Apr 20, 2018

तो मुझे अकेलापन महसूस होने लगता है. मुझे क्या करना चाहिए?




उत्तर: मैं आपको एक बात समझाना चाहता हूं। आप खुद को जितना अकेला समझेंगे, खुद को जितना निराश महसूस करेंगे, उतना ही आपको लोगों के साथ की जरूरत महसूस होगी। लेकिन आप जितना खुश होंगे, आप भीतर से जितना उल्लासित और उत्साहित महसूस करेंगे, आपको लोगों के साथ की जरूरत उतनी ही कम महसूस होगी। इसलिए जब आप खुद के साथ हैं और तब आप अकेलापन महसूस करते हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप एक खराब संगत में हैं। अगर आप एक अच्छे इंसान की संगत में हैं तो आप अकेलापन कैसे महसूस कर सकते हैं? तब तो आपको बहुत अच्छा और विशिष्ट महसूस करना चाहिए। आपके उल्लास को पैदा नहीं किया सकता। अगर यह ओढ़ा हुआ या कृत्रिम रूप से बनाया हुआ उल्लास है तो बेशक आपको लोगों के साथ की जरूरत महसूस हो सकती है। अकसर लोग उल्लास या आनंद का मतलब समझते हैं – संगीत सुनना, नाचना और झूमना। आनंद के लिए ये सब करना बिल्कुल जरूरी नहीं है। आप चुपचाप एक जगह शांति से बैठकर भी पूरी तरह से आनंद और उल्लास को अपने भीतर महसूस कर सकते हैं।

आनंदित होकर काम करें, या फिर आनंद पाने के लिए काम
इस एक अंतर को समझना होगा कि अगर आप अपने स्वभाव से ही आनंदित रहने वाले इंसान हैं, या आपका जीवन आनंदमय हो गया है तो आपका काम बस उसका एक परिणाम भर होता है। लेकिन कई बार आपका जीवन उल्लासपूर्ण नहीं होता, बल्कि आप कुछ गतिविधियों की मदद से इसे उल्लासपूर्ण बनाने की कोशिश कर रहे होते हैं।

असलियत तो यह है कि जब पौधे अपने भीतर ऊर्जा या उल्लास को संभाल नहीं पाते तो वह फूलों के रूप में उसे व्यक्त कर देते हैं। जीवन भी इसी तरह होना चाहिए।
इन दोनों स्थितियों में एक बड़ा फर्क है। एक में आप नृत्य करके आनंद की स्थिति में पहुंचते हैं जबकि दूसरी में आप आनंद से भरे होते हैं और उस आनंद को संभाल न पाने के कारण आप नाचने लगते हैं। ये दोनों चीजें अलग-अलग हैं। या तो आपके भीतर की खुशी से आपकी हंसी फूट पड़ती है या फिर किसी ने आपसे कहा होता है कि अगर हर सुबह उठकर आप हंसेंगे तो एक दिन आपको खुशी मिल जाएगी। ये दो अलग-अलग तरीके हैं। अब आप अपने चारों तरफ नजर दौड़ाइए और देखिए कि जीवन कैसे चलता है।

क्या ऐसा होता है कि फूलों को जब खिलना होता है, तो उन्हें सहारा देने के लिए पौधे और उसकी जड़ें उगती हैं? क्या कभी ऐसा होता है? हां कुछ और हालत में ऐसा होता है, जैसे माइक्रोफोन के साथ ऐसा है। पहले माइक्रोफोन बना, फिर बोलने वाले को तकलीफ नहीं हो, इसलिए स्टैंड बनाया गया जो एक तने जैसा है। क्या ऐसा ही फूलों के साथ भी है कि उनके खिलने के बाद तने उन्हें सहारा देने के लिए निकल आते हैं? असलियत तो यह है कि जब पौधे अपने भीतर ऊर्जा या उल्लास को संभाल नहीं पाते तो वह फूलों के रूप में उसे व्यक्त कर देते हैं। जीवन भी इसी तरह होना चाहिए। अगर आपने दूसरे तरह से जीने की कोशिश की तो जीवन बड़ा मुश्किल हो जाएगा।

