Apr 17, 2019

9 से 5 तक नौकर और 5 से 9 तक राजा.







नार्मल स्टडी पूरी करने के बाद
लगभग 20 – 25 साल की उम्र के बीच
आप नौकरी करना या दूसरों से सीखना स्टार्ट कर देते हैं.


ऱोज
आप 9 से 5 तक नौकरी करते हैं
और 5 से 9 तक राजा होते हैं
और छुट्टी वाले दिन पूरे 24 घंटे राजा
या पूरे 24 घंटे नौकर.


ये 1 दिन की फ़िल्म में
2 एक्टर का रोल प्ले करने जैसा है.
और दोनों ही रोल मायने रखते हैं.


इससे हमें लगभग ऱोज ही अपनी काबिलियत को तलाशने और तराशने
के मौके मिलते हैं
और 
हैसियत का एहसास भी ऱोज – ऱोज मुफ़्त में मिल जाता है.
नौकरी टाइम में राजा वाली फीलिंग लेना 
कष्टकारी हो सकता है.
ये सेल्फ़-अपडेट है.


यहाँ सबकुछ आधा-आधा ही मिलता है.
सुख आधा, दुःख भी आधा, 
ज़िम्मेदारी भी आधी ही.
क्योंकि आप किसी और की स्टेज पर अपनी परफॉरमेंस देते हैं,
ये किसी किराये के घर में रहने जैसा है
वो भी आधे दिन ही,
फ़िर चाहे वो प्राइवेट हो सरकारी.


ये रिलैक्स करता है और चिंतित भी
आपके हाथ में सिर्फ़ काम करके देना है.

आपका जैसा भी काम हो, वो बोलता है
और काफ़ी हद तक आपके बॉस के स्वभाव पर भी निर्भर करता है.

आपके आस-पास भी कई महान लोग होते हैं 
और
उनका रोल आपके किरदार को उठा भी सकता है 
और गिरा भी.


ऐसे में
आपके किरदार निभाने के ढंग से आपके सफ़र का अंदाजा लगाना रोचक होता है.
आप मुस्कुरा भी सकते हैं या अपना सर पिटते हुए भी ऱोज घर जा सकते हैं.


नौकर से राजा बनने का सफ़र हल्का है
लेकिन
राजा से नौकर बनने का सफ़र बेहद भारी.
आपके एडजस्ट करने के तरीके का यहाँ बहुत महत्व है.
दुनिया आपको नहीं चाह सकती, वो एडजस्टमेंट पसंद करती है.




जो 24 घंटे केवल राजा या केवल नौकर रहना पसंद करते हैं,
वो बिज़नेस में उतर जाते हैं
अब जो भी है, उनकी ज़िम्मेदारी है.
50 – 50 जैसा कुछ नहीं रहता.


ख़ुशी भी 100% तो दुःख भी उतना ही.
ये रिस्की भी है तो सम्मान दिलाने वाला भी.


इसमें शुरुआत ख़ुद करनी होती है
आप चल गए तो लोग तालियाँ पीटेंगे
और
गर पिट गए
तो आपकी तरफ देखते हुए उनकी आँखों में सूजन सी आ जाएगी.




जो 24 घंटे कोई भी भूमिका निभाना नहीं चाहते,
वो किसी सामाजिक विषय को चुन लेते हैं
और 
पूरी जिंदगी अलग-अलग वैरायटी आजमाते रहते हैं.
ये लोगों से मेलजोल में बेजोड़ होते हैं
और अपने दायरों से अपना एहसास कराना पसंद करते है.



तरह-तरह के इन्हीं मस्त किरदारों के साथ
ये पूरी साइकिल 55 – 65 साल तक चलती है
फ़िर आपको वापसी की तैयारी करनी होती है.
चाहे आपने कोई भी आप्शन चुना हो.


इसलिए
आप चाहें कैसे भी चलें
12-12 घंटे के हिसाब से
या 24 घंटे के तरीके से
या बिना समय के.


चाहे नाचते – गाते, मुस्कुराते 
या चीखते-चिल्लाते
या फ़िर 
अकेले या भीड़ में
अच्छे – बुरे, 
अमीर होकर या गरीब
नौकर बनकर, 
राजा बनकर 
या
कुछ भी और
जो आपको पसंद आए.


लेकिन
आपको अपनी यात्रा से
संतुष्ट होना बहुत ज़रूरी है
क्यों?


ताकि इस जीवन में
आपकी अंतिम साँस के बाद
जो आपका अगला सफ़र शुरू हो
वो तो कम से कम
गिले-शिकवों से आज़ाद रहे.

जाते-जाते ही सही
आपका इतना करना बनता भी है.

बिना कपड़ों के आने से लेकर
बिना कपड़ो के जाने तक
आपका
इतना तो बनता है कि
आप ख़ुश होकर जाएं.

है के नहीं?



06.58 AM

17 अप्रैल 2019

इमेज सोर्स: गूगल








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