Jun 1, 2018

खटखटाओ और वह दरवाजा खोल देगा.



एक महान सूफी संत हुए हैं जलालुद्दीन रूमी. बहुत ही शानदार इंसान. लेकिन आज की दुनिया में एक अजनबी से हैं क्योंकि आज की दुनिया में सब कुछ एक हिसाब-किताब बन गया है. हर चीज एक बिज़नेस है. यहां तक कि प्यार भी प्रैक्टिकल हो चला है. जहां हर विचार प्रैक्टिकल बातों को सपोर्ट करने लगा हो वहां जज्बातों को बकवास और टाइम की बर्बादी क़रार दे ही दिया जायेगा. अब ऐसी जगह रूमी की क्या बिसात?

लेकिन ये वाकई हैरान कर देने वाला है कि 21वीं सदी में यानि अब रूमी साहब पोपुलर होते जा रहें हैं. आज की दुनिया में, जबकि लोग इतने ज्यादा डिफेंसिव, डिबेटिंग, टेक्निकल और प्रैक्टिकल होते जा रहे हैं, ऐसे में रूमी की लोकप्रियता बढ़ना मतलब दिमाग से दिल का सफ़र शुरू होने का इशारा है. है तो बहुत अच्छा संकेत क्योंकि ये इंसानियत के बेसिक्स की तरफ़ मूवमेंट को बताने लगा है. लेकिन सच से अभी कोसों दूर का सफ़र है. समय लेगा.

आप अपने आस-पास नज़र घूमा कर देखिये जरा. समझदार से समझदार लोग कितने सीरियस हो चले हैं. बिना काम ना वो आपकी तरफ़ देखते हैं, ना झुक सकते हैं, ना ही उनके चेहरे पर हंसी बची है, ना वो मुस्कुरा रहें हैं. लेकिन अब वो सब भी रूमी साहब को पढ़ रहे हैं. उनकी बुक्स, उनका म्यूजिक आदि.

परन्तु एक सच ये भी है कि रूमी को आप पढ़ नहीं सकते. वो महसूस करने का सब्जेक्ट हैं.

रूमी को जानने-समझने के लिए आपको दिमाग को लीव दिलानी होगी. रूमी दिल की स्टडी है. दिल का मामला है. आपको ऐसा डांस करना होगा ख़ुद में डूब कर कि दिमाग आपको देख ना सके. दिमाग फ्री डांस. बस तभी आप उस मस्ती को जी सकेंगे, जिस मस्ती और आनंद से जीने के लिए पधारे थे. अन्यथा अभी भी आप प्रैक्टिकल ही बने हुए हैं. शोर कितना भी मचाले चाहे. 

अभी रूमी को फ़िर कुछ नहीं जाना. उनकी तारीफ करना आसान है, लेकिन उनके रास्ते पर चलना दूसरी बात है. वो सबकी नज़र में सिर्फ़ एक दीवाने माने गए. पूरी तरह बेसुध से एक शानदार इंसान. जो कुछ भी उनके भीतर घटता था, वह बेहद आध्यात्मिक और ओजपूर्ण होता था. ये बात और है कि सामाजिक तौर पर उन्हें फेलियर ही कहा गया.

रूमी एक पीक आदमी हैं. अगर आप पीक नहीं हैं, तो आप लवर नहीं हो सकते. कभी भी नहीं. जो लवर पीक पर नहीं गया, वह वास्तव में लवर है ही नहीं. अगर कोई लव को उसकी फुल स्पीड में अंडरस्टैंड करना चाहता है, तो उसे पीक पर जाना ही होगा. कोई और रास्ता नहीं है प्रेम होने, प्रेम पाने और परम-तत्व को जानने का. 

