Jan 10, 2019

एक मशीन, एक रिमोट की तरह




कभी कभी कहानियों में भी छिपे होते हैं प्रैक्टिकल लॉजिक.

कहानी सहित पात्र सभी काल्पनिक ही हैं. लेकिन व्यथा सार्वजनिक है। प्रैक्टिकल है। यथार्थ को प्रकट करती नज़र आती है। और जो प्रकट कर दे, वो ही है जिंदगी का असली मैजिक।

प्रिय दोस्त गिरीश को थैंक यू. उनकी मदद से ये कहानी मिली। दिशा देने वाला संदेश लगा तो आपके समक्ष प्रस्तुत है। बस ये ही प्रस्तुति का उद्देश्य है कि किसी का अच्छा हो सके।

आइए इस यात्रा पर चलें...

एक पिता अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता था। बेटा इतना मेधावी नहीं था कि डॉक्टरी के लिए ज़रूरी Exam क्लियर कर लेता। इसलिए किसी तरीके से डॉक्टरी की एक सीट का अरेंजमेंट किया गया। ज़मीनजायदाद, ज़ेवर सब गिरवी रख के लाखों रूपये खर्च लेकिन अफसोस वहाँ धोखा हो गया।

अब क्या करें...?
लड़के को तो डॉक्टर बनाना है। कैसे भी...!!

फिर किसी तरह विदेश में लड़के का एडमीशन कराया गया, वहाँ भी बदकिस्मती से लड़का चल नहीं पाया। फेल होने लगा और डिप्रेशन में रहने लगा।

रक्षाबंधन पर घर आया और घर में ही फांसी लगा ली।
सारे अरमान धराशायी हो गए. रेत के महल की तरह ढह गए।

कुछ दिनों बाद माँ-बाप और बहन ने भी कीटनाशक खा कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने बेटे को डॉक्टर बनाने की झूठी महत्वाकांक्षा ने पूरे परिवार को लील लिया।

ये ही आधुनिक जीवन काल का सबसे बड़ा और विकट प्रश्न है।

पेरेंट्स अपने सपने, अपनी महत्वाकांक्षा अपने बच्चों के माध्यम से पूरी करना चाहते हैं। सोच ख़राब नहीं है। पेरेंट्स से अधिक बेहतर बच्चों को भला और कौन समझ सकता है? लेकिन हर बच्चा अलग है, समय अलग है, मांग अलग है, स्वभाव अलग है। पेरेंट्स अगर थोड़ा और जागरूकता से इस फैक्ट को भी अपनी चॉइस में शामिल कर लें तो नतीजे बेहद खुशनुमा भी हो सकते हैं। है के नहीं?

आगे चलते हैं।
आधुनिक शिक्षा भी बच्चे का Evaluation और Grading ऐसे करने को उतावली दिखती है जैसे किसी बाग़ में सिर्फ़ सेब की ही खेती चल रही हो. फ़िर चाहे वो बीज अंगूर या संतरे का ही क्यों ना हो, लेकिन कॉमन प्लेटफ़ॉर्म के चलते उस बीज को भी सेब की तरह ही जीना पड़ेगा?
आप देखिए। नज़रें घुमाइए। क्या हर तरफ़ ऐसा ही नहीं हो रहा?

अनगिनत बच्चों को एक ही Syllabus पढ़ाया जा रहा है। उनके स्वाभाविक विकास के मापदंडो, नैतिक मूल्यों को सब्जेक्ट्स की टोकरी में कहीं पैक करके अलग-थलग रख दिया हो, ऐसा मालूम होता है।

