Apr 16, 2019

नौकरी जीने के लिए है मगर करियर जीवन के लिए है.







क़स्बा गोविंदपुरा
खेत-खेलिहानों से भरपूर
एक जवान लड़का रमेश
जमींदारों के खेतों में करता काम
वहां से मिले अनाज से चलता परिवार का गुजारा
परिवार बड़ा और आमदनी के नाम पर जीरो
और ऐसे ही समय में आदमी हो जाता है निराश
रमेश की एक परेशानी सुलझती तो दूसरी आ खड़ी होती
वो परेशान, हताश, उदास
करे तो करे क्या?
मंदिर जाकर भी कोई हल नहीं निकलता था.


बाकी सब उसको सुखी नज़र आते
बस अपनी झोली खाली – खाली.
उसने आस-पास बात की
उसे खूब दिलासे मिले
पर मन को शांति नहीं हुई.


एक रोज खेतों से छुट्टी के बाद
वो वहां के स्कूल के पुराने रिटायर्ड मास्टर सुरेश से मिला
और उन्हें सारी समस्या बताई.
वो बोले आओ मेरे साथ
समाधान है मेरे पास
रमेश को बंधी आस.


दोनों पहुंचे नदी किनारे
सुरेश ने कहा
पहले करेंगे नदी पार
वहां करेंगे बातें चार
पर वो किनारे पर ही खड़े रहे
कई देर बाद रमेश का टूट गया सब्र
बोला कि किनारे पर खड़े-खड़े कैसे होगी नदी पार
सुरेश ने कहा- धैर्य रखो, पानी सूखे नदी का तो आगे बढ़ें.


रमेश का दिमाग हिला
वो बोला मास्टर जी
मेरे कुछ भी समझ ना आये
पानी सूखेगा नहीं तो फ़िर
बिना तैरे नदी पार कैसे की जाए?


मास्टर जी मुस्कुराए
भाई, ये ही समझाने तुझे यहाँ तक लाये
नदी है जीवन और पानी है परेशानी
पानी सूखे ना और नदी तो पार करके ही जानी.


तुम करो प्रयास
ना रहो उदास
तभी सुलझेंगी समस्या तुम्हारी
किनारे बैठे सोचते रहना मतलब
फ़िर वहीँ पुरानी बीमारी.


रमेश को अब कुछ समझ में आया
उसने ख़ुद को हल्का पाया
लडूंगा ख़ुद मैं
लड़ना होगा
परेशानी से भिड़ना होगा
तभी ये होगी नौका पार
हो सकेगा कोई चमत्कार.


(सभी नाम काल्पनिक हैं. कविता का उद्देश्य सही दिशा में सोचने की और ले जाने की कोशिश मात्र है.)


आधुनिक काल में : 

आप नौकरी करने के लिए मजबूर हैं, 

मगर अपने करियर के लिए लड़ सकते हैं. 

नौकरी करनी पड़ती है, करियर बनाना होता है.

नौकरी पूरी हो जाती है, करियर हासिल होता है

और 

नौकरी जीने के लिए है मगर करियर जीवन के लिए है.


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