Apr 18, 2019

आप हम से सीखिए. हम प्रैक्टिकल लोग हैं.




छात्र जीवन में
हम कम्युनिस्ट होते हैं,
नौकरी मिलते ही समाजवादी
और नौकरी पक्की होते ही अर्थशास्त्री.
इससे ऊपर हम नहीं जाते.
बस सीधे ऊपर जाते हैं.



भारत एक गज़ब देश है.
विदेश की हर चीज़ उसे पसंद ही आए,
ज़रूरी नहीं.

विदेशों में कहा जाता है
कि
जब आप मुस्कुराते हैं तो आपकी
आधी मुस्कान दूसरों के चेहरे पर आ जाती है.


यहाँ ऐसा नहीं है.
आप मुस्कुरा कर देखिए.
सामने वाला ज्यादा सीरियस हो उठेगा.
हो सकता है कि वो चिढ़ जाए
उसकी त्योरियां भी चढ़ सकती है.


आप इसे ऐसे समझने की कोशिश करें
चूँकि  
हमारा देश एक महान डाइवर्सिफाइड कंट्री है.
यहाँ वो भी संभव है, जो कहीं देखने को नहीं मिलता.
हम किसी की नहीं सुनते साहब.
बस हम सहीं हैं.


यहाँ थ्योरी और प्रैक्टिकल के अलग अलग मायने है.
आप नज़र घूमा कर देखिए.


जब पढ़ाई का समय हो तो बच्चों का मन कुछ और करने का करता है.
जब खेलने का समय हो तो हम उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं.
जब करियर बनाने का समय हो तो 
पड़ोसी या अपना कोई परिचित सलाहकार हो जाता है.
जिसका करियर है, 
उससे चॉइस मांगने से इज्ज़त घटती है.


यहाँ कमाल की फिलोसोफी चलती हैं.
अधिकांश युवा धार्मिक स्थलों पर ईश्वर के अलावा कुछ और ही तलाश रहे होते हैं.



जिसका पेट पहले से ही भरा है,
उसे और खिलाया जाता है.
जिसका पेट ख़ाली है,
उसे धिक्कार की नज़र से देख पाने में हमें महारत हासिल है.


हम वहां गिफ्ट देना पसंद करते हैं,
जिनके पास पहले से कितने ही और महंगे गिफ्ट किसी कमरे में पड़े सड़ रहे हैं.
दिवाली पर आप इस नज़ारे को और करीब से महसूस कर सकेंगे.



हमने पढ़ तो लिया कि जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए,
लेकिन जब किसी को जरुरत होती है,
बजाय उसका साथ देने के हम पीछे हट जाते हैं.
कौन पचड़े में पड़े?


हम किसी की इज्ज़त उसकी नीयत, प्रतिभा, ईमानदारी देख कर नहीं करते.
हम पागल थोड़े ही हैं.
इन चीज़ों में पैसे की खनक तो है ही नहीं.
हमें बस अपना काम निकालने से मतलब है.
काम ख़त्म. रिश्ते स्वाहा.


बड़ी गाड़ी, बंगला, बड़ी कार, सबकुछ बड़ा ही बड़ा,
इनके बिना हम सांस भी कैसे लें?

ऑक्सीजन बेचारी रोती फिरती है. 
पेड़ कहते हैं हमें लगाओ और आराम से सांस लो.
हम फ्री हेल्थ देंगे. पर ना जी.
हमें तो एयर फ़िल्टर लगाने है. वी आर डेवलप्ड, यू नो?


हमें गद्दारी भी बेहद पसंद है. आप इतिहास को पढ़िए.
हममें से ही कोई ऐसा निकलता है जो थोड़े से लालच के लिए हमें ही बिकवा देता है.
हम प्यार-प्यार चिल्लाते हैं, पर वो शरीर से आगे नहीं बढ़ पाता.


आप हम से सीखिए,
हम प्रैक्टिकल लोग हैं.
चाइना को गाली देंगे लेकिन जैसे ही वो हमें कोई सस्ता सामान देने की लोलीपोप देगा,
अपनी औकात दिखा देंगे.
हमें देश से क्या? उसकी चिंता हम क्यों करें? बाकी लोग हैं ना इस काम के लिए.


पडोसी देश हमारे जवानों को मारता रहे, हमें क्या?
उनकी ड्यूटी है भई. मेरे घर से तो कोई नहीं है इस फील्ड में. मुझे क्या?


इतनी शानदार सोच के साथ हिन्दुस्तानी को आगे ले जाया जा रहा है. कहाँ? ये किसी को ख़बर नहीं.


और अब तो 
डिजिटल क्रांति आ गयी है. 6-7 घंटे रोज का काम है हमारा.
इंटरनेट की स्पीड गज़ब है लेकिन हमें क्या देखना चाहिए ये किसी को नहीं पता.


हम भविष्य की प्लानिंग नहीं करते बल्कि
भविष्य के लिए प्लानिंग करते हैं.
और भविष्य सबके साथ होता है.
किसी एक का कोई भविष्य नहीं होता.
ये ही सीखने और सिखाने का समय है.
आपके पास टाइम है क्या?


आओ अपना बल्ब जलाएं.

सबके लिए रौशनी ले आएं.

07.06 AM
18 APRIL 2019
Image Source: Google

( ये लेखक के निजी विचार हैं और केवल हास्य - बोध के साथ चिंतन हो, उसके लिए प्रस्तुत किये गए हैं)

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