एक सिंपल से उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं।
कल्पना कीजिए कि एक जंगल में सभी तरह के पशुओं को इकठ्ठा कर सबका Exam लिया जा रहा है और पेड़ पर चढ़ने की उनकी क्षमता देख कर Rank निकाली जा रही है।
अब शिक्षा व्यवस्था की सादगी देखिये कि प्रश्नपत्र में बेचारा हाथी का बच्चा फेल हो रहा है और बन्दर आराम से First आ रहा है।
अब पूरे जंगल में ये बात आग की तरह फैल गयी है कि कामयाब वो ही है जो झट से पेड़ पर चढ़ जाए। बाकी सबका जीवन व्यर्थ है।
इसलिए उन सब जानवरों के, जिनके बच्चे कूद के झटपट पेड़ पर न चढ़ पाए, उनके लिए कोचिंग क्लासेस चलनी स्टार्ट हो गयी है। वहां पर बच्चों को पेड़ पर चढ़ना सिखाया जाता है।

जंगल के सभी पेरेंट्स जैसे हाथी, जिराफ, शेर, सांड़, भैंसे और समंदर की सब मछलियाँ तक चल पड़ीं हैं अपने बच्चों के साथ, Coaching की ओर।
हमारा वंश भी पेड़ पर चढ़ेगा और हमारा नाम रोशन करेगा।
हाथी के घर पुत्र-रत्न हुआ तो उसने उसे गोद में लेकर घोषणा की - "आज से हमारी लाइफ़ का एक ही मक़सद है कि हमारा बेटा पेड़ पर ही चढ़ेगा।"
और जब किसी वजह से वो बेटा पेड़ पर नहीं चढ़ पाया, तो हाथी ने सपरिवार ख़ुदकुशी कर ली। और सब कुछ समाप्त।

हाथी वाली गलती किसी और को करने की क्या जरुरत है? अपने बच्चे को पहचानिए। वो क्या है, ये जानिए।
हाथी है, शेर है, चीता है, जिराफ है, ऊँट है, मछली है, हंस है, कबूतर है, मोर है या के कोयल?
क्या पता वो चींटी ही हो?
और यदि चींटी भी है तो भी हताश-निराश बिलकुल भी ना हों। चींटी इस धरती का सबसे मेहनती जीव है और अपने खुद के वज़न की तुलना में एक हज़ार गुना ज्यादा वजन उठा सकती है।

शोध बताते हैं कि कई पेरेंट्स अपने बच्चों को Topper बनाने के लिए, औरों के मुकाबले स्मार्ट बनाने में इतना ज्यादा प्रेशर डाल रहें है कि बच्चे का स्वाभाविक विकास ही रुकने को है। वो अब एक मशीन, एक रिमोट की तरह चल रहा है। उसे कोई मतलब नहीं है कि वो कुछ महसूस कर सके। उसकी सेंस्टिविटी को डीएक्टिवेट कर दिया गया है और सालों बाद ये ही पेरेंट्स कहेंगे कि ये किसी की सुनता ही नहीं? अरे, सुनेगा कैसे? इसके कान, नाक और दिमाग तो सालों पहले ही लॉक्ड कर दिए थे आपने। अब वैसी उम्मीद क्यों? आपको कामयाब बच्चा चाहिए था, मिल गया। अपनापन क्यों तलाश रहे हैं? वो अब कैसे मिल सकता है? एक मशीन इमोशनल कैसे हो सकेगी? आपको पता होना चाहिए कि मशीन को भावुकता, नैतिकता और समझदारी का मीनिंग नहीं पता होता। वो इनपुट – प्रोसेस – आउटपुट मॉडल पर काम करती है। आपका बच्चा अब एक कामयाब मशीन है।

सार ये है कि अपने बच्चों की क्षमता को परखें और जीवन में उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें ना कि भेड़चाल चलाते हुए उसे हतोत्साहित करें. याद रखिए कि आपके बच्चे एक अच्छा जीवन जीने आये हैं, केवल किसी पेड़ पर चढ़ने नहीं आए।
क्योंकि किसी को शहनाई बजाने पर भी भारत रत्न से नवाज़ा गया है और गाना गाने पर भी. पेड़ अंतिम लक्ष्य नहीं है। आकाश बहुत बड़ा है। आपके बच्चों के सपने जैसा बड़ा।


No comments: