा की तरफ़ चला जाये तो सबसे बड़ा लोकतंत्र दुनिया के लिए मिसाल भी बन सकता है. मगर याद रहे, टेक्नोलॉजी पल-पल बदल रही है. विचारधारा Digitalized होती जा रही है. सही समय पर लिया गया कोई भी निर्णय महान फल दे सकता है. वहीँ दूसरी तरफ़ समझने के बाद भी अगर अवॉयड कर गए तो रही-सही पहचान भी लुप्त होने में देर नहीं लगेगी. 

ज़िम्मेदारी समाज के हर अंग और हर व्यक्ति की है. एक-दूसरे पर चीज़ें थोप कर ज्यादा दिन खुशहाल रहने के खयाली पुलावों से बाहर आकर सोचने का समय है. क्या पता, सबसे बड़ा लोकतंत्र इतिहास की सबसे बड़ी इबारत लिखने में कामयाब हो जाये.

(इस छोटे से आर्टिकल को लिखते हुए मुझे डॉ. शक्ति का चेहरा बार-बार याद आता रहा. देश को उन जैसे प्रेरणा-स्त्रोतों की बहुत आवश्यकता है. छोटे से लेकर बड़े तक - वो किसी को भी, कुछ भी सीखा सकते हैं. थैंक यू डॉ. शक्ति. मुझे बेहद ख़ुशी महसूस होती है. क्योंकि मुझे भी कुछ दिन आपके साथ रहने का मौका मिला और इस दरमियाँ कुछ अलग नज़रिए से लाइफ को सोच पाया.)

Mar 21, 2018

नैनो फ़िल्टर



आज विश्व जल दिवस है.
कैर्लिफोनिया की लारेंस लिवरमोल नेशनल लेबोरेटरी के साइंटिस्ट अलेक्सांदर नोय ने समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने की नयी टेक्नोलॉजी ख़ोज निकाली है. ये है – कार्बन नैनो ट्यूब.

अगर काफ़ी सारी नैनो ट्यूब एक साथ रख दी जाएँ तो समुद्र का पानी फ़िल्टर हो सकेगा और पीने में और आम जीवन की जरूरतों में इस्तेमाल किया जा सकेगा.

नैनो ट्यूब को कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी की मदद से सफल बनाने की योजना पर नोय और उनकी टीम जोर-शोर से जुटी है. अच्छी ख़बर ये है कि साइंटिस्ट एक्जास्केल कंप्यूटिंग यानि 5 करोड़ लैपटॉप की प्रोसेस करने की क्षमता हासिल करने के बेहद करीब हैं. अगर ये मुकाम हासिल हो गया तो खारे पानी को मीठा पानी बनाने की टेक्निक आज के मुकाबले काफी सस्ती हो सकेगी. क्योंकि इसमें कोई एनर्जी खर्च नहीं होगी, केवल नैनो-फ़िल्टर लगाने से पानी मीठा हो जायेगा.

इजरायल ने सूखे और जल-संकट को हरा कर पानी से ख़ुद को भर लिया?
नयी सदी की शुरुआत में लगभग 10 सालों तक इजरायल सूखे की स्थिति और जल-संकट की समस्या से जूझता रहा.

उसके बाद क्या हुआ? आज इजरायल पानी की अधिकता वाला देश बन चुका है. कैसे?
70 सालों की मेहनत से. किसकी मेहनत ? प्लानिंग करने वाले, इंजिनियरस और साइंटिस्टस की मदद से.
वहां अब जल-संरक्षण का बुनियादी ढांचा बेहद मजबूत है. वाटर एक्सपर्ट्स हैं. वाटर-पॉलिसीस बड़ी शानदार हैं. सब विज़न को फॉलो करते हैं. आज जहां पूरा विश्व पानी की कमी पर चिंता और तनाव का सामना कर रहा है, वहीं इजरायल आत्मनिर्भरता से और नए तौर-तरीकों के प्रभावशाली इस्तेमाल से पानी की कमी को कब का हरा चूका है.

