Apr 24, 2019

पूरी फ़सल आपकी है. मालिक हैं जी आप.







जीरो बैलेंस पर शुरुआत है.

पैदा होते ही रोना. ये चलेगा.


लेकिन एक लेवल पर आकर


आधा जिंदा रहना कभी भी
समय का पलड़ा 
आपकी तरफ़ नहीं झुकने देगा.


देखिये आपने शुरू से ही क्या - क्या कर डाला?


यहाँ पैदा हुए तो वहां पैदा होने के लिए रोना,
वहां पैदा होते तो यहाँ पैदा होने के लिए रोना.


पढ़ते समय भी रोना,
ना पढ़ते समय भी रोना,
फर्स्ट डिवीज़न हो तो डिस्टिंक्शन का रोना,
और फ़ेल हो गए तो पास के लिए रोना.


खेलते समय भी रोना,
खेल ना मिले तो भी रोना.


सबके साथ होते हुए भी रोना,
और अकेले में भी रोना.


आगे बढ़ते हुए भी रोना,
पीछे गिरते हुए भी रोना


कुछ मिले तो “कम मिलने” का रोना,
कुछ ना मिले तो बाय डिफ़ॉल्ट रोना.


अपना मकान हो तो 
कितना “छोटा है” ये सोचकर रोना,
किराये का हो तो 
बाय डिफ़ॉल्ट “मकान मालिक” का रोना.


ट्रैफिक ज्यादा हो तो रोना,
ट्रैफिक ना हो तो “स्पीड” का रोना.


कुंवारे रह गए तो रोना,
शादी हो गयी तो अनगिनत “उम्मीदों” का रोना,
सबकी सहमति से मैरिज हो तो “अनजाने भय” से रोना,
अपनी मर्ज़ी से हो जाए तो “जाने-माने भय” से रोना.


बच्चें नहीं हैं तो रोना,
हो गए और पसंद के नहीं हुए तो रोना,
आपकी माने तो बच्चों का रोना,
और ना माने तो उनका रोना,
और तो और स्कूल सिलेक्शन का रोना
स्कूल ठीक मिले तो "सही टीचर" नहीं मिले, इसका रोना.


करियर सेट हो गया तो सामाजिक दिक्कतों का रोना,
नहीं हुआ तो किस्मत को रोना.


सबकुछ ठीक हुआ तो फिर 
टूटी सड़क का ही रोना,
सड़क ठीक हुई तो बिजली का रोना,
बिजली ठीक हुई तो पानी का रोना,
पानी ठीक आया तो फ़िल्टर का रोना,
फ़िल्टर लग गया तो उसकी सर्विस का रोना.


ये भी ठीक चला 
तो नेताओं को रोना,
वहां से किसी तरह निकले तो अपने रिश्तों का ही  रोना.


छोटे – बड़े शहर का रोना,
विकास का रोना,
सरकार को रोना,
सिस्टम का रोना,
चलो ये भी हो गया.


इसके बाद
घर से निकलते हुए रोना,
घर में घुसते हुए रोना.


ये भी किसी तरीके से ठीक हुआ तो
किसी से तुलना करते हुए ही रोना.


लंबी उम्र हो तो “कटे कैसे”, तो जल्दी जाने का रोना,
छोटी उम्र हो, तो लंबी उम्र के दहाड़े मार कर रोना.


आपके मन का हो जाए
तो “100% मन-मुताबिक नहीं हुआ”, इसका रोना,
दूसरों के मन का हो जाए तो अब जीवन भर का रोना.


सबकुछ ठीक सा चलते चलते ही 

बारिश का रोना,

गर्मी या सर्दी का रोना.

बस ना चले तो प्रदूषण का ही रोना.



नौकरी ना मिले तो उसका रोना 

और 

मिलने के बाद 

दूसरी कोई अच्छी नौकरी ना मिल पाने का रोना.



कुल मिलाकर 

अपने लिए रोना ही रोना.



सचमुच कितनी मेहनत की है आपने?


हर पल में रोने की इस तैयारी ने आपको कहाँ से कहाँ ला खड़ा किया है?


आदत पक गई. 


आपने मेहनत की है 
और वो ही रंग ला रही है.


आपने अपनी जमीन अपने ही विचारों के बीजों से तैयार की है.
  

अब पूरी फ़सल आपकी है.
मालिक हैं जी आप.


लेकिन,

अगर कोई समझना चाहे तो

बस धागे जितना फ़र्क है.



अब तक अपने लिए ही रोते रहे हैं आप.


बस एक बार,

ख़ुद से थोड़ी देर एग्जिट होकर, 

किसी और के लिए एंटर होकर,
बेवजह रोकर देखिए.


जिंदगी हंस पड़ेगी
और 
आप भी.

सालों पुराना अकाल ख़त्म हो ही जाएगा.


यकीं ना आए 

तो अपनी वजह से किसी की आँखों में 

ख़ुशी के आंसू उड़ेल कर देखिए.



ये आपको अनंत सुख से भर देगा

और 

रोने में भी मुस्कराहट जन्म ले लेगी.



करना आपको ही होगा.


हाँ या ना? 




25 अप्रैल 2019

06.51 AM

इमेज सोर्स: गूगल

(पाजिटिविटी को बढ़ाने के लिए प्रयासरत एक स्वरचित कविता)

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