बनावटी ख़ुशी से जीवन मुश्किल हो जाएगा
इस दुनिया में सबसे मुश्किल जीवन वह है, जो खुश न होने पर भी लगातार यह दिखाने की कोशिश करता है कि वह बेहद खुश है। इस तरह का दिखावा करने में बहुत बड़ी मात्रा में जीवन ऊर्जा लगती है। क्या आपने कभी इस पर गौर किया है? दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वाकई खुश होने पर तो खुश दिखते हैं, पर जब वो दुखी होते हैं तो दुखी दिखाई देते हैं। ऐसे लोग असलियत में जैसे हैं, वैसे ही दिखाई देते हैं। पूरी दुनिया उनकी इस जीवन-शैली के बारे में जानती है। जबकि कुछ लोग पूरे समय बनावटी हंसी और खुशी बनाए रखते हैं जिसमें उन्हें जबरदस्त उर्जा खर्च करनी पड़ती है। मैं आपको बता दूं कि इससे शरीर के अंदर कई रोग और तकलीफें पैदा हो जाती हैं। इससे आपके शरीर में गांठ और ट्यूमर बन सकता है। आज पूरी दुनिया में ऐसा ही हो रहा है।

आप जिस तरफ  भी जाना चाहते हैं, वह आप तय कर लीजिए। इसका फैसला मैं नहीं कर रहा। लेकिन जहां भी जाना है, उस दिशा में नियमित रूप से लगातार बढ़िए।
अगर आपमें से कोई तैयार हो तो मैं उस पर यह प्रयोग करके भी दिखा सकता हूं। कुछ ही घंटों में, मैं आप ही के द्वारा आपके शरीर में ट्यूमर पैदा करवा सकता हूं। वाकई, मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। अगर आप अपने मन को किसी खास दिशा में ढाल लेते हैं, तो आप यह कर सकते हैं। लेकिन सौभाग्य की बात यह है कि आप कोई भी काम लगातार नहीं करते, जिसकी वजह से आप बच जाते हैं। आप कभी खुश होते हैं, कभी नहीं, इसी तरह से आप कभी दुखी होते हैं तो कभी नहीं। कोई भी भाव लगातार नहीं बना रहता। अगर आप गंभीर रूप से लगातार दुखी रहते हैं तो आप उसके नतीजे देख सकते हैं। इसी तरह से अगर आप लगातार खुश रहते हैं तो उसके नतीजे भी देख सकते हैं। अगर आप हमेशा बुरी तरह से गुस्से में रहते हैं, तो उसका भी एक खास नतीजा होगा। आपको किसी भी चीज के पूरे नतीजे इसलिए नहीं मिलते, क्योंकि आपकी भावनाओं की तीव्रता लगातार घटती बढ़ती रहती है।

बार-बार अपनी दिशा न बदलें
लोग अकसर मुझसे सवाल करते हैं कि सद्‌गुरु हमें किस तरह का रवैया और अपनी भावनाएं रखनी चाहिए। इस पर मेरा जवाब होता है कि ‘हर भाव, हर रवैया अच्छा है।’ अगर आप गुस्सा करना चाहते हैं तो चौबीस घंटे बिना रुके लगातार गुस्सा कीजिए। आपको खुद-ब-खुद आत्मानुभूति हो जाएगी। वाकई मैं मजाक नहीं कर रहा। अगर आपको प्रेम करना पसंद है, तो चौबीसों घंटे प्रेम कीजिए। आपको अनुभूति हो जाएगी। आप जो भी कर रहे हैं, उसे लगातार चौबीस घंटे कीजिए और फिर देखिए आपको एक खास तरह की अनुभूति होगी। चीजें बस ऐसे ही घटित होती हैं।

इस सृष्टि का कण-कण, हर एक कोशिका, हर एक परमाणु,आपके लिए अस्तित्व से परे जाने का द्वार बन सकते हैं, अगर आप लगातार एक दिशा में चलें, एक भाव में रहें। लेकिन दिक्कत यह है कि लोग लगातार अपनी दिशा और दशा बदलते रहते हैं। यह आज के दौर की इतनी बड़ी समस्या है, जितनी पहले नहीं थी। लोग ऐसा कहने में अपनी तारीफ समझते हैं कि ‘मेरी एकाग्रता की अवधि बहुत छोटी है।’ अगर आप अपना फोकस लगातार बदलते रहेंगे तो इससे कुछ होने वाला नहीं। आप जिस तरफ भी जाना चाहते हैं, वह आप तय कर लीजिए। इसका फैसला मैं नहीं कर रहा। लेकिन जहां भी जाना है, उस दिशा में नियमित रूप से लगातार बढ़िए। आप रोज-रोज अपनी दिशा मत बदलिए।

ईशा.सद्गुरु.ओ.आर.जी. से साभार.

Apr 19, 2018

उसके पिता एक होटल में शेफ़ थे.