क्या करता है इजरायल?
1.      खेतों में ड्रिग-इरिगेशन से सिंचाई : खेतों को जितना जरुरी, उतना बूंद-बूंद पानी देना
2.      कम पानी वाली फ़सल उगाई पर ज्यादा जोर
3.      समुद्र के पानी से नमक को हटा कर पानी को पीने योग्य बनाना
4.      खारे पानी में पनपने वाले बीज विकसित करना
5.      सीवेज के पानी का हायर-लेवल फ़िल्टर प्रोसेस और उसे फसलों में यूज़ करना
6.      बारिश की हर बूंद की सेविंग और उसका मल्टीपल इस्तेमाल
7.      बारिश वाले बादलों में सीडिंग – अधिक बारिश के लिए
8.      घरों-बगीचों में ऐसी लैंड-स्केपिंग को कम करना जिसमें ज्यादा पानी लगता हो
9.      बाथरूम और टॉयलेट के लिए पानी के उपयोगी उपकरणों का यूज़
10.  पानी बचाने के लिए स्कूल लेवल से स्टूडेंट्स को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कोर्सेज
11.  कोई फ्री पानी नहीं. उपयोग के हिसाब से कीमत वसूलना
12.  पानी बचाने की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने पर सरकारी मदद
13.  पानी का वाष्पन घटाने के आईडिया पर एक्सपेरिमेंट करते रहना.



आर्ट ऑफ़ लिविंग




Quote 1: प्रेम कोई भावना नहीं है. यह आपका खुद का अस्तित्व है.

Quote 2: मैं आपसे बताता हूँ आपके भीतर एक परमानंद का फव्वारा है. प्रसन्नता का झरना है. आपके मूल के भीतर सत्य, प्रकाश, प्रेम है. वहां कोई अपराध बोध नहीं है. वहां कोई डर नहीं है. मनोवैज्ञानिकों ने कभी इतनी गहराई में नहीं देखा.

Quote 3: श्रद्धा क्या है? यह समझने में है कि आप हमेशा वो पा ही जाते हैं जिसकी आपको ज़रुरत होती है.

Quote 4: आप खुद आज भगवान का दिया हुआ एक उपहार है इसीलिए इसे “प्रेजेंट” कहते हैं.

Quote 5: मानव विकास के दो चरण हैं. कुछ होने से कुछ ना होना. और कुछ ना होने से सबकुछ होना. यह ज्ञान दुनिया भर में योगदान और देखभाल ला सकता है.

Quote 6: जब आप अपना दुःख बांटते हैं वो कम नहीं होता. जब आप अपनी ख़ुशी बांटने से रह जाते हैं तो वो कम हो जाती है. अपनी समस्याओं को सिर्फ ईश्वर से सांझा करें और किसी से नहीं. अपनी ख़ुशी सबके साथ बांटें.

Quote 7: दूसरों को सुनो. फिर भी मत सुनो. अगर तुम्हारा दिमाग उनकी समस्याओं में उलझ जाएगा. ना सिर्फ वो दुखी होंगे. बल्कि तुम भी दुखी हो जाओगे.

Quote 8: जीवन ऐसा कुछ नहीं है जिसके प्रति बहुत गंभीर रहा जाए. जीवन तुम्हारे हाथों में खेलने के लिए एक गेंद है. गेंद को पकड़े मत रहो.

Quote 9: हमेशा आराम की चाहत में तुम आलसी हो जाते हो. हमेशा पूर्णता की चाहत में तुम क्रोधित हो जाते हो. हमेशा अमीर बनने की चाहत में तुम लालची हो जाते हो.

Quote 10: बुद्धिमान वो है जो औरों की गलती से सीखता है. थोड़ा कम बुद्धिमान वो है जो सिर्फ अपनी गलती से सीखता है. मूर्ख एक ही गलती बार बार दोहराते रहते हैं और उनसे कभी सीख नहीं लेते. अपने अंदर सीखने की चाहत रखे.

Quote 11: एक निर्धन व्यक्ति नया साल वर्ष में एक बार मनाता है. एक धनी व्यक्ति हर दिन. लेकिन जो सबसे समृद्ध होता है वह हर क्षण नव वर्ष मनाता है.

Quote 12: आप अपने कार्य के पीछे की मंशा को देखो. अक्सर तुम उस चीज के लिए नहीं जाते जो तुम्हे सच में चाहिए.

Quote 13: यदि तुम लोगों का भला करते हो तो तुम ये अपनी प्रकृति की वजह से करते हो.

Quote 14: मैं स्वर्ग से कितना दूर? आप अपनी आँखें खोलो और देखो तुम स्वर्ग में हो.

Quote 15: तुम दिव्य हो. तुम मेरा हिस्सा हो. मैं तुम्हारा हिस्सा हूँ.

Quote 16: भगवान के यहाँ से तुम्हे सर्वोच्च आशीर्वाद दिया गया है. इस गृह पृथ्वी का सबसे अनमोल ज्ञान दिया गया है. तुम दिव्य हो. तुम परमात्मा का हिस्सा हो. विश्वास के साथ बढ़ो. यह अहंकार नहीं है. यह पुन: प्रेम है.

Quote 17: तुम्हारा मस्तिष्क भागने की सोच रहा है और उस स्तर पर जाने का प्रयास नहीं कर रहा है. जहाँ भगवान ले जाना चाहते हैं. वो तुम्हे उठाना चाहते हैं.

Quote 18: चाहत या इच्छा तब पैदा होती है जब आप खुश नहीं होते. क्या आपने देखा है? जब आप बहुत खुश होते हैं तब संतोष होता है. संतोष का अर्थ है कोई इच्छा ना होना.

Quote 19: इच्छा हमेशा ‘मैं’ पर लटकती रहती है. जब स्वयं “ मैं ” लुप्त हो रहा हो इच्छा भी समाप्त हो जाती है. गायब हो जाती है.

Quote 20: हर एक चीज के पीछे तुम्हारा अहंकार है. मैं, मैं, मैं, मैं. लेकिन सेवा में कोई "मैं" नहीं है. क्योंकि यह किसी और के लिए करनी होती है.

ख़ुदा की शहनाई



उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ- 'भारत रत्न' से सम्मानित प्रख्यात शहनाई वादक
जन्म- 21 मार्च, 1916, बिहार.
मृत्यु- 21 अगस्त, 2006.
योगदान: शहनाई को विश्व भर में एक विशिष्ट पहचान दिलवाने में.
ख़ास: वर्ष 1947 में देश की आज़ादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर भारत का तिरंगा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई भी वहां आज़ादी की स्वर-लहरी गा रही थी. उसके बाद तो हर साल 15 अगस्त के दिन, प्रधानमंत्री के भाषण के बाद उस्ताद जी का शहनाई वादन एक प्रथा ही बन गयी.
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ विश्व के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक माने जाते थे. मज़हबी शिया होने के बावज़ूद ख़ाँ साहब विद्या की हिन्दू देवी सरस्वती के परम उपासक थे. बिस्मिल्लाह ख़ाँ को उनके चाचा अली बक्श 'विलायतु' ने संगीत की शिक्षा दी, जो बनारस के पवित्र विश्वनाथ मन्दिर में अधिकृत शहनाई वादक थे.

नाम के साथ का दिलचस्प क़िस्सा
उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम के साथ एक दिलचस्प वाकया भी जुड़ा हुआ है. उनका जन्म होने पर उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने उनकी तरफ़ देखते हुए 'बिस्मिल्ला' कहा. इसके बाद उनका नाम 'बिस्मिल्ला' ही रख दिया गया.

