Aug 7, 2018

टेबल नंबर 2



जाने-अनजाने आपको कभी-कभी ऑटोमेटिकली कुछ ऐसी टिप्स मिल जाती हैं जो जीवन के सफ़र को और गहरा और फोकस्ड बना डालती हैं और ऐसी टिप्स फ्री में नसीब हों तो फिर क्या कहने.... तब ये सब एक लाटरी निकलने जैसा फील होता है और लम्बी उम्र तक इसका असर बरकरार रह जाता है. 

ये छोटी सी कहानी आज उसके नाम. एक दोस्त की एक कहानी...उसकी जुबानी.

कई दिनों की मेहनत के बाद कभी कभी विद फैमिली घर से बाहर जाने का मौका मिले तो क्या कहने...हमारे साथ भी पिछले दिनों कुछ ऐसा ही हुआ. हम शहर के एक पोपुलर होटल गुलफ़ाम में शाम के खाने के लिए टेबल नंबर 2 पर बैठे थे. टेबल नंबर 1 पर एक छोटी फैमिली अपने लम्हों के साथ सफर पर थी. और अब उन्हें जोरों की भूख लगी थी.
उस फैमिली के हेड यानि बच्चों के डैड खाने का आर्डर करने वाले थे. वो बाकि सभी मेंबर्स से उनकी चॉइस पूछ रहे थे.
बेटी बोली- डैड, प्लीज बर्गर फोर मी.
वाइफ – डोसा फोर मी.
डैड ने कहा ओके एंड मैं तो चोवमिन लूंगा.
बेटा कन्फ्यूज्ड था. उसकी 2 चॉइस उसे कंफ्यूज कर रही थी. क्या खाऊ? डोसा या बर्गर?
डैड – बेटे, जल्दी फाइनल करो. बस तुम्हारा चॉइस करना बाकी है. तुम जो भी मांगोगे, वो मिलेगा लेकिन किसी और की प्लेट पर लार मत टपकाना.
उधर हमारा आर्डर आ चुका था लेकिन उस फैमिली का ट्रायल पीरियड अभी चल रहा था.
उनका बेटा कंफ्यूज था.
उसकी मम्मी ने कहा – ऐसा करो हम मंगा लेते हैं. तुम सबमें से थोड़ा-थोड़ा खा लेना.
डैड ने कहा – इतना क्या सोच रहे हो? अपनी पसंद की कोई एक चीज़ मंगा लो और एन्जॉय करो.
मैं उन्हें देख कर हैरान हो रहा था. सोच रहा था की उसके डैड उसे उसकी पसंद को दोनों चीज़ क्यों नहीं दिलवा रहे?
लेकिन उसके डैड अपने बेटे को पक्का करना चाह रहे थे कि वो कोई एक चॉइस फाइनल करे. इन लास्ट, बेटे ने डोसा फाइनल कर दिया. अब जाकर उनका आर्डर बुक हो सका.

उधर हमने अपना खाना निपटा लिया था. हम फ्री होकर टेबल छोड़ने ही लगे थे कि चलते-चलते मैंने अपना परिचय उस लड़के के डैड को दिया और हैरान होते हुए कहा – सर, मेरे मन में एक सवाल है. क्या मैं पूछ सकता हूं?
उन्होंने कहा – बिलकुल.
मैंने कहा – आपका बेटा अपनी चॉइस फाइनल नहीं कर पा रहा था. वो कन्फ्यूज्ड था. फ़िर भी आपने ना कोई जल्दी दिखाई और ना ही आप उस पर गुस्सा हुए? और तो और आपने ये भी नहीं कहा कि तुम दोनों चीज़ें ले लो? मैं होता तो दोनों चीज़ें दिलवा देता ताकि वो ख़ुश महसूस कर सके और हम भी शांति से कुछ खा लें. आप प्लीज मुझे अपना लॉजिक बता सकेंगे?

उन्होंने रिप्लाई किया – सर, ये अभी छोटा बच्चा है. और कच्ची मिट्टी के जैसा है. अभी इसे समय रहते फ़ैसले लेना सीख लेना चाहिए. दोनों चीज़ें दिलाना बड़ी बात नहीं थी. लेकिन इसे धीरे-धीरे ये पक्का करना ज़रूरी है कि मन तो हमेशा अलग-अलग चीज़ों के लिए भटकेगा पर उसे कहीं ना कहीं तो रोकना ही होगा क्योंकि जिंदगी में डबल माइंड होने से प्रॉब्लम कभी सोल्व नहीं हो सकती.
बड़ी बात ये है कि इससे मेरा बेटा जहां अपनी कई सारी चॉइस (इच्छाओं) में सही और गलत इच्छा को पहचानना सीख पायेगा वहीँ अपनी फाइनल की गयी चॉइस को सेलेक्ट कर पेशेंस रखने में भी कामयाब रहेगा वरना बड़ा होते होते इसके विचारों में हमेशा सिर्फ़ अपने फ़ायदे की बात होगी और ये दूसरों की चॉइस का रेस्पेक्ट करना भी नहीं सीख सकेगा.
और फाइनली मैं इसे समझाना चाहता हूं कि हमें हमेशा एक ही चीज़ पर फोकस करने की कोशिश करते रहना चाहिए ताकि हम अपनी मंजिल को पाने में अफ़सोस के दर्द से ना गुजरें. बस सर, ये ही वजह थी कि मैंने आर्डर करने में इतना समय लिया.

लास्ट में उन्होंने मुझ से हाथ मिलाया और कहा – सर, सच बात तो ये है कि अपनी पसंदीदा हर चीज़ ना तो किसी को मिलती है और ना ही मिलेगी. ये बात हम जितनी जल्दी समझ लें तो ही बेहतर.

मैं उन शख्स से मिलकर मानो अपने बचपन की सैर करता हुआ घर पंहुचा और सबको सुला कर ख़ुद के साथ पूरा सोया.

 (दिए गए नाम काल्पनिक हैं)