एक दिन एक छोटी सी लड़की अपने पिता को दुख व्यक्त करते-करते अपने जीवन को कोसते हुए यह बता रही थी कि उसका जीवन बहुत ही मुश्किल दौर से गुज़र रहा है. उसके जीवन में एक दुख का समय जाता है तो दूसरा चला आ रहा है और वह इन मुश्किलों से लड़ लड़ कर अब थक चुकी है. वह करे तो क्या करे?

उसके पिता प्रोफेशन से एक होटल में शेफ़ थे. अपनी बेटी के इन शब्दों को सुनने के बाद वह अपनी बेटी को रसोईघर में ले गए और 3 बर्तनों में पानी डाल कर गैस पर रख दिया. जैसे ही पानी गरम हो कर उबलने लगा, पिता नें पहले बर्तन में एक आलू डाला, दूसरे में एक अंडा और तीसरे में कुछ कॉफ़ी बीन्स डाल दिए.

वह लड़की बिना कोई प्रश्न किये अपने पिता के इस काम को ध्यान से देख रही थी.
कुछ 20-25 मिनट के बाद उन्होंने गैस को बंद कर दिया और फ़िर एक कटोरे में आलू, दूसरे में अंडे और तीसरे कटोरे में कॉफ़ी बीन्स वाले पानी को रख दिया. पिता ने बेटी की तरफ उन तीनों कटोरों को दिखाते हुए गहरी आवाज़ में एक साथ कहा. ये देखो - आलू, अंडे, और कॉफ़ी बीन्स.

पिता ने दोबारा बताते हुए बेटी से कहा. मेरी प्यारी बेटी, तुम इन तीनों चीजों को करीब से देखो.

बेटी ने आलू को देखा जो उबलने के कारण मुलायम हो गया था. फ़िर उसके बाद अंडे को देखा जो उबलने के बाद पत्थर जैसा हो गया था. और जब लड़की ने कॉफ़ी बीन्स को देखा तो उस पानी से बहुत ही अच्छी खुशबु आ रही थी.

पिता ने बेटी से पूछा - क्या तुमको पता चला इन सब का मतलब क्या है?
बेटी ने कहा- नहीं, पापा.

तब उसके पिता ने समझाते हुए कहा कि इन तीनो चीजों यानि आलू, अंडे और कॉफ़ी बीन्स ने अलग अलग व्यवहार दिखाया लेकिन जो मुश्किल उन्होंने झेली, वो तो एक जैसी ही थी.

बेटी को बात समझ आ गयी. उसके बाद पिता ने अपनी बेटी से एक प्रश्न पूछा.
प्रश्न था कि जब कभी कोई विपरीत परिस्थिति तुम्हारे जीवन में आती है या भविष्य में आये तो तुम क्या बनना चाहोगी?  आलू, अंडा या कॉफ़ी बीन्स?
बेटी को अपनी परेशानियों का हल मिलना शुरू हो गया था. उसने जान लिया था कि उसकी नेचर और सोच ही उसकी हालत के लिए ज़िम्मेदार है. परिस्थितियाँ तो सबके लिए ही एक जैसी ही होती हैं.

सार
जीवन में मुसीबतें चाहें कैसी भी हो, पर यह उस आदमी के ऊपर है कि वह उनको कितना झेलने की ताकत रख पाता है. टूटने से बचने का क्या कोई और उपाय है?
सोच बदलिए, मुसीबतें कामयाबी में बदल जायेंगी.

क्या पता उसके दर्द की दास्तां हमारी उम्र से भी बड़ी हो?

एक बार एक 30 साल का लड़का और उसका पिता ट्रेन में सफ़र कर रहे थे. वह लड़का बार-बार ट्रेन की खिड़की से झाँक रहा था और बाहर दिखते हुए पेड़ पौधों और प्रकृति के नजारों को देखकर जोर-जोर से चिल्ला रहा था और ख़ुशी के एहसास से पागल हो रहा था.


पास ही में एक नया-नवेला शादीशुदा जोड़ा बैठा था और उस लड़के को देखकर उन्हें हंसी आये जा रही थी.

तभी उस लड़के के पिता ने अपने बेटे से कहा - देखो बेटा, बाहर आसमान में बादलों को देखो. वो भी हमारे साथ दौड़ लगा रहें हैं. 

यह पागलपन देखकर उस शादीशुदा जोड़े को सहन नहीं हुआ और वह उस लड़के के पिता से बोल बैठे कि आप अपने बेटे को किसी डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते? अगर ये ऐसे ही पागलों की तरह करता रहा तो हमारे हनीमून का सफ़र तो बिलकुल ही बेकार हो जायेगा.