ख़ुद को पीसफुल और बैलेंस्ड दिखाने वाला आदमी कभी लवर हो ही नहीं सकता. असली लवर वही हो सकता है, जिसके भीतर जोश और जुनून सारी हदों को पार करता हुआ उमड़ रहा हो. बिना जुनून वाला लव हमेशा बोरिंग और ऊबाऊ होता है. ये बस एक गिव एंड टेक है. केवल एक-दूसरे की रिक्वायरमेंट्स और इच्छाओं को पूरा करने की फॉर्मेलिटी का फार्मूला. ये लव नहीं है. अगर कोई अपनी ओरिजिनल नेचर तक पहुंचने के लिए अपनी भावनाओं को इस्तेमाल करना चाहता है, तो वे भावनाएं फास्टेस्ट होनी ही चाहिएं. साधारण प्रैक्टिकल फीलिंग्स आपको कहीं नहीं ले जा सकती.

आइये जाने से पहले रूमी साहब की एक कविता का आनंद लें.
जैसे ही मैंने अपनी पहली प्रेम कहानी सुनी, मैंने तुम्हें ढूंढना शुरू कर दिया,
बिना यह जाने कि वह खोज कितनी अंधी थी.
प्रेमियों का कहीं मिलन नहीं होता, वे तो हमेशा एक-दूसरे के भीतर होते हैं.
आपका काम प्रेम को खोजना नहीं है, 
आपका काम है अपने भीतर के उन तमाम रुकावटों का पता लगाना जो आपने इसके रास्ते में खड़ी कर रखी हैं.
अपनी चतुराई को बेच दो और हैरानी खरीद लो.
सुरक्षा को भूल जाओ, वहां रहो, जहां रहने में आपको डर लगता है,
अपनी प्रतिष्ठा को मिटा दो, बदनाम हो जाओ.
दूसरों के साथ क्या हुआ, इन कहानियों से संतुष्ट मत हो जाओ. अपने भ्रम को खुद ही दूर करो.
मौन ही ईश्वर की भाषा है, बाकी सब तो उसका एक बेकार सा अनुवाद है.
जो भी आए, उसका आभार मानो क्योंकि हर किसी को एक मार्गदर्शक के रूप में भेजा गया है.
अपनी आंखों को शुद्ध करो और इस निर्मल दुनिया को देखो. आपका जीवन कांतिमान हो जाएगा.
आपका जन्म पंखों के साथ हुआ है, फिर जीवन भर रेंगने की क्या जरूरत ?
खटखटाओ और वह दरवाजा खोल देगा, 
मिट जाओ, वह आपको इतना चमकदार बना देगा जैसे सूर्य, 
गिर जाओ, वह आपको स्वर्ग तक उठा देगा, 
तुच्छ हो जाओ, वह आपको सब कुछ बना देगा.
आप समंदर में एक बूंद की तरह नहीं हो, आप तो एक बूंद में पूरे समंदर हो.
पिघलते हुए बर्फ की तरह बनो,
खुद को खुद से ही धोते रहो.

May 29, 2018

दरबान - क्या देखा आपने?


पाण्डवों का अज्ञातवास समाप्त होने में कुछ समय शेष रह गया था। पाँचो पाण्डव एवं द्रोपदी जंगल मे छुपने का स्थान ढूंढ रहे थे। उधर शनिदेव की आकाश मंडल से पाण्डवों पर नजर पड़ी शनिदेव के मन विचार आया कि इन 5 में से बुद्धिमान कौन है? परीक्षा ली जाये। शनिदेव ने एक माया का महल बनाया। कई योजन दूरी में उस महल के चार कोने थे, पूरब, पश्चिम, उतर, दक्षिण।