कमाल के उस्ताद
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने 'बजरी', 'चैती' और 'झूला' जैसी लोकधुनों में बाजे को अपनी तपस्या और रियाज़ से ख़ूब सँवारा और क्लासिकल मौसिक़ी में शहनाई को बेहद सम्मानजनक स्थान दिलाने में कामयाब रहे. इस बात का भी उल्लेख करना गौरवशाली है कि जिस ज़माने में बालक बिस्मिल्लाह ने शहनाई की तालीम लेना शुरू की थी, तब गाने बजाने के काम को इ़ज़्जत की नज़रों से नहीं देखा जाता था.

विदेशों में शहनाई वादन
यूरोप, अमेरिका, भूतपूर्व सोवियत संघ, जापान, हांगकांग, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ़्रीका, और विश्व भर की लगभग सभी राजधानियों में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने शहनाई का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. उनकी शहनाई की गूँज आज भी लोगों के कानों में गूँजती है.

डॉक्टरेट की मानद उपाधि
'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' और 'शांतिनिकेतन' ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान करके सम्मानित किया.

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ की असली बेगम
बिस्मिल्ला ख़ाँ शहनाई को ही अपनी असली बेगम कहा करते थे और संगीत ही उनके लिए उनका पूरा जीवन था. उस्ताद पर लिखी किताब ‘सुर की बारादरी’ के लेखक यतीन्द्र मिश्र लिखते हैं- "ख़ाँ साहब कहते थे कि संगीत वह चीज है, जिसमें जात-पात कुछ नहीं है. और संगीत किसी मजहब का बुरा नहीं चाहता."

रिकॉर्ड–तोड़ जुगलबंदी
उस्ताद विलायत ख़ाँ के सितार और पण्डित वी. जी. जोग के वायलिन के साथ ख़ाँ साहब की शहनाई जुगलबंदी के एल. पी. रिकॉडर्स ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले. इन्हीं एलबम्स के बाद जुगलबंदियों का दौर चला. संगीत-सुर और नमाज़ इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह ख़ाँ के लिए सारे इनाम-इक़राम, सम्मान बेमानी थे.

फ़िल्मी सफ़र में उस्ताद का जलवा
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने कई फ़िल्मों में भी संगीत दिया. उन्होंने सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘जलसाघर’, कन्नड़ फ़िल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, और हिंदी फ़िल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ के लिए शहनाई की धुनें छेड़ी. आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फ़िल्म ‘स्वदेश’ के गीत ‘ये जो देश है तेरा’ में शहनाई की मधुर तान उनकी बिखेरी आखिरी तान थी.

उस्ताद से भी बढ़ कर थे एक संत
बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब एक ऐसे इंसान और संगीतकार थे कि उनकी प्रशंसा में संगीतकारों के पास भी शब्दों की कमी नज़र आई. पंडित जसराज का मानना है- उनके जैसा महान् संगीतकार न पैदा हुआ है और न कभी होगा. वो हमेशा सबको अच्छी राह दिखाते और बताते थे. वो एक ऐसे फरिश्ते थे जो धरती पर बार-बार जन्म नहीं लेते हैं और जब जन्म लेते हैं तो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते है. बाँसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया का कहना है- बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब भारत की एक महान् विभूति थे. अगर हम किसी संत संगीतकार को जानते है तो वो हैं बिस्मिल्ला खा़न साहब.

सम्मान
सन 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
सन 1961 में पद्म श्री
सन 1968 में पद्म भूषण
सन 1980 में पद्म विभूषण
2001 में भारत का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न

कठिन समय
बिस्मिल्ला ख़ान ने एक संगीतज्ञ के रूप में जो कुछ कमाया था वो या तो अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में या फ़िर लोगों की मदद में ख़र्च हो गया था. एक समय ऐसा भी आया जब वो आर्थिक रूप से मुश्किलों में घिर गए थे. तब सरकार ने आगे आकर उनकी मदद की.

अंतिम इच्छा और उस्ताद का निधन
21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में इनका देहावसान हो गया. उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी. लेकिन अपनी यह इच्छा पूरी होने से पहले ही वो चल बसे. ख़ुदा की इच्छा के आगे किसका बस चलता है.

आज उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान साहब के 102वें जन्मदिवस पर उनको नमन.