यह सुनकर उस लड़के के पिता ने उत्तर दिया - हम डॉक्टर के पास से ही आ रहे हैं. दरअसल मेरा बेटा जन्म के समय से ही देख नहीं सकता था पर आज हुए उसके आँखों के सफल ऑपरेशन के कारण ही वह ये सब पहली बार देख पा रहा है और वह बहुत खुश है. बस इसलिए मैं उसकी ख़ुशी को पंख देने की कोशिश कर रहा था.

उस शादीशुदा जोड़े के पास अब कुछ कहने हो नहीं बचा था.

सारांश:
इस धरती पर हर किसी आदमी के जीवन की अपनी एक कहानी है. हमें किसी भी व्यक्ति के विषय में पूरी जानकारी न होने पर उसके विषय में कमेंट सिर्फ़ इसलिए नहीं कर देना चाहिये क्योंकि हमें तकलीफ़ महसूस हो रही है. क्या पता उसके दर्द की दास्तां हमारी उम्र से भी बड़ी हो?


Apr 17, 2018

उस रात बाप - बेटे ने काफ़ी देर तक बातें की.

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सुनील किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा. सुनील ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया. अब फाइनल इंटरव्यू कंपनी के डायरेक्टर को लेना था. और डायरेक्टर को ही तय करना था कि सुनील को नौकरी पर रखा जाए या नहीं?


डायरेक्टर ने सुनील का बायोडाटा देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ सुनील Extra-Curricular Activities में भी हमेशा अव्वल रहा.

डायरेक्टर- "क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान कभी scholarship मिली है?"
सुनील - "जी नहीं"
डायरेक्टर- "इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे."
सुनील - "जी हां, सर."
डायरेक्टर- "तुम्हारे पिताजी क्या काम करते हैं?"
सुनील - "जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं."
यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा - "ज़रा अपने हाथ तो दिखाना."
सुनील के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे.
डायरेक्टर- "क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की है?"
सुनील - "नहीं सर, मेरे पिता जी हमेशा यही चाहते थे कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें पढ़ूं. और हां सर, एक बात और.. मेरे पिता जी बड़ी तेजी से कपड़े धोते हैं."
डायरेक्टर- "क्या मैं तुम्हें एक काम करने के लिए कह सकता हूं?"
सुनील - "जी, आदेश कीजिए."
डायरेक्टर- "आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना और फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना."

सुनील यह सुनकर प्रसन्न हो गया. उसे लगा कि अब नौकरी मिलना तो पक्का है. तभी तो डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है.
सुनील ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा.

पिता को थोड़ी हैरानी हुई. फिर भी उसने बेटे की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए. सुनील ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया. साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे. उसके पिता के हाथ रेगमाल पेपर की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे. यहां तक कि जब भी वह कटे के निशानों पर पानी डालता, चुभन का अहसास पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था.
सुनील को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे. पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक कामयाबी का. पिता के हाथ धोने के बाद सुनील को पता ही नहीं चला कि उसने उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले. उसके पिता रोकते ही रह गए, लेकिन सुनील अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया.

उस रात बाप - बेटे ने काफ़ी देर तक बातें की.

अगली सुबह सुनील फिर नौकरी के लिए कंपनी के डायरेक्टर के ऑफिस में था. डायरेक्टर का सामना करते हुए सुनील की आंखें गीली थीं.

डायरेक्टर- "हूं, तो फिर कैसा रहा कल घर पर सुनील? क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे?"
सुनील - " जी हाँ, सर कल मैंने जिंदगी के कुछ वास्तविक अनुभवों को सीखा और महसूस किया.
पहला : मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है? मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतना आगे नहीं आ सकता था.
दूसरा :  पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है?
तीसरा : मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार इतनी शिद्दत के साथ महसूस की.
डायरेक्टर- " सुनील, ये ही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं. मैं यह नौकरी केवल उसे देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे. ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे. ऐसा शख्स जिसने सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो.
मुबारक हो सुनील, तुम इस नौकरी के पूरे हक़दार हो."

सारांश
आप अपने बच्चों को बड़ा घर दें. बढ़िया खाना दें. बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें. लेकिन साथ ही अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि कोई भी काम करते हुए कैसा लगता है? उन्हें भी अपने हाथों से वो काम करने दें. खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें. ऐसा इसलिए नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते, बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही और सच्चा प्यार करते हैं. आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं.

सबसे अहम हैं कि आपके बच्चे किसी काम को करने की कोशिश की कद्र करना सीखें. एक दूसरे का हाथ बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर लाएं.
और यकीन मानिए....कोशिशें कामयाब होती हैं. ईमानदार कोशिशें.