अचानक भीम की नजर महल पर पड़ी और वो आकर्षित हो गया। भीम, यधिष्ठिर से बोला- भैया मुझे महल देखना है भाई ने कहा जाओ। भीम महल के द्वार पर पहुंचा वहाँ शनिदेव दरबान के रूप में खड़े थे
भीम बोला- मुझे महल देखना है
शनिदेव ने कहा- महल की कुछ शर्त है।
पहली - शर्त : महल में चार कोने हैं आप एक ही कोना देख सकते हैं।
दूसरी - शर्त : महल में जो देखोगे उसकी सार सहित व्याख्या करोगे।
तीसरी -शर्त : अगर व्याख्या नहीं कर सके तो कैद कर लिए जाओगे।
भीम ने कहा- मैं स्वीकार करता हूँ ऐसा ही होगा। और वह महल के पूर्व छोर की ओर गया।
वहां जाकर उसने अद्भूत पशु पक्षी और फूलों एवं फलों से लदे वृक्षों का नजारा देखा।
आगे जाकर देखता है कि तीन कुंए है अगल-बगल में छोटे कुंए और बीच में एक बडा कुआ।
बीच वाला बड़े कुंए में पानी का उफान आता है और दोनों छोटे खाली कुओं को पानी से भर देता है। फिर कुछ देर बाद दोनों छोटे कुओं में उफान आता है तो खाली पड़े बड़े कुंए का पानी आधा रह जाता है इस क्रिया को भीम कई बार देखता है पर समझ नहीं पाता और लौटकर दरबान के पास आता है।

दरबान - क्या देखा आपने?
भीम - महाशय मैंने पेड़ पौधे पशु पक्षी देखा वो मैंने पहले कभी नहीं देखा था जो अजीब थे। एक बात समझ में नहीं आई छोटे कुंए पानी से भर जाते हैं बड़ा क्यों नहीं भर पाता ये समझ में नहीं आया।
दरबान बोला आप शर्त के अनुसार बंदी हो गये हैं और बंदी घर में बैठा दिया।

अर्जुन आया और बोला - मुझे महल देखना है। दरबान ने शर्त बता दी और अर्जुन पश्चिम वाले छोर की तरफ चला गया। आगे जाकर अर्जुन क्या देखता है। एक खेत में दो फसल उग रही थी एक तरफ बाजरे की फसल दूसरी तरफ मक्का की फसल। बाजरे के पौधे से मक्का निकल रही तथा मक्का के पौधे से बाजरी निकल रही। अजीब लगा कुछ समझ नहीं आया वापिस द्वार पर आ गया।

दरबान ने पूछा - क्या देखा?
अर्जुन बोला महाशय सब कुछ देखा पर बाजरा और मक्का की बात समझ में नहीं आई।
शनिदेव ने कहा शर्त के अनुसार आप बंदी हैं।

नकुल आया बोला - मुझे महल देखना है।
फिर वह उत्तर दिशा की और गया। वहाँ उसने देखा कि बहुत सारी सफेद गायें (जब उनको भूख लगती है) तो अपनी छोटी बछियों का दूध पीती है। उसे भी कुछ समझ नहीं आया। वो द्वार पर आया।
शनिदेव ने पूछा - क्या देखा?
नकुल बोला – महाशय, गाय बछियों का दूध पीती हैं। यह समझ नहीं आया। तब उसे भी बंदी बना लिया।

सहदेव आया और बोला कि मुझे भी महल देखना है। और वह दक्षिण दिशा की और गया। अंतिम कोना देखने के लिए क्या देखता है कि वहां पर एक सोने की बड़ी चट्टान एक चांदी के सिक्के पर टिकी हुई डगमग डोले, पर गिरे नहीं छूने पर भी वैसे ही रहती है। उसे कुछ समझ नहीं आया। वह वापिस द्वार पर आ गया और बोला कि सोने की चट्टान की बात समझ में नहीं आई तब वह भी बंदी हो गया।

चारों भाई बहुत देर तक नहीं आये तो युधिष्ठिर को चिंता हुई वह भी द्रोपदी सहित महल में गये।
भाइयों के लिए पूछा तब दरबान ने बताया कि वो चारों तो वो शर्त के अनुसार बंदी है।

युधिष्ठिर बोला - भीम तुमने क्या देखा?
भीम ने कुंऐ के बारे में बताया
तब युधिष्ठिर ने कहा- यह कलियुग में होने वाला है। एक बाप दो बेटों का पेट तो भर देगा परन्तु दो बेटे मिलकर एक बाप का पेट नहीं भर पायेंगे।
भीम को छोड़ दिया गया।

