Apr 27, 2019

काम निपटा कर पहुँच गए साहब.





ऑफिस में आज फिर से साहब का दिमाग ख़राब हुआ.

बाहर बारिश थी.

मन किया कि

पास वाले ढ़ाबे पर चलकर कुछ खाया-पिया जाए

तो दिल को सुकून मिले.


काम निपटा कर पहुँच गए साहब.


गोलू भागता हुआ आया,

साहब, नमस्ते.

लो पानी लो.

कई दिन बाद आये?

हाँ गोलू. शहर से बाहर था कुछ दिनों के लिए.



बैठो साहब, आपके लिए खाना बस 15 मिनट में.

इतने अदरक की गर्मा-गर्म चाय लो.


साहब ख़ुश.

यहाँ आना उन्हें खूब भाता.

ना आर्डर देना, ना कोई कीच-कीच.

मनपसंद खाना और पैसे भी कम.



गोलू को जैसे पता हो कि

साहब को कब और क्या चाहिए?

चाय की चुस्कियों के कुछ देर बाद

भरपेट घर जैसा स्वादिष्ट खाना

आत्मा प्रसन्न.




गोलू, इधर आ.

क्या हुआ साहब.

बेटा- आज तेरे रसोइये से मिलवा जरा.


क्या शानदार खिलाता-पिलाता है.

कहाँ है? लेकर आ?


अरे साहब – छोड़ो ना.


नहीं गोलू,

आज तो उससे मिलना

और

उसका थैंक यू करना बनता है.



साहब, वो रसोईघर में है.

चल गोलू, वहीँ चल.



अंदर एक बूढी सी औरत

ख़ुशी से कुछ गा रही थी 

और

अपने लिए चाय बना रही थी.



जैसे ही साहब और औरत की नज़रें मिली,

साहब जमीन पर ही बैठ गए.

माँ तुम और यहाँ.


आपको तो वृद्धाश्रम में डाला था मैंने.

हाँ बेटे – मगर जो सुख मुझे

यहाँ तुझे खाना खिला के मिलता है

वो वहां कहाँ?



साहब को अभी पता चला

कि

इस ढ़ाबे पर उनके लिए

सबकुछ इतना अच्छा क्यों है.




अब गोलू, माँ और साहब एक साथ रहते हैं.


इमेज/आईडिया स्त्रोत; गूगल




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