अर्जुन से पुछा - तुमने क्या देखा?
उसने फसल के बारे में बताया।
युधिष्ठिर ने कहा- यह भी कलियुग में होने वाला है।
वंश परिवर्तन अर्थात एक जाति के घर दूसरे जाति की लड़की ब्याही जायेंगी
अर्जुन भी छूट गया।

नकुल से पूछा - तुमने क्या देखा तब उसने गाय का वृतान्त बताया।
तब युधिष्ठिर ने कहा - कलियुग में माताऐं अपनी बेटियों के घर में पलेंगी। बेटी का दाना खायेंगी और बेटे सेवा नहीं करेंगे
तब नकुल भी छूट गया।

सहदेव से पूछा - तुमने क्या देखा, उसने सोने की चट्टान का वृतांत बताया।
तब युधिष्ठिर बोले- कलियुग में पाप धर्म को दबाता रहेगा। परन्तु धर्म फिर भी जिंदा रहेगा खत्म नहीं होगा

आज के कलयुग में यह सारी बातें सच साबित हो रही है।
युधिष्ठर को पूर्ण आभास था कि कलयुग में क्या होगा? इसीलिए उनको बहुत बुद्धिमान और विचारशील माना जाता है।

सार: बहुत चीज़ें इंसान के हाथ में नहीं होती। पर मानता और जानता वो ही है जो निष्पक्ष भाव से विचार कर सके। और कुछ तो ऐसा ज़रूर है जो पहले ही रचा जा चुका होगा इसीलिए निराश कभी ना होइये. समय आने पर सब ठीक हो ही जाता है

(पुरानी कहानियों से साभार)

May 27, 2018

शारदा का एक छोटा सा टेस्ट



एक गांव में एक बूढी औरत रहा करती थी. उसका नाम शारदा था. उसका अपना कोई नहीं था. अपना गुजारा करने के लिए वो दिन-रात गोबर के उपले बनाती और उनको गांव में बेच आती. इससे उसकी दो रोटी का जुगाड़ हो जाया करता. शारदा भगवान कृष्ण को बहुत मानती थी और उठते-बैठते उनका नाम जपा करती. अब जैसा कि हर जगह देखा ही जाता है कि आलोचना और बुराई करने वाले लोग किसी को नहीं छोड़ते. उस गांव में भी कुछ ऐसे ही मास्टरपीस थे जो शारदा की भक्ति का मज़ाक उड़ाते और उसको तंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

और एक दिन शाम ढ़लते ही उन लोगों ने शारदा के बनाये सारे उपले चुरा लिए और बात करने लगे कि अब देखते हैं कि जिस कृष्ण का ये नाम लिए फिरती है, वो इसकी हेल्प कैसे करते हैं? अगली सुबह जब शारदा की नींद खुली तो उसने पाया कि उसके बनाये सारे उपले कोई चुरा कर ले गया.

शारदा मन ही मन हंसती है और अपने कान्हा से कहती है,“पहले तू माखन चुराता था और मटकी फोड़ गोपियों को सताता था. और अब इस बुढ़िया के उपले छुपा मुझे सताता है. ठीक है, जैसी तेरी इच्छा”. यह कह शारदा अगले दिन के लिए उपले बनाना शुरू कर देती है. दोपहर होने लगती है. उसे जोरों से भूख लगी है लेकिन घर में खाने को कुछ भी नहीं है. दो गुड़ के टुकड़े रखे हैं बस. शारदा गुड़ का एक टुकड़ा मुहं में डाल कर, पानी के कुछ घूंट पी कर आराम करने लगती है.

अब क्या होता है?
भगवान तो भगवान हैं. भक्त के आगे नतमस्तक. शारदा को कष्ट में होता देख कर वो बैचन हो जाते हैं. लेकिन पहले शारदा का एक छोटा सा टेस्ट लेते हैं. वो साधु का वेश धारण कर उसके घर पहुँच जाते हैं और कुछ खाने को मांगने लगते हैं. बूढी शारदा अपने घर आए एक साधु को देख आनंदित होती है, पर घर में कुछ खाने को नहीं है - यह सोचकर दुखी भी हो जाती है. वो गुड़ का बचा वो अंतिम  टुकड़ा साधु को शीतल जल के साथ खाने को दे देती है. साधु महाराज शारदा के त्याग को देख ख़ुश हो जातें है और उसे सहायता का आश्वासन दे चले जाते हैं. 

साधु सीधे गांव के सरपंच के यहां पहुचते हैं और सरपंच से कहते हैं, “सुना है इस गांव में रहने वाली बूढी शारदा नामक औरत के उपले किसी ने चुरा लिए हैं. सरपंच जी, मेरे पास एक सिद्धि है. यदि गांव के सभी लोग अपने-अपने उपले ले आयें तो मैं अपनी सिद्धि के दम पर शारदा के सारे उपले अलग कर दूंगा”. सरपंच भी एक भला आदमी मालूम होता है और उसे भी शारदा के उपले चोरी होने का दुख है. इसलिए वो साधु रूपी कृष्ण की बात तुरंत मान कर गांव भर में मुनादी करवा देता है कि सब अपने घर के उपले तुरंत गांव की चौपाल पर लाकर रख दें.

जिन शातिर लोगों ने शारदा के उपले चोरी किये थे, वो भी अपने उपलों को शारदा के उपलों में मिला कर उपलों के बाकी ढेर में मिक्स कर देते हैं. उनको ये पूरा यकीन है कि सब उपले तो एक ही जैसे होते हैं अतः साधु महाराज इतने उपलों में से शारदा के उपले पहचान ही नहीं सकते.
यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि दुष्टों और ग़लत करने वाले लोगों को भगवान की लीला और शक्ति दोनों पर ही कभी विश्वास नहीं होता.

आगे क्या होता है?
साधु वेश में पधारे भगवान श्री कृष्ण सब उपलों को कान लगाकर सुनते हैं और पल भर में ही शारदा के उपले अलग निकाल देते हैं. शारदा अपने उपलों को तुरंत पहचान जाती है और ख़ुशी से अपने उपले उठा, साधु को प्रणाम कर अपने घर लौट जाती है.

जिन लोगों ने शारदा के उपले चुराए थे, उन्हें यह समझ में नहीं आता कि साधु ने कान लगाकर उन उपलों को कैसे पहचाना? अतः जब साधु गांव से कुछ दूर निकल जाते हैं तो आए तो वो लोग साधु से इसका कारण जानने पहुंच जाते हैं. 
फ़िर साधु उनको बड़े प्यार से समझाते है कि “शारदा हमेशा कृष्ण का नाम जपा करती थी और उसके भाव इतने पवित्र थे कि नाम जप उसके बनाये उपलों में भी चला जाता था. कान लगाकर मैंने बस यह सुना कि किन उपलों में से कृष्ण का नाम निकलता है और जिन उपलों में से कृष्ण का नाम निकल रहा था, मैंने उन्हे अलग कर दिया”. अब वो सभी लोग बिना कोई सवाल किये गांव वापिस चले जाते हैं.

सार: 
इस कहानी में साधु इम्पोर्टेन्ट नहीं है, भगवान की स्तुति इम्पोर्टेन्ट हैं. वैसे भी आजकल ओरिजिनल साधु मिलना बहुत ही टफ है. इसलिए इनके चक्करों में ना पड़ें. 

लेकिन हां, भगवान को सच्चे मन से ज़रूर याद करें. यकीं मानिये, इससे हम सभी पर ईश्वर कि महान कृपा होती है और मुसीबतों, गलत लोगों और बेवजह की कठिनाइयों से हमारा बचाव बहुत ही आसानी से हो सकता है. आप भी इसका टेस्ट करके देखिये. ये वास्तव में काम करता है और किताबी ज्ञान से थोड़ा हटकर जीने का विषय है.

आपका दिन शुभ हो.
(शारदा नाम काल्पनिक है)